काली-कुमाऊं का देव-असुर संग्राम का कोटलगढ़ किला! देव दानव युद्ध के बाद यहीं जन्मी “जय अम्बे गौरी मैय्या जय श्यामा गौरी” दुर्गा आरती।
◆ बाणासुर दैंत्य की माँ कोटव्वी ने यहीं लड़ा था बिष्णु व उनकी सेना से अंतिम संग्राम!
◆ महाकाली ने यहीं किया था शुम्भ-निशुम्भ दैंत्य वध।
◆ सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण अवतारी बिष्णु भगवान ने यहीं काटी थी बाणासुर की गर्दन व किले की छत्त।
(मनोज इष्टवाल)
यह भी अद्भुत है कि माँ का वध भी बिष्णु ने किया और पुत्र का वध भी बिष्णु अवतारी श्रीकृष्ण द्वारा ही किया गया लेकिन सुर सेना की सहायता के लिए माँ काली को अवतार लेना पड़ा तभी जाकर यह सम्भव हो सका महाकाली ने यहीं सभी रक्तबीज दैत्यों का संहार किया है ऐसा माना जाता है। तो क्या… देवभूमि उत्तराखंड की भूमि में सुर नर दैंत्य दानव सभी रहा करते थे? मानस खंड क्षेत्र में जिला चम्पावत के लोहाघाट के निकट (लोहाघाट से लगभग 04 मील दूर) सुई-बिसुंग पट्टी की उतुंग शिखर पर समुद्र तट से 6,327 फिट ऊँचाई व 29.24’-30” अक्षांश और 80-6’-5” देशांतर पर अवस्थित कोटलगढ़ किले का इतिहास देव-असुर संग्राम से जुड़ा हुआ है! क्या यह किला यकीनन शतयुग या द्वापर काल का है? क्योंकि इस से जुडी कहानियाँ, किंवदन्तियाँ व पुराणों में वर्णित कहानियां तो यही बखान करती आ रही हैं।
सुई-बिसुंग क्षेत्र के लोगों का मानना है कि आजतक सी किले के ऊपर किसी ने छत्त डालने की हिम्मत नहीं जुटा सकी क्योंकि जब भी ऐसा प्रयास किया गया अगली सुबह छत्त उखड़कर दूर गिरी मिली व छत्त डालने वालों का अहित हुआ। कोटलगढ़ किले को यहाँ के लोग बाणासुर का किला कहते हैं व अपने को बाणासुर का नाती कहलाने में यहाँ के युवा गर्व महसूस करते हैं। उनका कहना है कि स्कूल में भी अध्यापक उन्हें ज्यादात्तर बाणासुर के नाती की हि संज्ञा देते है। कहा जाता है कि देव दानव संग्राम में माँ काली ने यहीं सुंग-बिसुंग नामक भयंकर दैंत्यों का वध किया था व उनके लहू को धरती में गिरने से पहले ही अपने खप्पर में भरकर रक्तपान कर लिया। इस सम्बन्ध में ब्रिटिश लेखक मेडन लिखते हैं कि- “कोटलगढ़ के बारे में कहा जाता है कि यह बाण-राक्षस (बाणासुर) दैत्य का मजबूत गढ़ था बाणासुर महाबली का पुत्र था जो बिष्णु व उनकी सुर सेना से लम्बे समय तक युद्ध करता रहा और किसी की जीत या हार न हुई। ज्यों हि एक राक्षस पर चोट होती तथा उसका रक्त जमीन पर गिरता, उस रक्त से एक सौ और राक्षस खड़े हो जाते और इस तरह देवता जितना संहार करते विजयश्री उनसे उतनी ही दूर चली जाती। इस कठिनाई से उबरने के लिए पंडोरा की तरह महाकाली का सृजन किया गया। देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियों का दान किया और एकीकृत शक्ति से राक्षस का वध किया।”
सुई-बिसुंग क्षेत्र में अवस्थित कोटलगढ़ किला दक्षिण से उत्तर तक लगभग 80मीटर फैलाव लिए हुए है। इस किले के चारों और लगभग 10-12 फिट ऊँची व 5 फिट मोटाई लिए दिवार खड़ी है। पूरे किले के मध्य भाग में एक कुंवा निर्मित है जिसमें कभी पानी रहा करता होगा।ब्रिटिश इतिहासकारों की माने तो यह कुंवा ब्रिटिश काल में भी सूखा ही था व ब्रिटिश काल में भी इस किले की छत्त नहीं थी। इस किले से दूर हिमालय तक पसरी घाटियाँ वादियाँ व सुई-बिसुंग पट्टी क्षेत्र की समतल बेहद उपजाऊ जमीन दिखाई देती है। यहाँ के जनमानस का कहना है कि आज भी देव असुर संग्राम के यहाँ कई प्रमाण मौजूद हैं जिनमे लोह नदी व यहाँ की रक्त समान लाल मिटटी इसकी गवाही देती नजर आती है जिससे यह साबित होता है कि यहाँ एक बार नहीं कई बार देव-असुर संग्राम हुए हैं।
सुई-बिसुंग को ज्यादात्तर लोग शुम्भ-निशुम्भ की धरती या क्षेत्र मानने के साथ-साथ उनके नामो का अपभ्रंश मानते हैं। क्योंकि यहीं महाकाली ने भयंकर दैत्य संहार कर देवताओं को विजयी दिलाई थी। इसके प्रत्यक्ष प्रमाण शोणितपुर रूप से इस क्षेत्र को पुकारा जाना भी है क्योंकि माँ काली को दुर्गारूप देने के लिए जिस देवस्तुति का आरती गायन हुआ है उसमें इसका प्रत्यक्ष बर्णन मिलता है।
इस किले में जाने के पूरब दिशा को छोड़ हर दिशा से खड़ी चढ़ाई है जो यह दर्शाती है कि यह दुर्ग सुरक्षा दृष्टि से अभेद माना जाता है। इस किले से जुडी श्रीकृष्ण पुत्र अनिरुद्ध व बाणासुर पुत्री उषा के प्रेम प्रसंग की लोकगाथाएं भी प्रचलित हैं। कहते हैं बाणासुर की पुत्री उषा को अनिरुद्ध से प्रेम हो गया था जिसे वह अपनी मायावी शक्तियों के बल पर यहाँ उठाकर ले आई थी। जब बाणासुर को इस बात का पता चला तो उसने बिष्णु अवतारी श्रीकृष्ण से बदला लेने के लिए अनिरुद्ध को इस कोटलगढ़ नामक अपनी माँ के किले में छुपा लिया। द्वारका से अनिरुद्ध के अपहरण कि खबर मिलते ही भगवान श्रीकृष्ण अपने गरुड़ वाहन से अनुरुद्ध की तलाश में निकले और उनकी तलाश का अंत कोटलगढ़ में समाप्त हुआ। जिसकी छत्त को उन्होंने अपने सुदर्शनचक्र से काटकर व बाणासुर का वध कर उषा अनिरुद्ध का विवाह त्रिजुगी नारायण में लाकर किया।
कोटलगढ़ का अर्थ नग्न महिला का घर या किला माना जाता है। इसीलिए इसे बाणासुर के किले के अलावा उनकी माँ कोट्टवी का किला कहा जाता है। कोट्टवी के बारे में कहा जाता है कि उसके बदन का ऊपरी हिस्सा एक सुरक्षित कवच से ढका हुआ था व कमर से नीचे का पूरा भाग नग्न था इसीलिए इस किले को नग्न स्त्री का किला भी कहा जाता है। उसने देव सेना से दुर्घषु युद्ध किया। उसकी हुंकार सुनकर ही देवसेना के सैनिक अचेतन अवस्था में पहुँच जाते थे। उसके रूप और पराक्रम के कारण ही इस किले का नाम कोटलगढ़ रखा गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाबलीपुरम मद्रास के नीचे कोरोमंडल तट है तथा बाणासुर किला वहां से कुछ और दक्षिण में देविकोटा के पास है लेकिन विद्वानों की मान्यता के अनुसार इस स्थान को लोहाघाट के आसपास बताया जाता है और कहते कि सुई हि पुराणों में सोणितपुर है जो बाणासुर का निवास था।
लोहाघाट क्षेत्र के आस-पास कि मिटटी गहरी लाल लौहमयी होने को भी लोग व विद्वान् इसके शोणितपुर होने का प्रमाण मानते हैं उनका मानना है कि राक्षसों के खून से हि यह धरती लाल हुई। बरसात में लोहू नदी जो कि बिसुंगक्षेत्र में स्थित है व कोटलगढ़ के समुख दिखती है, का रंग लाल हो जाता है। जनश्रुतियों के आधार में यह प्रमाणिकता और भी प्रबल हो जाती कि दैंत्य संहार के बाद ही महाकाली को शांत कर उसे अम्बे-जगदम्बे व दुर्गा रूप देने के लिए देवस्तुति की दुर्गा आरती “जय अम्बे गौरी, मैय्या जय श्यामा गौरी” की उत्पत्ति हुई जिसमें स्पष्ट रूप से इस क्षेत्र का बर्णन मिलता है जैसे:-
अम्बे मैया जी की आरती,
जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी,
निशिदिन तुमको ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिवजी॥ जय अम्बे
माँग सिन्दूर विराजत,
टीको, मृगमद को।
उज्जवल से दोउ नयना,
चन्द्रबदन नीको॥ जय अम्बे
कनक समान कलेवर,
रक्ताम्बर राजे।
रक्त पुष्प गलमाला,
कंठन पर साजे॥ जय अम्बे
केहरि वाहन राजत,
खड्ग खप्पर धारी।
सुर नर मुनिजन सेवत,
तिनके दु:ख हारी॥ जय अम्बे
कानन कुण्डल शोभित,
नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर,
राजत सम जोती॥ जय अम्बे
शुम्भ-निशुम्भ विदारे,
महिषासुर घाती।
धूम्र-विलोचन नयना,
निशदिन मदमाती॥ जय अम्बे
चण्ड-मुण्ड संहारे,
शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोऊ मारे,
सुर भय दूर करे॥ जय अम्बे
ब्रह्माणी रुद्राणी,
तुम कमला रानी।
आगम-निगम बखानी,
तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे
चौंसठ योगिनी गावत,
नृत्य करत भैरों।
बाजत ताल मृदंगा,
और बाजत डमरु॥ जय अम्बे
तुम हो जग की माता,
तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुख हरता,
सुख सम्पत्ति करता॥ जय अम्बे
भुजा चार अति शोभित,
वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत,
सेवत नर नारी॥ जय अम्बे
कंचन थाल विराजत,
अगर कपूर बाती।
मालकेतु में राजत,
कोटि रतन ज्योति॥ जय अम्बे
आप माँ गौरी अर्थात दुर्गा की इस आरती के विस्तार स्वरूप पर जाएंगे तो यह साबित करता है कि माँ काली के रुद्र रूप को शांत कर उसे अम्बे गौरी या जगदम्बा स्वरूप प्रदान करने में लिए यह आरती सुर-असुर नर-किन्नर व देवताओं द्वारा गायी गयी जब माँ काली की रक्त पिपासा शांत कर उन्हें दुर्गा रूप दिया गया। इसके तीसरे पांचवें व छठवें आन्तरा की पंक्तियां यह साबित करती हैं कि देव-असुर संग्राम इसी क्षेत्र में हुआ और यहीं सभी रक्तबीज दैत्य मारे गए। इसमें शुम्भ निशम्भ =सुई-बिसुंग व शोणित बीज= शोणितपुर का स्पष्ट उल्लेख मिलता है जहां महाकाली ने मधु कैटभ दैत्य वध किया था।
यह किला वर्तमान में भले हि पुरातत्व विभाग के अधीन है लेकिन अफ़सोस कि इसके रख-रखाव की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है और ना ही उत्तराखंड का पर्यटन विभाग इसे पर्यटकों की नजरों के में ला पाया जबकि पूरे विश्व की हिन्दू सनातन परम्पराओं में नवरात्रि व्रत पूजा के बाद हर रोज यही दुर्गा आरती गायी जाती है। यह किला पूर्ण रूप से परित्यक्त है लेकिन मेरा निजी शोध कहता है कि सुई बिसुंग पट्टी का यह क्षेत्र ही वह क्षेत्र है जिसने पूरे विश्व के सनातन धर्मावलम्बियों को “दुर्गा आरती” जपनाम दिया है।





