(मनोज इष्टवाल)
कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो अपनी गाथागान के लिए मशहूर हो जाते हैं। ऐसा ही एक शब्द है “रामजाने” जो पहाडी प्रदेशों तक पहुंचते-पहुंचते बोलचाल की भाषा में हल्का सा अपभ्रंश होकर “राम जाणी” हो जाता है। लेकिन इस से भी थोड़ा और हटकर शब्द है “रामझणी’ या “रामझाणी”…! सबका अर्थ एक ही है लेकिन भावार्थ बदल जाता है।
मूलतः राम जाने या राम जाणी का अर्थ व भावार्थ एक सा है कि भगवान जाने…! यह शब्द हर वस्तु के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। जिस वस्तु का आपको ज्ञान नहीं आपके मुंह से निकलता है पता नहीं क्या है। पहले शुद्ध सात्विक भाषा शैली में यही पता नहीं, राम जाने क्या है प्रयोग में लाया जाता है। भाषाई अपभ्रंशता व हिंदी देवनागरी शब्दों में उर्दू फारसी की बाहुल्यता ने जहां हमारे शब्द समूह को खोया वहीं नित उसकी भाषाई शुद्धता भी खोई है जिस पर न स्कूलों में काम किया गया व न हमारे वंशजों ने ये शब्द हमारे मुंह में डाले। गलती से अगर हम सभी समाज में पता नहीं या नो आईडिया की जगह राम जाने शब्द का प्रयोग करते हैं तब कहीं न कहीं वर्तमान समाज हम कमतर आंकना शुरू कर देता है। खैर यह लम्बा बिषय है फिलहाल राम जाणी व रामझाणी/रामझणी पर वापस लौटते हैं।
रामझणी शब्द मूलतः पुरुष वाचक शब्द है जिसका सीधा सा मतलब है कि यह सिर्फ किसी पुरुष बिशेष के लिए प्रयोग में लाया गया शब्द है जबकि राम जाणी एक संज्ञा शब्द है जिसे किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु, गुण, दशा और कार्यकलाप के नाम में प्रयोग में लाया जाता है।
जब गढ़वाल मंडल में सड़क विस्तार नहीं था व गांवों तक मीलों पैदल चलना पड़ता था तब “रामझणी” हर एक की जुबान में चढ़ा हुआ शब्द होता था। मुझे लगता है कि 30 बर्ष से कम उम्र के ज्यादात्तर युवाओं के बीच यह पुरुष वाचक शब्द अब कहीं प्रयोग में नहीं रह गया होगा लेकिन इससे ज्यादा उम्र के लोग इस शब्द को बहुत अच्छे से जानते होंगे। तब अक्सर चूड़ी, फूंदी, बर्तन, कपड़े बेचने वाले मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति नजीबाबाद से गांव के नजदीकी छोटे छोटे बाजारों में कुछ काल के लिए आया करते थे। जहां से वे अक्सर श्रवण कुमार जैसे डंडे पर बर्तन, चूड़ी इत्यादि लादकर गांव-गांव आया करते थे। बच्चे खुशी से चिल्लाया करते थे कि “रामझणी ऐ ग्ये” (रामझणी आ गया)। व अपने घर मे पड़ा पुराना टिन, प्लास्टिक इत्यादि इकट्ठा कर लाते व बदले में मूंगफली व चना पाते। गांव की माता बहनें चूड़ी-फूंदी-बिंदी व साजोश्रृंगार का सामान खरीदती। साथ ही पुराने तांबे, पीतल, टिकूट, कांसे के बर्तन देकर नये चमकीले स्टील, एल्युमिनियम के बर्तन खरीदती। यह हमारे काल की बात है, जब हमने स्टील, एल्युमिनियम को प्रयोग में आते देखा था। फिर भी हमारे पूर्वज इन बर्तनों के इस्तेमाल से बचते थे वे दलील देते की भड़डू, पतीले इत्यादि का भोजन तांबा पीतल कांसे की थाली कटोरी में खाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है। लेकिन भला चमकीली धातु की तरफ कौन आकर्षित नहीं होता फिर धीरे धीरे पीतल, तांबे कांसे के बर्तन व गागर बंठे भी घरों से गायब होने लगे व एल्युमिनियम व स्टील ने उनकी जगह ले ली।
मूलतः रामझणी शब्द कब प्रयोग में लाया गया होगा, यह कह पाना सम्भव नहीं है लेकिन यह शब्द सिर्फ और सिर्फ़ उस मुस्लिम व्यापारी के लिए प्रयोग में लाया गया जो गांव गांव फेरी लगाने आता था। अन्य फेरी वाले कभी रामझणी नहीं कहलाये। रामझणी लगता है उस काल में प्रयोग में लाया गया शब्द है जब लोग गांव में आये व्यक्ति का नाम पूछने में कहीं उसकी इज्जत कम न हो, व अपनी मर्यादा कम न हो! प्रयोग में लाया गया शब्द रहा होगा। जब कोई मुस्लिम व्यापारी शुरुआती दौर में पहाड़ों पर चढ़ा होगा व उसकी दाड़ी, पहनावा इत्यादि से वह किस क्षेत्र का है, यह अनुमान लगाना कठिन रहा होगा तब इस शब्द की उत्पत्ति मूलतः राम जाणी ही हुई होगी अर्थात राम जाने कौन है क्या है। लेकिन धीरे धीरे यह संज्ञा के स्थान पर तब व्यक्ति बिशेष बन गया जब यह अपभ्रंश होकर राम जाणी से रामझणी या रामझाणी हो गया।
मुझे लगता है कि हमें गढवाळी शब्द कोष में ऐसे शब्दों को संग्रहित करके रखना चाहिए ताकि हमारी शब्द सम्पदा चिरायु रह सके।

