(मनोज इष्टवाल)।
तो क्या यह सचमुच एक सोची समझी रणनीति, कूटनीति व राजनीति का चक्रब्यूह था जिसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत फंसते चले गए और उन्हें भनक भी नहीं लग पाई कि पूर्व में महासचिव कांग्रेस व फिर उपाध्यक्ष कांग्रेस जैसे पदों पर विराजमान रहे अकील अहमद ने उन्हें क्या से क्या बना दिया।
सम्पूर्ण चुनावी रण को अपने कांधे पर लादकर चलने वाले हरीश रावत शायद चुनाव व पार्टी को सबल बनाने में इतने मशगूल हो गए कि उन्हें अकील अहमद की मुस्लिम यूनिवर्सिटी वाली वीडियो ट्रॉल होती नहीं दिखी। यदि उन्होने वक्त रहते यह सब देख लिया होता तो शायद आज कांग्रेस की जीत का आंकड़ा व स्वयं हरीश रावत का चुनाव उन्हें व पार्टी को पुनर्जीवित कर सरकार बनाने के दमखम में शामिल कर देता। उनकी भी आंखे तब खुली जब मतदाताओं के मत वोटिंग मशीन में पैक हो गए। जब तक मसला समझ आता, मनन करते कि किस कारण हार हुई तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
हरीश रावत राजनीतिक सोच रखने व पहाड़ को पहाड़ की भाषा में समझने वाला नेता फिर गच्चा खा गए या फिर ये भूल गये कि आप जनप्रिय, लोकप्रिय व सुख दुःख में सबके काम आने वाले नेता तो हैं लेकिन यह पहाड़ सिर्फ धर्म व धर्म संस्कृति की बात सुनता है। उसके आगे उसे कुछ नहीं सूझता। हरीश रावत पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप 2017 के चुनाव में भी लगे थे, लेकिन हरीश रावत उसे नहीं समझ पाए। भाजपा की पूरी आई टी सेल बस यही तो एक तोड़ ढूंढ रही थी कि कहां इस विराट नेता के लिए गळफांस ढूंढी जाय। जैसे ही अकील अहमद का वीडियो वायरल हुआ वैसे ही हरीश रावत का लम्बी मुल्लाकट दाढ़ी में एक फोटो सोशल मीडिया में टॉल होने लगी। सिर्फ ट्रॉल ही नहीं हुई बल्कि सोशल मीडिया में हजारों हजार शेयर होने लगी। जब तक कांग्रेस पार्टी व स्वयं हरीश रावत इस बात पर ध्यान देते तब तक फोटो अकील अहमद का बयान अपना काम कर गया था। मैंने स्वयं भी वह फोटो शेयर की थी और इसे गन्दी राजनीति का एक अंश करार दिया था। लेकिन अंग्रेजो की एक कहावत है कि “एवरीथिंग फेयर इन लव एन्ड वार।”
बस यही वह वार था जहां कांग्रेस ही नहीं हरीश रावत भी चारों खाने चित्त हो गए जबकि कांग्रेस की प्रवक्ता टीवी चैनल्स में बहुत पॉजिटिव एनर्जी के साथ चुनाव से पहले जिस तरह दहाड़ा करती तब ऐसे लगता था कि कांग्रेस सरकार बनाएगी तो जाने क्या कुछ कर गुजरेगी। भले ही हरीश रावत पर बाद में बांटे गए 17 टिकटों को लेकर भी आरोप लगे जिसका वे लगातार खंडन करते रहे लेकिन सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने के लिए अकेली आवाज कभी बुलन्द नहीं होती। हरीश रावत सोशल मीडिया में सफाई देते रहे लेकिन पार्टी के अंदर का घमासान कहीं न कहीं हार के बाद उन्हें दूर छिटकाता रहा।
विगत 27 मार्च 2022को सोशल साइट पर उन्होंने एक पोस्ट डाली जो अक्षरशः इस प्रकार है कि “चुनाव हारने के बाद काफी समय से सोशल मीडिया में मुझ पर बिना सर-पैर के हमले करने वालों की बाढ़ सी आ गई है। धामी की धूम पेज में मुझ पर जुटकर प्रहार कर रहे भाजपाई शोहदों के साथ-साथ हमारे एक नेता से जुड़े हुए कुछ लोग भी दनादन मुझ पर गोले दाग रहे हैं, उनको लगता है हरीश रावत को गिराकर मार देने का यही मौका है।
मैं लगभग 241 किलोमीटर दूर एक अनचाही चुनावी जंग में फंस चुका था, मुझे 3-4 फरवरी तक कहीं कुछ भी हो रहा हो उसकी खोज खबर लेने की फुर्सत ही नहीं मिल पा रही थी। कहां से एक यूनिवर्सिटी का मामला उठा, किसने उसको उठाया, किनके सामने उठाया! और उस व्यक्ति को पार्टी का उपाध्यक्ष किसने बनाया! यह कहानी अब सारे राज्य के लोगों को स्पष्ट मालूम है। यूनिवर्सिटी की बात कहने वाले व्यक्ति की सियासी जिंदगी में उसे सचिव व महामंत्री बनाने वाला नाम भी सामने आ चुका है। एक विस्फोटक बात करने वाले व्यक्ति को हरिद्वार ग्रामीण में पर्यवेक्षक बनाकर किसने भेजा और किसके कहने पर भेजा! यह तथ्य अभी जरूर स्पष्ट नहीं हुआ है। लेकिन उद्देश्य स्पष्ट था हरिद्वार ग्रामीण जो पहले से ही संवेदनशील चुनाव क्षेत्र है, वहां की उम्मीदवार को चुनाव हराना, वह मेरी बेटी है अर्थात कुछ लोग बाप का इंतजाम करने के बाद बेटी की हार का भी इंतजाम करने में लग गए थे।
मैं जानता हूं, यदि मैं इस पूरे घटनाक्रम की जांच की मांग को लेकर कांग्रेस कार्यालय में उपवास पर बैठ गया तो एआईसीसी को स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच बैठानी पड़ेगी। मैं जानता हूं पार्टी को गहरे घाव लगे हैं। मैं अपने घाव को उकेर कर पार्टी के घावों में संक्रमण नहीं फैलाना चाहता हूं। मगर मुझे अपने पर निरंतर लगाए जा रहे झूठे आरोप और उसके दुष्प्रचार का खंडन भी करना है, और दुष्प्रचार फैलाने वाले चेहरों को बेनकाब भी करना है। हाल-फिलहाल मैंने फैसला किया है कि भाजपाइये और एक नेता विशेष के कांग्रेसी छाप दुष्प्रचारकों का भंडाफोड़ भी करना है।
मैंने पिछले दिनों उस समाचार पत्र की 10 प्रतियां लाकर मुझे दिखाने की चुनौती भाजपा के धामी की धूम पेज के शोहदों को दी थी और कहा था कि वह ऐसा समाचार पत्र लाने वाले को ₹50000 इनाम देंगे, अब इस दुष्प्रचार अभियान में कुछ तथाकथित कांग्रेसी छाप लोग भी सम्मिलित हो गए हैं। इसलिए मैंने अब यह राशि बढ़ाकर ₹100000 कर दी है। यदि कोई अखबार छपा है, तो उस समाचार पत्र का पंजीकरण नंबर, मुद्रक, प्रकाशक, वितरक तो होगा! कहां से छपा है उस स्थान का नाम होगा! छापने वाले संपादक व संवाददाता का नाम होगा! केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर एक झूठ को उपजाने वाली भाजपा व उनकी मदद कर रहे कांग्रेस छाप लोगों को मेरी चुनौती है कि वह ऐसा अखबार लाएं जिसमें मैंने यूनिवर्सिटी को लेकर बयान दिया है। मैंने धामी की धूम पेज के इस कुकृत्य की जांच की मांग भी की है। जिस दिन प्रमाणित तौर पर यह सारे तथ्य सामने आ जाएंगे तो मैं, गांधी जी की मूर्ति के सामने बैठकर राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा कर दूंगा।”
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यह सचमुच कितना असहनीय पल होगा कि एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रदेश ही नहीं देश भर में राजनीति के कद्दावर नेता को अपनी सच्चाई साबित करने के लिए ₹100000/- (₹ एक लाख मात्र) ईनाम की घोषणा तक करनी पड़ी। अब जब अकील अहमद को प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश महासचिव (संगठन) ने पत्र लिखकर अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए 06 बर्ष के लिए पार्टी से निलंबित कर दिया तब जाकर अब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के कंधे का बोझ थोड़ा कम होता नजर आ रहा है। इस प्रकरण से यह तो साफ हो ही गया है कि राजनीति में शह और मात का खेल हर पार्टी के अंदर चलता रहता है लेकिन राजनीति में इतने विराट व्यक्तित्व को इतना कुछ सहना पड़े यह प्रदेश हित में शुभ नहीं दिखाई देता। बहरहाल मुझे लगता है कि हरीश रावत पर हर बार मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप मढ़ दिए जाते हैं, लग जाते हैं या फिर वह स्वयं इसको हवा देते हैं! अब समय आ गया है कि उन्हें कांग्रेस की मुख्यधारा से हटकर अपने व्यक्तित्व के लिए भी सजग रहना होगा क्योंकि इस तुष्टिकरण ने उनकी बरसों की राजनीतिक विरासत में। ऐसी सेंधमारी का जंक लगा दिया है, जिसे उनके अलावा और कोई मिटा भी नहीं सकता।

