(मनोज इष्टवाल)
करीब 43 बर्ष…अर्थात लगभग पूरी जिंदगी संघ, संगठन और भाजपा में खपाने के बावजूद आज जब राजनीतिक जीवन में बिषम व विपरीत परिस्थितियों से गुजरने का समय आया तब वे पार्टी से टिकट की दावेदारी करने की जगह चुनाव लड़ने से इनकार कर देते हैं। सब कुछ तो ठीक-ठाक चलता दिख रहा था। अपने विधान सभा डोईवाला में भी वे पिछले कुछ महीनों से बेहद सक्रिय दिखाई दे रहे थे फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहना पड़ा कि वे चुनाव नहीं लड़ना चाहते।
सूत्र और आम जनता से प्राप्त जानकारियों के आधार पर जो जानकारियां छनकर आ रही हैं वहां सूत्र यह कहते हैं कि वे युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चेहरे को मुख्यमंत्री का दावेदार बनाकर कतई चुनाव लड़ने के मूड में नहीं हैं। अभी तक उन्हें यह उम्मीद थी कि भाजपा का केंद्रीय संगठन बिना किसी मुख्यमंत्री के चेहरे के आधार पर विधान सभा चुनाव में उतरेगा लेकिन विगत 18 जनवरी को दिल्ली में जरूर ऐसा कुछ घटा है जिसके आधार पर उन्होंने अपनी राजनीतिक परिपक्वता, संघ के अनुशासित सिपाही व संगठन की गरिमा का ख्याल रखकर चुनाव न लड़ने की अनिच्छा जताई है।
वहीं आम जनता का मानना है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत को अब आभास हो रहा है कि वे मुख्यमंत्री काल में जिन निकटवर्तियों से घिरे रहे उन्होंने उनकी परिश्रम से तैयार की गई वह जमीन खिसका दी है जिस पर उन्हें अभिमान था। लोग एक ऐसे व्यक्ति को भंगलची कहने लगे जो कभी नशा नहीँ करता। लोग एक ऐसे व्यक्ति को ऐरोगेंट कहने लगे जिसे आभास ही नहीं हुआ कि यह शब्द कब उनके दामन से चिपक गया उन्हें आभास तक नहीं हुआ। और तो और लोगों ने उनके कमर पीछे हाथ करके चलने के स्टाइल पर भी तंज कसे व कहा कि जनप्रतिनिधि जनता के पास हाथ जोड़कर जाता है न कि हाथ कमर पीछे रखकर राजाओं की तरह। आम जन उनसे दूर छिटक गया और उन्हें आभास तक नहीँ हुआ।
मीडिया प्रबन्धन में भी उन्हें कान का कच्चा समझा गया। उनके निकटवर्तियों ने उनके खूब कान भरे और उन्होंने मीडिया पर्सन पर मनचाहे फैसले लेकर एक दहशत फैलाये रखी जो लोकतंत्र के लिए घातक है। यह आम उन मीडियाकर्मियों का कहना है जो कभी इनके करीबियों में गिने जाते थे।
लाख बुराइयों के बावजूद भी यह सच है कि जितना कार्य व परियोजनाएं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल में उत्तराखंड प्रदेश में लागू की जाने वाली थी उनके लोकार्पण, शिलान्यास तब तक होते रहे जब तक कि आचार संहिता नहीं लग गयी। इस सबके बावजूद भी त्रिवेंद्र सिंह रावत आम जनता के बीच लोकप्रियता नहीं कमा पाए। इसका कारण भी वह स्वयं ही हैं क्योंकि आम जन के बीच उनकी संवादहीनता उन्हें सबसे दूर करती चली गयी व उन्हें उनके कारिंदे हमेशा उन प्रायोजित खबरों को लाकर ही सामने रखते थे जिन खबरों में उनके कसीदे पढ़े जाते थे।
यह आश्चर्यजनक था कि जिस पृष्ठभूमि ‘संघ परिवार’ से वे रहे बर्षों कार्य किया, उसी परिवार को उन्होंने तवज्जो नहीं दी। यह आरोप भी उन पर लगता रहा और सब छिटककर उनसे दूर हो गए। जब उन्हें एकाएक मुख्यमंत्री पद से हटाया गया तब उन्हें अचम्भा हुआ कि आखिर ऐसा क्या हुआ।
पदच्युत होने के बाद उन्होंने उस हर बिषय पर काम करना प्रारंभ कर दिया जिसने उन्हें कुर्सी से दूर किया और उन्होंने मनन करने के बाद बेहद सहृदयता से उसे अपनाना भी शुरू कर दिया था। उनके एकाएक बर्ताव में आये परिवर्तन से आम जन के बीच यह चर्चा भी होने लगी कि काश..यह सब वह तब करते तो उनका कद पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी जैसा होता। लेकिन यह कुर्सी ही ऐसी होती हैं।
डोईवाला से चुनाव मैदान में नहीं उतरेंगे पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत, राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को चिट्ठी लिखकर बताई वजह।
पार्टी उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दे रही है। पार्टी सूत्र संकेत दे रहे हैं कि उन्हें भाजपा का प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है। वहीं उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र लिखकर जताई चुनाव न लड़ने की इच्छा भी जताई है। अब इसके बाद डोईवाला से भाजपा का प्रत्याशी कौन होगा, इसे लेकर संस्पेंस बन गया है।
पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने किए कुंजापुरी के दर्शन वहीं इससे पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सिद्धपीठ कुंजापुरी मंदिर पहुंचकर दर्शन किए। उन्होंने क्षेत्र और प्रदेश की खुशहाली, कोरोना महामारी से निजात दिलाने और प्रदेश में फिर से भाजपा सरकार बनाने का आशीर्वाद लिया।
क्या है पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की पृष्ठभूमि।
वर्तमान में त्रिवेन्द्र सिंह रावत उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक हैं। 17 मार्च 2017 को वे उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री नियुक्त हुए। रावत के पिता का नाम प्रताप सिंह और माता का नाम बोद्धा देवी है। रावत का विवाह सुनीता से हुआ। सुनीता रावत शिक्षिका हैं और देहरादून में नियुक्त हैं। इनकी दो पुत्रियाँ हैं।
राजनीति जीवन।
1979:
रावत का राजनीतिक सफर प्रारम्भ हुआ और इसी वर्ष त्रिवेंद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े।
1981:
संघ के प्रचारक के रूप में काम करने का उन्होंने संकल्प लिया।
1985:
देहरादून महानगर के प्रचारक बने।
1993:
भाजपा में क्षेत्रीय संगठन मंत्री।
1997 :
भाजपा प्रदेश संगठन महामंत्री।
2002 :
भाजपा प्रदेश संगठन महामंत्री।
2002
विधानसभा चुनाव में डोईवाला विधानसभा से विजयी हुए।
2007:
डोईवाला विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से उत्तराखंड विधान सभा के लिए भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए।भारतीय जनता पार्टी के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बने।
2017 :
डोईवाला विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से उत्तराखंड विधान सभा के लिए भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए।
17 मार्च 2017 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री नियुक्त हुए। उनके बाद तीरथ सिंह रावत 05 माह मुख्यमंत्री रहे व तदोपरांत वर्तमान तक पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री हैं। फिलहाल ये भी कय्यास लगाये जा रहे हैं कि भाजपा केंद्रीय संगठन द्वारा इस बार कई क्षत्रपों से ऐसे ही पत्र लिए जा रहे हैं। और जो नहीं दे रहे हैं वे पार्टी छोड़कर दूसरे दलों की शरण में जा रहे हैं। यहां अगर ऐसा भी हुआ है तो यह पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का सम्मान ही बढ़ाएगा कि उन्होंने आज भी पार्टी संघ व संगठन में अपनी पूरी निष्ठा जताई है, जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए।
