(मनोज इष्टवाल)
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार में श्रम मंत्री रहकर पांच साल तक मालपुवे खाने वाले इस मंत्री को अब भाजपाई अपने लिए ‘शर्म’ समझकर शर्म मंत्री पुकार रहे हैं। भाजपाई आम कार्यकर्ताओं के बीच स्वामी प्रसाद मौर्य अब शर्म मंत्री के रूप में पुकारे जाने लगे हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट में वह श्रम, सेवायोजन, शहरी रोजगार और गरीबी उन्मूलन विभागों के मंत्री रहे। राजनीतिक जानकारों की मानें तो स्वामी प्रसाद मौर्या अपनी बेटी संघमित्रा गौतम के बदायूं से सांसद होने के बाद, खुद के लिए पडरौना तो बेटे उत्कृष्ट मौर्या के लिए ऊंचाहार सीट से भाजपा का टिकट की मांग कर रहे थे। वहीं, भाजपा संघमित्रा गौतम के सांसद होने की वजह से स्वामी प्रसाद मौर्या का टिकट काटने की तैयारी में थी। उनके बेटे को भाजपा का टिकट मिलने की बात तो बहुत दूर की कौड़ी थी।
सूत्रों की माने तो स्वामी राम मौर्य को जैसे ही इस बात का आभास हुआ कि इस बार स्वयं उनकी टिकट पक्की नहीं है तो उन्होंने फौरन इस्तीफा देकर 32 टिकट की मांग इसलिए रख दी ताकि जिनके लिए वह टिकट मांग रहे हैं, अगर उन्हे भी टिकट न मिले तो वह दलित कार्ड चलकर उनका इस्तीफा करवाकर भाजपा पर दबाब बनाये।
भारतीय जनता पार्टी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्या 32 टिकटों की मांग कर रहे थे, जबकि भाजपा उनका खुद का टिकट काटने वाली थी। समाजवादी पार्टी तो जैसे ताक पर बैठी हो कि कब धमाका हो व सपा उस धमाके में ढोल बजाए। स्वामी राम मौर्य को भी सपा में जाने से विपक्ष को एक मौका समझा जा रहा है। जैसा कि अखिलेश कहते सुने गए कि स्वामी प्रसाद मौर्य का उनकी पार्टी में स्वागत है। उन्हें तो मानो मन मांगी मुराद मिल गयी हो, क्योंकि उन्हें इसी बहाने भाजपा में अदरूनी बगावत का बिगुल बजाने का मौका जो मिल गया है।
स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा पांच साल तक खूब मंत्री पद दबाये रखा जैसे ही योगी सरकार पांच साल पूरे कर चुनावी मॉड पर गयी। मंत्री महोदय को अपने इस्तीफे के साथ दलितों और पिछड़ों की याद आ गयी। तभी तो वे इस्तीफे के बाद बोल पड़े पार्टी दलितों और पिछड़ों का सम्मान नहीं करती, उनका उत्पीड़न किया जाता है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले स्वामी प्रसाद मौर्या का भाजपा छोड़ समाजवादी पार्टी में शामिल होना उनके जैसी शख्सियत के लिए कोई बड़ी बात नहीं हैं। अतीत में भी स्वामी प्रसाद मौर्या यह कारनामा करते रहे हैं। वह पांच बार के विधायक हैं और अपने राजनीतिक जीवन में पांचवीं बार दल भी बदला है। जो इस बात को दर्शाता है कि इस व्यक्ति ने सिर्फ अपने व अपने परिवारों के लिए राजनीति की न कि समाज सेवा के लिए इन्होंने योगदान दिया हो।
कौन है स्वामी प्रसाद मौर्य।
स्वामी प्रसाद मौर्या का जन्म 2 जनवरी 1954 को प्रतापगढ़ जिले में हुआ था. उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से लॉ में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री की हासिल की है। स्वामी प्रसाद मौर्या ने 1980 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा। वह इलाहाबाद युवा लोकदल की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य बने और जून 1981 से 1989 तक महामंत्री पद पर रहे।
राजनीति सफर।
सन बाद 1989 से सन 1991 तक स्वामी प्रसाद मौर्या यूपी लोकदल के मुख्य सचिव रहे। वह 1991 से 1995 तक उत्तर प्रदेश जनता दल के महासचिव पद पर रहे। स्वामी प्रसाद मौर्य ने 2 जनवरी 1996 को बहुजन समाज पार्टी की सदस्यता ली और यूपी महासचिव बने। इसी वर्ष बसपा ने स्वामी को रायबरेली की डलमऊ विधानसभा सीट से टिकट दिया और वह पहली बार विधायक बने।
साल 2007 के विधानसभा चुनाव में स्वामी प्रसाद मौर्या डलमाऊ सीट से चुनाव लड़े दूसरी बार विधायक बने। वह मायावती की सरकार में 2007 से 2009 तक कैबिनेट मंत्री रहे। जनवरी 2008 में मौर्या को बसपा का उत्तर प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने विधायकी छोड़ दी। इसके बाद 2009 में पडरौना विधानसभा के उपचुनाव में स्वामी प्रसाद मौर्या ने केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह की मां को हराया। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को सपा के हाथों बड़ी हार झेलनी पड़ी। मायावती ने स्वामी प्रसाद मौर्या को बसपा अध्यक्ष पद से हटाकर नेता प्रतिपक्ष बनाया और उनकी जगह रामअचल राजभर को यूपी में पार्टी की कमान सौंपी। स्वामी प्रसाद मौर्या ने 8 अगस्त 2016 को भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा के टिकट पर 2017 के विधानसभा चुनाव में वह एक बार फिर पडरौना विधानसभा सीट से विधायक चुने गए।
यह भी सच है कि बसपा में प्रदेश अध्यक्ष रहने के बाद से स्वामी प्रसाद मौर्य में प्रदेश की राजनीति में दलित व पिछड़ों के बीच अपनी अच्छी राजनीतिक पैठ बनाई है लेकिन लगातार दलबदल से उनकी छवि को भी बड़ा नुकसान पहुंचा है। उनके लगातार गिरते ग्राफ व दबाब की राजनीति को भाजपा आलाकमान व संघ संगठन बखूबी भांप चुके हैं यही कारण भी है कि भाजपा व संघ पिछले डेढ़ साल से स्वामी प्रसाद मौर्य की काट ढूंढने में लगी हुई थी। भाजपा सूत्रों की मानें तो सबका यही मानना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफ़े से पार्टी को कोई विशेष नुकसान नहीं होने वाला लेकिन इतना जरूर है कि पांच बर्ष तक योगी सरकार में श्रम मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपाईयो की नजर में श्रम मंत्री नहीं बल्कि शर्म मंत्री हैं।

