Monday, March 23, 2026
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लोकायुक्त पर 8 साल से उत्तराखंड में सिर्फ वादे ही वादे, भाजपा-कांग्रेस का रुख भी ढुलमुल, भाजपा ने किया था 100 दिन में बनाने का वादा।

देहरादून (हि. डिस्कवर)।

उत्तराखंड में 100 दिन में लोकायुक्त का गठन करने का वादा कर सरकार में आई भाजपा पांच साल में भी इस ख्वाब को साकार नहीं कर पाई। न केवल भाजपा बल्कि इससे पहले कांग्रेस का रुख भी लोकायुक्त के प्रति ढुलमुल ही रहा है। करीब आठ साल से लेाकायुक्त के अधर में लटके होने से दोनों ही दल सवालों के कठघरे में हैं। लोकायुक्त के लिए उत्तराखंड को अब अगली सरकार का इंतजार करना होगा।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह ने कहा लोकायुक्त पर भाजपा का ढोंग सामने आ चुका है। वर्ष 2017 में लोकायुक्त को पारित कराने के लिए पूरा विपक्ष सहमत था। ऐसा पहली बार हुआ कि विपक्ष तो बिल के समर्थन में थी और सरकार खुद ही उसे प्रवर समिति को भेज रही थी। कांग्रेस सत्ता में आने पर लोकायुक्त पर जनभावनाओं के अनुसार निर्णय करेगी।

भाजपा ने किया था 100 दिन में बनाने का वादा।
वर्ष 2017 के विधानसभा में भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में 100 दिन में लोकायुक्त बनाने का वादा किया था। भाजपा ने कांग्रेस के बनाए एक्ट में संशोधन करते हुए नया ड्राफ्ट तैयार किया। और फिर बाद में इसे विधानसभा की प्रवर समिति को सौंप दिया गया। तब तक यह बिल विधानसभा की संपत्ति है। इस पर आगे कार्यवाही बढ़ृ ही नहीं पाई।

लोकायुक्त पर कब क्या हुआ…?
राज्य में लोकायुक्त अधिनियम वर्ष 2011 में पारित किया गया था। तत्कालीन भाजपा सरकार के सीएम मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी (रि) इस एक्ट को लाए थे। खंडूड़ी का लोकायुक्त काफी अधिकार संपन्न और सख्त था। वर्ष 2012 में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस की सरकार बनी। इस बीच राष्ट्रपति भवन से एक्ट का मसौदा मंजूर होकर आ गया। इसे सरकार को 180 दिन में लागू करना था। कांग्रेस ने खंडूड़ी के एक्ट में परिवर्तन करते हुए नया एक्ट तैयार किया। इससे खंडूड़ी का लोकायुक्त ठंडे बस्ते में चला गया और कांग्रेस भी पांच साल तक अपना एक्ट लागू न कर पाई।

लोकायुक्त दफ्तर पर हो रहे करोड़ों रुपये खर्च।
भले ही उत्तराखंड में लोकायुक्त का गठन आठ साल से अधर में हैं। लेकिन लोकायुक्त के दफ्तर के रखरखाव पर हर साल करोड़ों रुपये का खर्च बादस्तूर जारी है। 24 दिसंबर 2013 से अब तक 13 करोड़ रुपये से अधिक की राशि लोकायुक्त कार्यालय के स्टॉफ के वेतन, रखरखाव आदि पर खर्च हो चुके हैं। यह खर्च अभी भी जारी है। साथ ही 1500 से ज्यादा मामले सुनवाई के लिए भी लंबित हैं।

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