Thursday, January 22, 2026
Homeफीचर लेखसन 1980-81का वह लोकसभा चुनाव ..! जो 'ख' और 'ब' में बाँट...

सन 1980-81का वह लोकसभा चुनाव ..! जो ‘ख’ और ‘ब’ में बाँट गया गढवाली समाज को….! बर्षों बाद फिर दिखी ऐसी ही ख व ब की राजनीति।

सन 1980-81का वह लोकसभा चुनाव ..! जो ‘ख’ और ‘ब’ में बाँट गया गढवाली समाज को….! बर्षों बाद फिर दिखी ऐसी ही ख व ब की राजनीति।

(मनोज इष्टवाल)

ख= खस ब= बामण
अब अचानक राजनीति का वह दौर फिर से शुरू हो जाय तो अतीत याद आना लाजिम है। वह दौर यानि 1980-81 का वह लोकसभा चुनाव जिसमें पर्वतपुत्र हिमवती नन्दन बहुगुणा ने लोकसभा का चुनाव में कांग्रेसी दिग्गज नेता चन्द्रमोहन सिंह नेगी को हराया था, भले ही फिर बहुगुणा 1984 में आठवीं लोकसभा का चुनाव हार गए थे। यह चुनाव इसलिए भी याद रखा गया था क्योंकि इस चुनाव में गढ़वाल संसदीय सीट में दो दैत्यों ने जन्म लिया जिनका नाम था और ब। अर्थात खस और ब्राह्मण।

यह परिपाटी चन्द्रमोहन सिंह नेगी ने शुरू की या हिमवती नंदन बहुगुणा ने….! यहां किसी एक का नाम लेकर विवाद पैदा नहीं करना उद्देश्य नहीं होना चाहिए। लेकिन यह सच है कि इस राजनीति ने तब से लेकर वर्तमान तक अपने वोट बैंक के लिए जाने कितने गांव कितने सामाजिक ताने-बाने नष्ट किये। इन दैत्य रूपी दो शब्दों ने अब लोकसभा से उठकर ग्राम सभा के चुनाव में अपने दो और अपने भाइयों को पैदा कर दिया है जिनका नाम है और अर्थात शराब और मीट। फिर भी सन 1980 में जन्मे वे दो शैतान अब राजनीति इतने परिपक्व हो गए हैं कि उन्होंने छोटे से लेकर बड़े चुनाव तक पहले शहर बांटा, फिर गांव बांटा, फिर परिवार बांटा, फिर भाई बांटा और अब चूल्हा तक बांट दिया।

तब मैं स्कूली छात्र था और इस के चुनावी चक्कर में हमारे गॉव में पंचायत में एक बैठक का आयोजन किया गया था जिसमें इस कृत्य की भर्त्सना कर सबने एक दूसरे को  विश्वास दिलायक था कि चाहे कुछ भी हो जाय हम अपने गॉव और समाज में इस ख ब की जड़ को जमने नहीं देंगे। मेरा पूरा गॉव राजपूतों का है, जिसमें हम चंद परिवार ही वहां ब्राह्मण हैं।  लेकिन मुझे अच्छे से याद है कि चुनाव के ऐन पहले यह बात जोर/शोर से प्रसारित की गयी थी कि बामण जजमनी ह्वेग्ये भाई…!

तब न मुझे ही कुछ समझ आया और न मेरे से बड़े गॉव के भाई बंधुओं को…! सच मानिए तो पिछले पन्द्रह-बीस साल से पहले तक हमें अपने गॉव में यह कभी महसूस नहीं हुआ कि क्या बामण, क्या जजमान और क्या शिल्पकार…! सब के वही नाते रिश्ते काकी बोडी ताऊ चाचा इत्यादि।
2014 का वह इत्तेफ़ाक में आज तक नहीं भूला जब वरिष्ठ साहित्यकार स्व चारु चंद चंदोला जी से इसी सम्बन्ध में बात हो रही थी, चुनाव परिचर्चा थी। तब उन्होंने बताया कि वे इस चुनाव को कवर कर रहे थे तो रूद्रप्रयाग में एक पेड़ पर बोर्ड टंगा था जैसे ईस्ट और वेस्ट कभी एक नहीं हो सकते वैसे ही और ब.…?

खैर चुनाव का रिजल्ट तब हिमवती नन्दन बहुगुणा के पक्ष में रहा और इस ख ब का उस चुनाव पर कितना असर हुआ यह नहीं कह सकता, लेकिन आज इसी राजनीति ने और   शब्द में इतनी गंद फैला दी है कि पहले यह 
और शब्द का ठीकरा तब चन्द्रमोहन सिंह नेगी के सिर फूटा जब कोटद्वार से बहुगुणा जी ने धूलिया जी की जगह भारत सिंह रावत जी को टिकट देकर यह बताने की कोशिश की कि यह जहर उन्होंने नहीं घोला है बल्कि इस पुड़िया को बाहर से लाकर गढ़वाल के गंगाजल में डाला जा रहा है..जिससे यह हमारे खून में शामिल हो।

ऐसा ही किस्सा सरोला बामण और गंगाडी बामण का भी रहा …। दोनों रिश्तेदारों का आपसी कलह आज भी इन ब्राह्मणों को दो धाराओं में बांटे हुए है, इसका असर पौड़ी गढ़वाल या टिहरी गढ़वाल में तो नहीं दीखता लेकिन चमोली के सरोला बामण आज भी यह बात नहीं भूलते।
गढ़वाली अखबार के जनक स्व. तारा दत्त गैरोला और स्व. गिरजा प्रसाद नैथाणी में अखबार को लेकर कुछ मन मुटाव हुआ और यह सरोला बनाम गंगाडी बामण में विभक्त हो गया तब गढ़वाली अखबार में गिरजा प्रसाद नैथाणी ने चुस्की लेकर सरोला ब्राह्मण तारा दत्त (दादर) के बारे में लिखा- सरोला बामण की दादर टर्रटर्र…!

ऐसे कई मजेदार प्रसंग हैं। अब आप ही देखिये चुनाव हुआ चन्द्र मोहन सिंह नेगी और हिमवती नंदन बहुगुणा के बीच …बंट गया पहाड़ी समाज।
झगड़ा हुआ दो रिश्तेदारों गैरोला और नैथाणी के बीच और बाँट दिए गए गंगाडी और सरोला …।
वाह रे नियति तेरा भी जवाब नहीं।

सच मानिए तो खस और बामण में बंटते, बांटते समाज में तब भी कुछ लोग इसे हिमवती नंदन बहुगुणा की देन मानते थे तो कुछ तर्क देते थे कि भला बहुगुणा ऐसा क्यों करेंगे जबकि तब भी राजपूत मतदाता अधिक थे वे ब्राह्मण कम…! ऐसे में भला खस-बामण की राजनीति से हिमवती नंदन बहुगुणा को क्या फायदा पहुंचेगा। स्वाभाविक है लोगों को समझ आ गया कि हो न हो यह सब चन्द्रमोहन सिंह नेगी का ही करा धरा न रहा हो। कोटद्वार के राजनेता भारत सिंह रावत को उत्तर प्रदेश विधान सभा का टिकट देकर हिमवती नंदन बहुगुणा ने लोगों के बीच यह संदेश दे डाला कि उनके दिमाग में कभी खस व बामण वाला प्रसंग नहीं रहा। अब यह उनकी राजनीतिक बुद्धि चातुर्यता थी या कूटनीति या फिर साफ दिल की साफगोई…! भारत सिंह रावत को टिकट बांटने के बाद यह दाग उनके वाइट कॉलर से उतरकर चंद्र मोहन सिंह नेगी के साथ साथ उनके पिता स्व. जगमोहन सिंह नेगी के वाइट कॉलर पर भी जा चिपका, जो जीवंत पर्यन्त उनके नाम के साथ जुड़ा रहा, लेकिन 100 में से 20 प्रतिशत लोग आज भी जब चन्द्रमोहन सिंह नेगी का नाम खस बामण फैलाने से जोड़ा जाता है तब हिमवती नंदन बहुगुणा को भी गुनाहगार मानते हैं।

यह आश्चर्यजनक है कि इस चुनाव में खस बामण फैलने फैलाने के बाद भी वोट बैंक में अल्पसंख्यक समाज के होने के बाद भी हिमवती नंदन बहुगुणा भारी मतों से विजयी घोषित हुए।

वर्तमान परिवेश में जहां भाजपा के राष्ट्रीय एजेंडे में जाति-पांति ऊंच नीच का कोई मोल नहीं है व इसे मिटाये जाने के लिए पिछले कई सालों से भाजपा के वरिष्ठ नेता निर्बल जाति के लोगों के घर खाना खाकर समाज को सन्देश देने की कोशिश करते रहते हैं कि हम हर धर्म जाति को बराबर का मानते हैं व उसमें कोई भेदभाव नहीं करते, फिर भी उत्तराखंड भाजपा के दो वरिष्ठ राजनेताओं को समाज का हर वर्ग धुर्र जाति विरोधी करार देता है व भाजपा के गिरे ग्राफ में उनकी इस मानसिकता को शामिल करता है। ऐसे में क्या भाजपा का थिंक टैंक कुछ सुधार करेगा व अपने सामाजिक समरसता के नारे को बुलंद रख पाएंगे? यह बड़ा यक्ष प्रश्न है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पास पक्का मानिए कि उनके गुप्तचरों की इस सम्बंध में रिपोर्ट गयी होगी क्योंकि तभी वह इस जाति-पाति के भेदभाव को पाटने की जद्दोजहद में लगे हैं। उन्होंने अपने कार्यालय से लेकर अपने पर्सनल घेरे तक के चक्रव्यूह संरचना में हर जाति धर्म से जुड़े व्यक्ति को रखा है। उनका अपने विधान सभा क्षेत्र में निर्बल वर्ग के व्यक्ति के घर भोजन करना भी हो न हो इसी खाई को पाटने की वजह हो और उन लोगों के लिए आईना जिन्हें खस बामण के झमेले में उलझने उलझाए रखने की दक्षता हासिल है।

Himalayan Discover
Himalayan Discoverhttps://himalayandiscover.com
35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
RELATED ARTICLES