“लोकपंचायत” ने रचा इतिहास! जौनसार की समाल्टा खत्त में एकत्रित हुए जौनसार बावर व तमसा पार हिमाचल के 75 सयाना।
◆ पहली बार भगवा पगड़ी में नजर आए जौनसार के स्याणा।
◆ जौनसार बावर के राजनेताओं व कार्यकर्ताओं की बढ़ी बेचैनी।
◆ तो क्या स्वतंत्र भारत के जमाने में लौटेगा विधायक एवं मंत्री गुलाब सिंह का युग।
◆ क्या नेता केदार सिंह का फिर होगा पुनर्जन्म जो कहेंगे- अब दो अंग्रेजी तलवारें टकरा रही हैं (गुलाब सिंह बनाम शूरवीर सिंह
चौहान)।
◆ क्या चमन सिंह खेलने जा रहे हैं नई चुनावी पारी?
(मनोज इष्टवाल)
इसको कहते हैं संघ की शक्ति! न…न भूल से इस पर संघ यानि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का ठप्पा मत लगा देना, क्योंकि आजकल अगर आप किसी को संग चलने की बात भी कहते हैं तो वह उसे आरएसएस से जोड़कर देखता है। उत्तराखंड में राजनैतिक दल चुनावी मॉड पर जो हैं। जौनसार बावर में विगत दिवस अर्थात 22 अक्टूबर 2021 को हुए ऐतिहासिक सयाना पंचायत में भले ही मंच से हर लोकपंचायत के सदस्य को जब भी मौका मिल रहा था वह हर बार एक बात जरूर कहता कि यह मंच पूरी तरह गैर राजनीतिक है, लेकिन वहां सयाना या अन्य लोगों के चेहरों के साथ लिपटी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता दिशायमान थी। लाइव देखने के लिए दूर दराज शहरों व गांवों में बैठे जौनसारी-बाउरी समाज के राजनीतिज्ञ व कार्यकर्ताओं की दृष्टि अपने मोबाइल फोन से हटी नहीं। सच कहें तो “लोकपंचायत” के इस अनूठे कार्यक्रम ने सबकी फूंक सरका कर रख दी। चाहे वह राजनीतिज्ञ हो या गैर राजनीतिक या फिर आम जौनसार-बावर का निवासी।
कैसे सरकेगी फूंक…? यह प्रश्न सबके मन में होगा तो इसका सीधा सा जबाब है कि अब कहीं फिर से चुनावी दंगल में नमक लोटा परम्परा वैसे ही नहीं लौटे जैसे उत्तर प्रदेश के जमाने के शुरुआती बर्षों में होता था। या फिर पुरोला विधान सभा में हुए विगत विधान सभा चुनाव में हुई राजनीतिक भिड़ंत में पर्वत व आराकोट क्षेत्र में दुर्गेश-माल चंद व राजकुमार के लिए नमक-लोटा हुआ था।
क्या है नमक लोटा परम्परा।
नमक लोटा परम्परा में अक्सर खत्त स्याणा, लम्बरदार, या थोकदार पूरी खत्त के लोगों को एक पक्ष में मतदान करवाने के लिए राजी करता है। मुंह जुबानी सबकी सहमति बन गयी तो बाद में एक लोटे में पानी भरकर अपने देवता को हाजिर नाजिर मानकर बारी-बारी से लोग उसमें एक एक चुंगटी नमक डालकर विश्वास दिलाते हैं कि वे आम सहमति के साथ हैं। यह खत्त से गांव व गांव से घर-घर तक “नमक लोटा” परम्परा चलती थी।
पहली बार भगवा पगड़ी में नजर आए जौनसार के स्याणा।
नए युग के साथ कदमताल करती “लोकपंचायत” ने सभी सयानाओं के आमंत्रण को स्वीकार कर “लोकपंचायत” में भागीदारी निभाने हेतु पहुँचने पर उन्हें पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया। अब भगवा पगड़ी को पहने स्याणाओं ने कुछ सोचा होगा कि नहीं लेकिन आम लोगों के कानों से गुजरती आवाज मेरे कानों तक भी पहुंची, और आखिरकार जाड़ी-जगथान के स्याणा जी के मुंह से यह निकल ही गया कि हम लोक समाज को लेकर इकट्ठा हुए हैं तो हमारी लोकपरम्परायें भी उसमें जिंदा रहनी चाहिए क्योंकि जितने भी हम स्याणा आये हुए हैं उनमें से बमुश्किल तीन या चार स्याणा ही ऐसे हैं जो अपनी पारम्परिक पोशाक में हैं बाकी जौनसारी टोपियों के स्थान पर हिमाचल की टोपी पहने हुए हैं। तब तक मंच पर बैठे अटाल के सुप्रसिद्ध कृषक पद्मश्री प्रेम चंद शर्मा बोल पड़े कि उन्होंने भी तो ठेठ जौनसारी परिधान पहने हैं। फिलहाल भगवा पगड़ियों के साथ खिंची सभी सदर स्याणा व खाग सयानाओं की फोटो ऐतिहासिक हुई जिन्होंने 175 साल बाद एकत्र होकर “लोकपंचायत” के इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई।
जौनसार बावर के राजनेताओं व कार्यकर्ताओं की बढ़ी बेचैनी।
“लोकपंचायत” ने मात्र 6वें साल में प्रवेश करते ही अपने को साबित कर दिया कि “संघ शक्ति” का वास्तविक अर्थ क्या है। यह एक ऐसा गैर राजनीतिक संगठन है जो 21 अक्टूबर तक लगभग 1500 सदस्यों के साथ जौनसार बावर के सामाजिक मूल्यों व उसमें बढ़ती पाश्चत्य दखल पर हस्तक्षेप कर पुनः समाज के सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों की वकालत कर समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए पूरे वचनवद्ध तरीके से जुटा हुआ है। 22 अक्टूबर आते-आते यह लोकपंचायत सारे जौनसार बावर के लोकसमाज का अंग बन गया है। यही नहीं उन्हें तमसा पार हिमाचल से भी उनके वहां आने का आमंत्रण मिला है जो “लोक पंचायत” की उपलब्धि कही जा सकती है। दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि सभी खत्तों के सदर स्याणा व खाग सयानाओं के इस सम्मेलन में एकत्र होने पर अब ऐसा आभास हो रहा है कि एकाएक लोकपंचायत का कद राजनेताओं के आगे बढ़ा हो गया है। राजनीतिक पार्टियों व उनके नुमाइंदों को अब यह डर सताने लगा होगा कि कहीं चुनावी समर आने वाले समय में एकतरफा ना हो, क्योंकि इस तरह सदर स्याणा व खाग स्यानाओं तक लोकपंचायत की सीधी पहुंच कुछ भी कर करवा सकती है। जिससे किसी भी दल के राजनीतिक समीकरण बिगड़ सकते हैं। इस से न सिर्फ राजनीतिक दलों में बल्कि उनके कार्यकर्ताओं में भी बेचैनी बढ़ना लाजिम होगा क्योंकि अगर खत्त या सदर सयानाओं की “खुमडी” ने किसी एक के पक्ष में मतदान करने को कह दिया या नमक लोटा हो गया तो उनके लिए मुसीबत हो सकती है। बहरहाल “लोकपंचायत” बार बार यही कह रही है कि उनका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है, भले ही सभी सदस्य व्यक्तिगत तौर पर किसी भी दल के समर्थक क्यों न हों।
तो क्या स्वतंत्र भारत के जमाने में लौटेगा पूर्व विधायक एवं मंत्री गुलाब सिंह का युग।
यहां आम जन की अवधारणा है कि सयानाचारी के पुनः प्रभुत्व में आने से हो न हो इनके बीच राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ जाए व जौनसार बावर के एक युग के सर्वमान्य नेता गुलाब सिंह का युग लौट आये। पूर्व में जौनसार बावर क्षेत्र से कई बर्ष विधायक व मंत्री रहे गुलाब सिंह जी की यादें ताजा करते लोग कहते सुनाई दिए कि उस दौर में उन्हीं के नामराशि ठाणा गांव के प्रमुख रहे स्याणा गुलाब सिंह उनके प्रतिनिधि के रूप में बैठकें लिया करते थे व ज्यादात्तर लोग उन्हें ही विधायक या मंत्री समझ लेते थे। वहीं लोगों का यह भी कहना है कि जब सयानाओं के साथ विधायक या मंत्री के रूप में गुलाब सिंह मिलते थे तब ज्यादात्तर लोग “तीरे” अर्थात खिड़की के झरोखे से उन्हें देखने व पहचानने की कोशिश करते थे।
क्या नेता केदार सिंह का फिर होगा पुनर्जन्म जो कहेंगे- अब दो अंग्रेजी तलवारें टकरा रही हैं (गुलाब सिंह बनाम शूरवीर सिंह चौहान)?
मानों न मानो लोकपंचायत ने लोक समाज के लोगों को अतीत की यादें ताजा करने का सुनहरा अवसर तो प्रदान कर ही दिया है। लोकपंचायत व समाल्टा खत्त के सामूहिक प्रयास से तैयार इस मंच पर गांव समाल्टा में हुए इस ऐतिहासिक सम्मेलन को कई जौनसारी समाज के लोगों ने नेता केदार सिंह से जोड़कर देखा व कहा कि जब गुलाब सिंह गांव बर्नाड व शूरवीर सिंह चौहान गांव लखवाड़ विधायक का चुनाव लड़ रहे थे तब नेता केदार सिंह ने इन्हें दो अंग्रेजी तलवार नाम से संबोधित किया था। शायद वह इसलिए कि ब्रिटिश साम्राज्य की समाप्ति पर ब्रिटिश सरकार सभी खत्त सयानाओं को यादगार के रूप में एक एक तलवार भेंट करके गए थे।
क्या चमन सिंह खेलने जा रहे हैं नई चुनावी पारी?
बतौर स्याणा दो बार पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रहे वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह के छोटे भाई चमन सिंह बतौर सदर स्याणा यहां उपस्थिति दर्ज किए तो राजनीतिक हलकों में शोर तो सुनाई देना ही था। इस दौरान उनके उद्बोधन में राजनीति ढूंढने की भी कय्यासबाजी शुरु हुई। लोगों का मानना है कि उनके उद्बोधन से ऐसा जाहिर हो रहा था कि वे अब कोई बड़ी राजनीतिक पारी खेलने के फिराक में हैं।
बहरहाल यह सब बातें “फेस इन द क्राउड़” मान ली जानी चाहिये क्योंकि इस सम्मेलन में क्या हुआ उस से ज्यादा मायने यह लोक धारणा की होती है कि उनकी सोच इस सम्बंध में कहाँ से कहाँ तक पहुंची है। एक तरफ “लोकपंचायत” इसे व खुद को गैर राजनीतिक मानती है और दूसरी ओर आम जन इसमें भी राजनीति ढूंढ रहे हों तो बातें सभी समक्ष लाई जानी लाजिम सी बात है।
सच कहें तो “लोकपंचायत” जो बिना किसी एक पदाधिकारी के भी इतनी बड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रही है, इस बात के लिए बधाई का पात्र है कि उनके द्वारा लोक समाज के हितों के लिए किए जाने वाले ऐसे विलक्षण प्रयास इतिहास में दर्ज होंगे।
वर्तमान में लोकतांत्रिक व संवैधानिक व्यवस्थाओं में सयानाचारी व्यवस्था के क्या अधिकार जनजातीय क्षेत्रों के लिए आरक्षित हैं वह भी पढ़ा जाना चाहिए व साथ ही ब्रिटिश काल में जारी संवैधानिक व लोकतांत्रिक व्यवस्था “दस्तूर-ऐ-उलूम” का संज्ञान भी लिया जाना चाहिए कि किस तरह यह सयानाचारी व्यवस्था चलाई जाती थी। साथ ही पंचायती राज व्यवस्था का भी संज्ञान ले लिया जाना चाहिए जो वर्तमान में लागू है। जनजातीय क्षेत्र की खुशहाली व समृद्धि के लिए यह व्यवस्था तक ज्यादा मायने रख सकती है जब यह इस लोक समाज के भौतिक युग के प्रवेश में अपने पारम्परिक स्वरूप को जिंदा रखने की ललक हो। अब उसमें चाहे सामाजिक मूल्यों के आधार पर सयुंक्त परिवार व भाई चारे के साथ लोक उत्सव हों या सांस्कृतिक मूल्यों के साथ अपने रीति रिवाज-पहनावा आभूषण व अन्य प्रकार। लेकिन इतना तो अभी भी इस समाज में जिंदा है कि यहां की मातृशक्ति जौनसार हो या देहरादून या फिर दिल्ली…अपने समाज के मांगलिक कार्यों में अपने लोक पारम्परिक परिधानों के साथ उपस्थिति दर्ज कर अपने वजूद का परिचय देती हैं, जो साबित करता है कि यदि संस्कृति जिंदा है तो समाज स्वयं ही जिंदा रहेगा।
सम्पूर्ण सम्मेलन में सबसे ज्यादा चिंता अगर किसी बात को लेकर सामने आई तो वह आई कि समाज में युवाओं के बीच पनप रही नशाखोरी को रोकने के लिए क्या सामूहिक प्रयास किये जायें। साथ ही लोकपंचायत ने एक मुद्दा जो बहुत तल्ख तरीके से सामने रखा व उसे अक्षरत: लागू करने की बात कही वह यह कि बढ़ने पर्यटन व पर्यटकों द्वारा क्षेत्र में किसी भी तरह की बदसलूकी बर्दास्त नहीं की जाएगी व उसके लिए सम्पूर्ण जौनसार बावर में लोकपंचायत पोस्टर चस्पा करेगी। इस बात यकीनन स्वागत होना चाहिए लेकिन साथ ही साथ जौनसार बावर की आम जनता से लोकपंचायत को यह भी अनुरोध करना चाहिए कि “अतिथि देवो भव:” की परंपरा तब तक लागू हो जब तक अतिथि क्षेत्र में देवतुल्य व्यवहार आचरण रखे।
बहरहाल इस आयोजन के लिए लोकपंचायत की पीठ थपथपाई जानी चाहिए, व उसके उस समूचे “थिंक टैंक” को शाबाशी भी दी जानी चाहिये जिसने अपने लोक समाज को जिंदा रखने की पैरवी हेतु इतना बड़ा सम्मेलन आयोजित किया। फिर भी एक प्रश्न मन में है कि क्या खत्त बहलाड के 15 गांवों की तरह लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत हर पांच साल में सयानाचारी के स्थान पर चुनाव में अध्यक्ष चुना जाय या बदस्तूर सयानाचारी जिंदा रख ₹1/- पर नालस परम्परा को जीवित रखा जाय ताकि हर छोटी-बड़ी ग्रामीण समस्याएं ग्राम स्तर पर ही निबटाई जाएं। ज्ञात हो कि ब्रिटिश काल में सयानाचारी के लिए स्याणा को 1000 रुपये वेतन मिलता था जबकि वर्तमान में ऐसी कोई राज व्यवस्था नहीं है जो सयानाचारी को वेतन भुगतान किया जाय।








