Wednesday, January 21, 2026
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उत्तराखंड के साहित्यकारों को भूल गई सरकार। उत्तराखंडी बोली/भाषाओं से अधिकारियों का कोई लेना देना नहीं।

उत्तराखंड के साहित्यकारों को भूल गई सरकार।

(कौस्तुभ आनंद चंदोला सदस्य, समिति उत्तराखंड भाषा संस्थान)

यह जानकर आश्चर्य होगा कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से आज तक प्रदेश के किसी साहित्यकार को प्रदेश सरकार की तरफ से किसी प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया है। वह भी तब, जबकि इन वर्षों में एक मुख्यमंत्री ऐसे भी रहे, जो खुद साहित्यकार हैं।
देश में उत्तराखंड शायद ऐसा राज्य है, जहां साहित्यकारों के लिए किसी प्रतिष्ठित पुरस्कार की योजना नहीं है। जबकि दिल्ली, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अपने लेखकों को हर साल प्रतिष्ठित पुरस्कार देकर सम्मानित करते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार जितेन ठाकुर कहते हैं कि प्रदेश में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो उसके पास साहित्यकारों के बारे में सोचने तक की फुर्सत नहीं रही है। बताते हैं कि जब हिंदी अकादमी की निदेशक डॉ. सविता मोहन हुआ करतीं थी तो गढ़वाली और कुमाऊंनी के कुछ लेखकों को सम्मानित किया गया था।
लेकिन उसके बाद से आज तक याद नहीं आता कि किसी लेखक को सरकार ने किसी तरह का पुरस्कार दिया हो। कहते हैं कि यहां हिंदी अकादमी के पास न तो पुराने लेखकों को सम्मानित करने की योजना है और न ही नवोदित लेखकों के लिए।
आधारशिला पत्रिका के संपादक दिवाकर भट्ट कहते हैं कि एक साल सरकार ने कुछ साहित्यकारों को सम्मानित किया था। लेकिन उसमें भी बड़ा मजाक यह था कि लेखकों को सम्मान राशि 250 रुपए दी गई थी, जबकि जिस होटल में लेखकों को ठहराया गया था उसका बिल 25000 रुपए भरा गया। उनका कहना है कि सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश में लेखकों की ऐसी उपेक्षा अफसोस जनक है।
राज्य बनने के दस साल बाद हिंदी अकादमी की स्थापना साहित्य और साहित्यकारों के प्रति प्रदेश सरकारों के सरोकारों का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य बनने के दस साल बाद वर्ष 2010 में हिंदी अकादमी की स्थापना की गई। इसी साल ही अमर उजाला में यह लेख लगभग 10 साल पहले प्रकाशित हुआ था। लेकिन इन संस्थानों की हालत आज भी जस की तस है या बल्कि पहले से भी बदतर हो चुकी है।
सभी एकेडमीयों को मिलाकर एक संस्थान का निर्माण जून २०१८ में किया गया था। जिसका नाम ‘उत्तराखंड भाषा संस्थान’ रखा गया है। मात्र इसी को एक उपलब्धि माना जा सकता है यदि आप इसे उपलब्धि समझते हो तो? सरकार तो शायद ऐसा ही समझती है। लेकिन आज भी उत्तराखंड भाषा संस्थान की स्थिति जस की तस है। या ये कहें कि पहले से बदतर है। यहां पर कोई भी अधिकारी पूर्णकालिक नहीं है।मात्र कुछ अधिकारियों को उनके मुख्य कार्य के अतिरिक्त यहां का भी कार्यभार भी दे दिया गया है जिस में वे कोई विशेष रूचि नहीं रखते हैं। संभवतया बजट भी काफी कम होगा जिस कारण अधिकारियों का ध्यान इस तरफ ध्यान न होना लाजिमी है यह भी कटु सत्य है। जिस प्रदेश ने हिंदी साहित्य को महान लेखकों साहित्यकारों कवियों को दिया जिन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया । ऐसे प्रदेश में साहित्यकारों की अनदेखी होना बहुत अशोभनीय लगता है। साथ ही स्थानीय बोली भाषा गढ़वाली, कुमाऊनी, जौनसारी, गुरुमुखी आदि के उत्थान और उन्नति के लिए कोई भी कदम न उठाया जाना एक शर्मनाक विषय है। उत्तराखंड राज्य की स्थापना के साथ कई आशाएं जुड़ी थी लेकिन बोली-भाषा के उत्थान के संदर्भ में कोई भी काम उत्तराखंड में होता दिखाई नहीं दे रहा है।
क्या इसी तरह एक संस्थान बना देने और उसके लिए बिल्डिंग को किराए पर लेकर लाखों खर्च करने से ही क्या साहित्य और बोली भाषा का उत्थान हो जाएगा।
सभी साहित्यकारों, लेखकों, बोली-भाषा के विद्वानों और पत्रकारों को इस पर आगे बढ़कर कलम चलानी होगी और कुंभकरणी की नींद में सोयी अफसरशाही और सरकार को जगाना होगा।

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