# आखिर आदमखोर बाघ को करनी पड़ी कौल-करार कि कभी मौंदाडस्यूं का रुख नहीं करेगा। जानिए क्या है आदमखोर व ईड-गोर्ली के सिद्ध की सच्चाई।
(मनोज इष्टवाल)
(फोटो साभार- नवीन कंडवाल)
चौंदकोट यानि गढ़वाल राज्य को विस्तार देने वाले रणबांकुरों की धरती..! लेकिन जब पश्चिमी नयार की बात आती है, तब बदन के रोवें खड़े हो जाते हैं। यह वह क्षेत्र है जिसमें नयार के दाएं छोर पर गोर्ला व सिपाही नेगियों का अधिपत्य रहा तो बाएं छोर पर भौं रिखोला व लोदी रिखोला जैसे भड़ का गांव बयेली बदलपुर..! यहीं बात खत्म हो जाती तो कोई बात नहीं थी लेकिन केर्द से लेकर रीठाखाल तक सड़क नीचे फैले बेहद भयावक व घने जंगल में घूमते शेर-बाघ- चीता- भालू जैसे कई प्रजाति के हिंसक पशु व परियों की गुफा, ध्वर्या उडयारी, बेताल-समैंणा, सोरणी बबल्या भ्याल व सिद्ध बाबा पीपल जैसी कई विस्मयकारी शक्तियां यहां मौजूद हैं। लेकिन सदियों से रिकॉर्ड है कि इस क्षेत्र में मैस्वाक (आदमखोर बाघ) कभी किसी की जान नहीं ले पाया। और तो और इस भयंकर जंगल में इतनी विकट चट्टान, घाटियां व खाईयां हैं कि जरा सी गलती आपकी जान जोखिम में डाल सकती है, लेकिन आज तक कभी ऐसी अनहोनी इस क्षेत्र में नहीं हुई। यह सचमुच आश्चर्यजनक है। इस तथ्य की पड़ताल करने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी।
बात-बात पर किशनपुरी कोटद्वार के अध्यापक नवीन कंडवाल से बातचीत हुई तो बात किशनपुरी से कोटद्वार-दुगड्डा-गुमखाल-सतपुली से सड़क-सड़क होती हुई सतपुली-रीठाखाल-सँगलाकोटी मार्ग की ओर मुड़ गयी। और आकर गोर्ली-ईड के नीचे सड़क किनारे के पीपल में विश्राम करने लगी। नवीन कंडवाल ने बताया कि वर्तमान में वहां उदय सिंह रावत का इस स्थान में “औरण्या द मिस्ट्रीकल हिमालयन रिसोर्ट्स” नामक सुंदर कैम्प रिसोर्ट है। बातचीत पीपल डाली के चबूतरे में रखे गंगलोडू (शिबलिंगकार पत्थर) पर चढ़ाई जाने वाले घास-पत्ती पर आकर ठहर गयी। नवीन कंडवाल बोले- जाने क्यों पुराने लोग आज भी आते जाते वहां घास-फूल-पत्ती चढ़ाते हैं। मुझे बरबस ही कण्वाश्रम की वह ट्रैकिंग याद हो आई जो हमने कण्वाश्रम से राजदरबार तक की थी व बीच में एक घसियारी मंदिर देखा था जिसमें जंगल घास लकड़ी काटने जाने वाली महिलाएं जंगल से प्रार्थना करती थी कि हमें सुरक्षित घर पहुंचा देना। और इसी लिए वह इस स्थान में एक मुट्ठी घास चढ़ाया करती थी। वहीँ उन्होंने जानकारी दी कि सड़क पर काम कर रहे मजदूरों को एक ओखल टाइप पत्थर को उन्होंने किनारे लगाकर नीचे लुढकाने से रोका व उसका फोटो खींचकर एक सुरक्षित स्थान पर रखवा दिया था ! हो न हो उसमें भी कोई पुरात्विक बातें हों?
(फोटो साभार- नवीन कंडवाल)
सिद्ध बाबा का पीपल (डांग्यूँखाल)
कोटद्वार-सतपुली-पौड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग पर सतपुली से लगभग 2 किमी आगे चौंदकोट जनशक्ति मार्ग तक पहुंचने पर आपको राष्ट्रीय राजमार्ग छोड कर चौंदकोट जनशक्ति मार्ग से लगभग 17 किमी आगे “औरण्या द मिस्ट्रीकल हिमालयन रिसोर्ट्स” के गेट पर पहुंचना होगा। आपको चौंदकोट जनशक्ति मार्ग-मलेठी बैंड-स्टोनक्रेशर- धौंरीघोरा होते हुए मुंडेरी बैंड पहुंचना है। जहां से बाई तरह मोड़ मुड़ती हुई सड़क चढ़ाई नापती हुई एकेश्वर पहुंचती है। आपने मुंडेरी बैंड से मुड़ना नहीं है बल्कि सीधे आगे बढ़ते हुए गादई गांव के ज्वाल्पा मंदिर-चमडल होते हुए डांग्यूँ खाल यानि “औरण्या द मिस्ट्रीकल हिमालयन रिसोर्ट्स” तक पहुंचना है। जो सतपुली से 19 किमी की दूरी पर अवस्थित है व यहाँ तक आप अपनी कार से 35 से 45 मिनट में आसानी से पहुंच सकते हैं। यह स्थान गढ़वाल राज्य के सूरमा राजपूतों “सिपाही नेगियों” की सरहद अर्थात ईडा गांव की सरहद पर बसा हुआ है जिसे यहां के लोग सिद्ध बोलते हैं।
यह वह स्थान है, जहां से आप सामांतर दूरी पर ध्वर्या उडयारी, ग्वली की समैंणा, सोरणी की गुफा, तमखानी की आँछरी गुफा की ठौs ले सकते हैं। बयेली गाँव के वीर भड़ लोदी रिखोला से शुरू होकर ग्वली की समैणा, बबल्या भ्याळ की आँछरी, घसेन्यू के खाजा, पास्ता-बंदूण के बुक्साड़ी जागरी व नकधार के भूत लड़वा धस्माना पंडितों तक यह एक ऐसा रोचक वृतांत है कि आंखें यकीन न करें, मन गवाही न दे और जुबान बोल पड़े सब झूठ है। लेकिन है अकाट्य सत्य! क्योंकि कोई झूठ ज्यादा दिन तक नहीं टिकता और ये तो बर्षों से निरंतर यूँही होता आ रहा है। तमखाणी की आँछरी गुफा इन चांदना में रात्री काल में कभी कभी उजाला दिखता है व घुघुरुओं की घमक, नृत्य, हंसी, खिलखिलाहट, अट्टाहास इत्यादि की आवाजें सुनाई देती है।
इस स्थान की जानकारी व लोकमान्यताओं का पीछा करने में लिए व नवीन कंडवाल की बात की पुष्टि के लिए मैंने कबरा गांव के अपने व्यवसायी मित्र संजय नौडियाल से दूरभाष पर जानकारी जुटाने का अनुरोध किया। फिर क्या था शाम होते होते जानकारी अपडेट होने लगी।इडा मल्ला गांव के वाई एस नेगी उर्फ जसवीर नेगी से प्राप्त जानकारियों ने सारे असमंजस को खत्म कर दिया। उन्होंने बताया कि हमारे पूर्वजों ने आस्था व विश्वास के साथ एक गंगलोडू (नयार नदी का शिबलिंगकार पत्थर) लाकर पीपल वृक्ष के चबूतरे में यहां स्थापित किया और उसे ही अपनी आस्था का केंद्र मानना शुरू कर दिया। कालांतर में कितनी सदियों पूर्व ऐसा हुआ होगा यह उन्हें भी नहीं मालूम….! लेकिन यह जरूर है कि इस पत्थर को सब सिद्ध के नाम से जानने लगे व जंगल आते जाते इसमें फूल पत्ती व घास चढ़ाकर माँ बहनें मन्नत मांगती कि इस भयावक जंगल में वह ही उनकी रक्षा करें।
(फोटो साभार- जसवीर नेगी)
यह आश्चर्यजनक है लेकिन अकाट्य सत्य कि इस सिद्ध बाबा की मेहरबानी से आज तक कभी किसी जंगली जानवर, भूत प्रेत, शमशानी समैणा, ऐड़ी-आँछरी, परियों ने किसी का कभी कोई अहित नहीं किया। गोर्ली व इड़ा गांव के लोग हर साल इस पीपल डॉली के सिद्ध की पूजा करते हैं व यहां रोट प्रसाद चढ़ाते हैं। वर्तमान में यह सिद्ध पीपल डाली के नीचे ही विराजमान हैं या नहीं यह कहना सम्भव नहीं है क्योंकि पहले यह पीपल डाली सड़क के बैंड के किनारे मौजूद थी जहाँ आते जाते लोग गर्मियों में विश्राम करने के लिए बैठा करते थे। ईडा व गोर्ली (ग्वली) गाँव की माँ-बहनें घास-लकड़ी का बोझा लेकर थकान मिटाने बैठती थी। नयार घाटी के मरघट में चिता जलाकर लौटने वाले हों या फिर मच्छी मारकर लौटने वाले ग्रामीण हों सभी का नदी-छोर से जंगल पार का यही विश्राम स्थल होता था। यहाँ पीपल की पत्तियों से छनकर गर्मियों में आने वाली हवा तन-मन को शांत कर देती थी। लेकिन वर्तमान में न घसेरी माँ-बहनें ही हैं न आस्था धर्मी वे लोग जो आकर पीपल के सिद्ध को घास पत्ती चढ़ाकर अपनी हृदयरूपी आस्था प्रकट करते थे। जसवीर नेगी बताते हैं कि उस काल में पैंसा कम था लोगों के पास अपनी आस्था प्रकट करने के लिए सिर्फ हृदय का प्रेम था। माँ-बहनें जब जंगल में घास-लकड़ी काटने जाया करती तो यहाँ आस्था के दो घास-पत्ती या एक मुट्ठ घास चढ़ाकर जाती व प्रार्थना करती- हे सिद्ध बाबा हमारी जंगली जानवरों व अनिष्ठकारी शक्तियों से रक्षा करना। इसी आस्था के ओत-प्रोत सिद्ध बाबा की महिमा से इस घनघोर जंगल में कभी कोई अशुभ घटना नहीं घटी।
यह सब मेरे लिए ज्यादा चौंकाने वाला नहीं था क्योंकि इससे पूर्व जब मैं मालन घाटी के जंगलों में राजा दुष्यंत-शकुन्तला ऋषि दुर्भासा, कण्वा, विश्वामित्र व मेनका के वैदिक युग की तलाश में जुटा था तब राजदरवार को जाने वाले विकट जंगल में मैंने ऐसे ही एक घसियारी मंदिर को तलाशा था जहाँ भावर क्षेत्र की महिलायें घास लकड़ी को जाती हुई जंगली जानवरों से अपनी आत्मरक्षा के लिए ऐसे ही कटे घास की एक मुट्ठी चढ़ाकर प्रकृति व वन्य देवताओं व जानवरों से अपनी प्राण रक्षा की प्रार्थना करते थे। वास्तव में प्रकृति व हमारी माँ-बहनों का यह मूक संवाद कितना भावनात्मक है, यह हम सबको महसूस करना होगा। अक्सर सुनने को मिलता है कि भगवान किसने देखा है, भगवान तो कण-कण में वास करता है! शायद यहाँ भी कुछ ऐसा ही महसूस होता है।
आदमखोर बाघ।
यह यकीनन आश्चर्यजनक है कि आजतक सम्पूर्ण चौन्दकोट ही नहीं बल्कि गढवाल कुमाऊं में मैस्वाक/मनस्वाग (आदमखोर बाघ) ने कई लोगों को अपना निवाला बनाया है। ओंन रिकॉर्ड अगर देखा जाय तो हमारे पास लगभग 150 से 175 साल का रिकॉर्ड है जब आदमखोर बाघ ने सम्पूर्ण गढवाल कुमाऊं में अपनी दहशत से कई जानें ली, लेकिन पश्चिमी मोंदाडस्यूं में कभी आदमखोर बाघ ने अपनी दखल नहीं दिखाई। एक दिन आम आदमी पार्टी के नेता दिग्मोहन नेगी व संजय नौडियाल चौन्दकोट के किसी क्षेत्र के भ्रमण पर रात्रिकाल की वीडियो साझा कर सडक मार्ग के खस्ताहाल का बयाँ कर रहे थे तब मैंने चुहल की व लिखा कि सावधान…आगे बाघ भी हो सकता है। कहीं निवाला न बनाए। तब संजय ने फोन करके बोला- मनोज भाई, आप भूल गए मैं मोंदाडस्यूं का हूँ व मोंदाडस्यूं वालों को देख बाघ की हिम्मत नहीं जो उन्हें निवाला बना दे।
मुझे लगा यह बात हंसी मजाक में संजय बोल गए लेकिन अब जब डांग्यूंखाल के सिद्ध पर चर्चा हुई तो पता चला इस आदमखोर के पीछे की कहानी है क्या? जनश्रुतियों के अनुसार इसी क्षेत्र का एक व्यक्ति तराई बावर से बुक्साडी विद्या सीखकर आया। कुछ तराई भावर की जगह जौनसार बावर मानते हैं! व वह अपनी विद्या से कभी भी कोई भी रूप रख लेता था। उसकी छोटी बेटी ने कहा- पिताजी, सब लोग कहते हैं कि तेरे बाप में ऐसी विद्या है कि वह बाघ बन जाता है। बाप बेटी को टालता रहा कि ऐसा कुछ नहीं है लेकिन वह भला कहाँ मानने वाली थी। बाल हठ जो ठहरा..! आखिर बाप बोल पड़ा- ठीक है मैं बाघ बनकर दिखाता हूँ लेकिन तुम सामने मत रहना वरना मैं तुम्हे खा जाऊंगा। बेटी बोली ठीक है लेकिन यह मानकर कि भला मेरे पिटा जी बाघ बन भी गए तो मुझे कैसे खा पायेंगे वह वहीँ खड़ी रही। अपनी तन्त्र विद्या से वह व्यक्ति बाघ बन गया व पास खड़ी बेटी को ही उसने मारकर खा दिया। कुछ समय पश्चात वह जब अपने रूप में लौटा व बेटी की आधी खाई हुई लाश देखी तो रो पड़ा! हो-हल्ला हुआ तो गाँव इकठ्ठा हो गया। वह चीख-चीखकर कहता रहा कि मैं ही बेटी के कहने पर बाघ बना और मैंने ही उसे खाया लेकिन भला कौन मानने वाला था।
कुछ लोगों का मानना है कि यह ब्रिटिश काल की घटना है तो कुछ कहते हैं उससे भी पुरानी और कुछ ज्यादा पुरानी घटना नहीं मानते! कुछ का मानना है कि यह केस राजा श्रीनगर के पास गया कुछ का कहना है कि पौड़ी कोर्ट में तो कुछ इसे कुमाऊं कमिश्नरी में बताते हैं व कुछ इसे गाँव तक ही सीमित बताते हैं। लोगों का कहना है कि यह बात आग की तरह चारों तरफ फ़ैल गई। एक दिन मुकर्रर किया गया व उस व्यक्ति को बोला गया कि वह भरी पंचायत में सबके सामने बाघ बनकर दिखाए! इस दौरान पास्ता-बंदूण के जागरी-तांत्रिक, नकदार गाँव के भूत लडवा ब्राह्मणों को भी बुलावा भेजा गया और जैसे ही उस व्यक्ति ने बुकसादी विद्या से अपने शरीर को बाघ के शरीर में ढालना शुरू किया। इन्हीं तांत्रिकों में से किसी एक ने उसकी पूछ पकड़कर उसमें अपनी तंत्र छुर्री से वार कर दिया वह असहनीय पीड़ा से चिल्ला पड़ा व अपने आप को छोड़ने की बात करने लगा लेकिन इन तांत्रिकों ने उसे छोड़ा नहीं ! आखिर उसे कौल-करार देना पड़ा कि आज से इस क्षेत्र में कभी भी कोई आदमखोर का शिकार नहीं होगा। वह इस क्षेत्र की दिशा बंधन करेगा और दुबारा मनुष्य योणि धारण नहीं करेगा। तांत्रिकों ने उसकी पूँछ पर खरवे (राख) की झोली (पोटली) लपेटी व उसे छोड़ दिया। यह व्यक्ति बाघ के रूप में जहाँ-जहाँ गया वह राख वहां वहां दिशा बंधन करती चली गयी और अंत यह हुआ कि इतने साल गुजरने के बावजूद भी आज तक इस क्षेत्र में कभी आदमखोर बाघ लगने की बात सामने नहीं आई।
बहरहाल इन सब बातों में कितनी सच्चाई है यह कहा नहीं जा सकता लेकिन गढवाल का ज्यादात्तर इतिहास इन्हीं किस्सागोई व किंवदन्तियों में समाहित है, इसलिए यहाँ लोग अभी भी इस बात पर विश्वास रखते हैं। वैसे कहा जाता है कि ऐसे प्रकरण एक सदी तक ही अपना चमत्कार दिखाते हैं व जब तक उस व्यक्ति को मुक्ति नहीं मिलती तब तक उसका प्रभाव बना रहता है और जैसे ही मुक्ति मिलतई है उसका एक काल के बाद प्रभाव नष्ट हो जाता है। फिलहाल अभी भी पश्चिमी मोंदाडस्यूं आदमखोर मुक्त क्षेत्र माना जाता है। वर्तमान में यह स्थान योग साधकों के लिए सबसे मुफीद स्थान है क्योंकि इस से कुछ ही दूरी पर अवस्थित रीठाखाल के मीठे रीठा वृक्ष के नीचे कभी सिखों के गुरु नानक ने तपस्या की व इसी कारण आज भी इस क्षेत्र में सिख नेगियों के दो तीन गांव हैं। “औरण्या द मिस्ट्रीकल हिमालयन रिसोर्ट्स” में लोग ध्यान व योगसाधना के साथ प्रकृति सुख भोगने आया करते हैं।



