अपनी ही पुस्तक को अपने अजब गजब ढंग से आत्मकेंद्रित करने वाले डॉ अरुण कुकसाल की यह पुस्तक यकीनन आपको कुछ अनमोल यात्राओं का ऐसा तोहफा देने वाली हैं कि आप कहोगे चलो रुकसेक तैयार करो, पहाड़ घूम आते हैं। उनकी पुस्तक क्या कहती है उस पर डॉ अरुण कुकसाल लिखते हैं:-
अपनी यात्रा-पुस्तक ‘चले साथ पहाड़’ पर अपनी बात-
(वैसे, अपनी किताब प्रकाशित होने पर अपनी कहां रह जाती है, वह तो पाठकों की हो जाती है।)
मनुष्य हर क्षण यात्रा में रहता है। तन से, मन से और अक्सर तन-मन दोनों से। इन अर्थों में यात्रायें जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं। जो सुना और पढ़ा उसे देखने की सुगबुहाट और बैचेनी यात्राओं का आरंभ बिंदु है। यात्राएं आदमी को जगत और जीवन की व्यापकता, गूढ़ता, विकटता और सौन्दर्य का बोध कराती हैं। बचपन से आज तक चल रही अनवरत और अनगिनित यात्राओं ने आज जैसा मैं हूं, वैसा बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई है।
बचपन में घर के छज्जे से सामने के पहाड़ के उस पार की दुनिया की मैं काल्पनिक यात्राऐं करता था। गांव की सबसे ऊंची धार से दिखने वाले पहाड़, जंगल, नदी मुझे अपने पास बुलाते नजर आते थे। इसीलिए शादी-बरात और मेला-त्यौहार में अनजाने इलाकों में जाने का कोई अवसर मैं हाथ से न जाने देता था। गांव से बाहर आने के बाद स्कूल, कालेज, सामाजिक आन्दोलन, शोध, नौकरी के दौरान की गई पहाड़ी यात्राएं मेरी खास अभिरुचियों में शामिल रही हैं। इन यात्राओं ने मेरी जीवनीय दिशा को एक सामाजिक समझ प्रदान की हैं। यह खुशनसीबी है कि यात्राओं का यह सिलसिला अभी भी जारी है।
मित्रों के बीच मेरी यात्राओं पर अक्सर व्यापक चर्चायें हुई हैं। उनका सुझाव था कि इन यात्राओं पर एक किताब आनी चाहिए। मित्रों का आदेश सिर-आखों पर। ‘चले साथ पहाड़’ किताब आपके पास पहुंच रही है। किताब में मेरी विगत 30 साल की यात्रायें शामिल हैं। सुंदरढुंगा ग्लेशियर यात्रा अक्टूबर, 1990 की है। इस नाते वह इस किताब में शामिल यात्राओं में सबसे पुरानी है। तबसे बहुत समय बदल गया है। परन्तु बिडम्बना यह है कि सुन्दरढुंगा ग्लेशियर जाने के आखिरी आबादी वाले जातोली गांव के लोग जीवन की मूलभूत सुविधाओं अभी भी वंचित हैं।
दानपुर यात्रा यहां के लोगों के इस दुखःदर्द को बयां करते हैं। सर-बडियाड़ की यात्रा में पहाड़ी जनजीवन की जीवटता और संघर्ष की झलक है। श्रीनगर-रानीखेत और श्रीनगर-अल्मोड़ा यात्रा गढ़वाल-कुमाऊं की आपसी साझी सांस्कृतिक विरासत को दिखाती है। मध्यमहेश्वर, कार्तिक स्वामी, तुंगनाथ और रुद्रनाथ यात्रा गढ़वाल के खूबसूरत परन्तु अनजाने तीर्थ स्थलों की ओर आपको ले जाती है। केदारनाथ यात्रा जून, 2013 की आपदा के बाद के केदार घाटी के पारिस्थितिकीय बदलावों को सामने लाती है। कुल मिलाकर ये यात्रायें आज के उत्तराखंड की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तस्वीर को लाने की कोशिश भर है। इस दिशा में मैं कितना सार्थक लिख पाया हूं, आप विद्वतजन इसको बता पायेंगे।
मेरा अहो भाग्य! कि इस किताब की भूमिका प्रसिद्ध विज्ञान लेखक और घुमक्कड़ देवेंद्र मेवाड़ी जी ने लिखी है। किताब का नामकरण ‘चले साथ पहाड़’ भी उन्होंने ही किया है। मेरे लिए बड़े भाई देवेंद्र मेवाड़ी जी यह आशीर्वाद जीवन की अमूल्य धरोहर है। मित्र सुरेश भट्ट, ट्रांस मीडिया, श्रीनगर, गढ़वाल ने इन यात्राओं को सजा-संवार कर खूबसूरत रूप दिया है। उन्हें तहे दिल से धन्यवाद। ‘चले साथ पहाड’ किताब को श्री अभिषेक अग्रवाल जी ने संभावना प्रकाशन से प्रकाशित करके मेरा मान बढ़ाया है। उन्हें उनकी प्रकाशन टीम के साथ मित्रवत घन्यवाद।
यात्राओं में साथ रहे साथी इस किताब के प्रमुख किरदार हैं। किताब की जीवंतता उन्हीं से है। उनका स्नेह ही मुझे अगली यात्रा के लिए प्रेरित करता है। सुपुत्री हिमाली ने बार-बार किताब प्रकाशित करने को प्रोत्साहित किया तो सुपुत्र अमन और धर्मपत्नी दीना जी ने घर के जिम्मेदारियों से मुझे हमेशा मुक्त रखा है। उन्हें धन्यवाद कैसे कहूं, उनसे अलग तो मेरा व़जूद कहीं दिखता नहीं है।
किताब पर स्नेही पाठकों की प्रतिक्रया और सुझाव मुझे आत्मबल प्रदान करेंगे। ताकि अगली यात्रा पुस्तक लिखने के लिए मेरे उत्साह को नई ताकत मिल सके।
यात्रा-पुस्तक ‘चले साथ पहाड़’ अभिषेक अग्रवाल, संभावना प्रकाशन, मोबाइल नंबर- 7017437410 अथवा अमेजॉन से इस लिंक पर क्लिक करके मंगा सकते हैं-
https://www.amazon.in/dp/8195294901?ref=myi_title_dp
अरुण कुकसाल
चामी गांव, असवालस्यूं
पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)

