हिमालयन क्वीन ब्लू पॉपी!– फूलों की घाटी की सुंदरता में चार चाँद लगा रहा है सात समंदर पार का विदेशी मेहमान..!
(ग्राउंड जीरो से संजय चौहान)
इन दिनों रंग बदलने वाली फूलों की घाटी में खिल रहा हिमालयन क्वीन ब्लू पॉपी अपनी सुंदरता से हर किसी को अभिभूत कर रहा है। मध्य जुलाई से अगस्त महीने तक खिलने वाला नीले रंग का ये फूल अपनें बेपनाह सुंदरता से हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है। पर्यटक ही नहीं स्थानीय लोगों को भी ये फूल बेहद पसंद है। इन दिनों फूलों की घाटी में हिमालयन क्वीन ब्लू पॉपी अपने पूरे शबाब पर है।
फोटो साभार- डॉ अमिता।
80 के दशक में सात समंदर पार से फूलों घाटी में पहुंचा था ये विदेशी मेहमान..!
माउंटेन ट्रैक्स के सीईओ राहुल मेहता बताते हैं कि वर्ष 1984 तक फूलों की घाटी में ब्लू पॉपी कही पर भी नजर नहीं आता था। इसी वर्ष में जापानी छात्र चो बकाम्बे फूलों पर शोध के लिए घाटी पहुंचा है। वह इससे पहले भी यहां आ चुका था और तब उसनें सोचा कि क्यों नहीं अपनें देश के राष्ट्रीय पुष्प ब्लू पॉपी को यहां पर उगाया जाए। इसीलिए वह ब्लू पॉपी के बीज को साथ लेकर आया और फूलों की घाटी में बो दिया। 1987 में तीन साल के बाद जब वह फिर से वापस लौटा तो पूरी घाटी में ब्लू पॉपी उगी हुई थी। नीले रंग का ये फूल चारों ओर अपनी सुंदरता से चमक बिखेर रहा था और फूलों की घाटी की शोभा बढ़ा रहा था। तब से लेकर आज तक हिमालयन क्वीन ब्लू पॉपी, रंग बदलने वाली फूलों की घाटी की सुंदरता में चार चाँद लगा देता है। अब ये मेहमान नहीं बल्कि 500 प्रकार की फूलों की प्रजाति का अहम सदस्य है।
जापानी पर्यटक पहुंचते हैं यहाँ..
चेज हिमालय के सीईओ विमल मलासी कहते हैं कि कोरोना काल नें सबसे ज्यादा प्रभावित पर्यटन क्षेत्र हुआ है जिससे फूलों की घाटी में पर्यटक बहुत कम पहुंच पा रहें हैं खासतौर विगत दो साल में विदेशी पर्यटकों की संख्या ना के बराबर है। परंतु कोरोना से पहले हिमालयन ब्लू पाॅपी को देखने यहाँ जापानी पर्यटक पहुंचते थे। अपने राष्ट्रीय पुष्प को यहाँ देखकर वे अभिभूत हो जाते थे।
— कहां है फूलों की घाटी!
उत्तराखंड के चमोली जिले में पवित्र हेमकुंड साहब मार्ग स्थित फूलों की घाटी को उसकी प्राकृतिक खूबसूरती और जैविक विविधता के कारण 2005 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया। 87.5 वर्ग किमी में फैली फूलों की ये घाटी न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। फूलों की घाटी में दुनियाभर में पाए जाने वाले फूलों की 500 से अधिक प्रजातियां मौजूद हैं। हर साल देश विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं। यह घाटी आज भी शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र है। नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान और फूलों की घाटी सम्मिलित रूप से विश्व धरोहर स्थल घोषित हैं।
— हर 15 दिन में रंग बदलती है ये घाटी।
फूलों की घाटी में जुलाई से अक्टूबर के मध्य 500 से अधिक प्रजाति के फूल खिलते हैं। खास बात यह है कि हर 15 दिन में अलग-अलग प्रजाति के रंगबिरंगे फूल खिलने से घाटी का रंग भी बदल जाता है। यह ऐसा सम्मोहन है, जिसमें हर कोई कैद होना चाहता
– पर्वतारोही फ्रेक स्माइथ की खोज!
गढ़वाल के ब्रिटिशकालीन कमिश्नर एटकिंसन ने अपनी किताब हिमालयन गजेटियर में 1931 में इसको नैसर्गिक फूलों की घाटी बताया। वनस्पति शास्त्री फ्रेक सिडनी स्माइथ जब कामेट पर्वत से वापस लौट रहे थे तो फूलों से खिली इस सुरम्य घाटी को देख मंत्रमुग्ध हो गए। 1937 में फ्रेक एडिनेबरा बाटनिकल गार्डन की ओर से फिर इस घाटी में आए और तीन माह तक यहां रहे।
पांच सौ प्रजाति से अधिक फूल!
फूलों की घाटी में तीन सौ प्रजाति के फूल अलग-अलग समय पर खिलते हैं। यहां जैव विविधता का खजाना है। यहां पर उगने वाले फूलों में पोटोटिला, प्राइमिला, एनिमोन, एरिसीमा, एमोनाइटम, ब्लू पॉपी, मार्स मेरी गोल्ड, ब्रह्म कमल, फैन कमल जैसे कई फूल यहाँ खिले रहते हैं। घाटी मे दुर्लभ प्रजाति के जीव जंतु, वनस्पति, जड़ी बूटियों का है संसार बसता है।

