(मनोज इष्टवाल)
गैरसैंण में 2014 का वह पहला तीन दिनी ऐतिहासिक सत्र भला कौन पत्रकार होगा जो भुलाना पसन्द करेगा, क्योंकि यही तो वह सत्र था जिसने आखिरकार भराड़ीसैण में विधान सभा की नींव डाली। आज भी याद है कि एक बुजुर्ग दम्पत्ति को बचाने के चक्कर में, मैं अपना घुटना व टखना बुरी तरह जख्मी कर गया था। फिर भी इसी हालत में इस सत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करने पहुंच ही गया।
बात सत्र के अंतिम दिन की है जब तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत मीडिया से मुखातिब होकर पत्रकारों के सवालों के जबाब में देहरादून सचिवालय स्थित मीडिया सेंटर में मीडियाकर्मियों के रखे गए कम्यूटर उपकरणों व अन्य फैसिलिटीज पर बात कर रहे थे। उन्होंने साथ ही कहा कि आने वाले समय में गैरसैण विधान सभा सत्र के दौरान मीडिया कर्मियों को हाई टेक करने के लिए सरकार हर सम्भव कोशिश करेगी । उम्मीद है आप सब अपनी राय इस सम्बंध में देंगे ताकि हम मीडिया सुव्यवस्थित करने में उन बातों को भी अमल में ला सकें।
मुख्यमंत्री हरीश रावत के जबाब में मैंने प्रश्न किया-मुख्यमंत्री, क्या देहरादून स्थित विधान सभा मीडिया सेंटर में भी कुछ कायाकल्प किये जाने की उम्मीद है, क्योंकि वहां मात्र एक कम्प्यूटर है व उसी पर सब आश्रित हैं। विधान सभा भवन स्थित मीडिया सेंटर की स्थिति पर भी कुछ सुधार करने की कोशिश हो क्योंकि वहां जो भी व्यवस्थाएं हैं वह तब से चली आ रही हैं, जब इंदिरा हृदयेश जी सूचना मंत्री थी, तब बल्कि ज्यादा अच्छी व्यवस्थाएं वहां दिखने को मिलती थी। यह ऐसा अप्रत्याक्षित प्रश्न था जिसकी पूछे जाने की उम्मीद न सूचना विभाग को थी न मुख्यमंत्री जी को। उनका जबाब सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। उन्होंने विधान सभा मीडिया सेंटर का संज्ञान लेने की जगह कहा कि इसका जबाब तो इंदिरा जी ही दे पाएंगी।
आश्चर्य तो तब हुआ जब हमारे परम पत्रकार मित्र अरुण शर्मा मुझ पर ही भड़क गए। बोले- देख तो लेता कि मुख्यमंत्री से क्या प्रश्न पूछना है। जब प्रश्न पूछना नहीं आता तो मत पूछा करो। इसके बाद सूचना विभाग के अधिकारी डॉ अनिल चंदोला, राजेश कुमार , भगवान घिल्डियाल और जाने कौन कौन…! मैंने अरुण शर्मा को कहा कि भाई ये तो बताओ प्रश्न में क्या कमी थी जो आप इस तरह रिएक्ट कर बैठे। वह थोड़ा शांत हुए और बोले- कोई कमी नहीं थी लेकिन जो प्लेटफॉर्म तूने चुना वह गलत था। सूचना विभाग के अधिकारियों को यह बात जरा नागवार सी लगी कि मैंने विभाग पर क्यों सवाल उठाया। दरअसल प्रश्न मुख्यमंत्री के समक्ष इसलिए था ताकि विधान सभा के मीडिया सेंटर में दो तीन और कम्प्यूटर लगें तो पत्रकार साथियों को सत्र के दौरान जल्दी जल्दी न्यूज़ फीड की सुविधा हो जाएगी लेकिन अफसोस 7 साल गुजर जाने के बाद भी वहां कोई अमेंडमेंट नहीं हुआ।
आज जब वरिष्ठ कांग्रेसी नेता श्रीमती इंदिरा हृदयेश हमारे बीच नहीं हैं तब इस सवाल का जबाब खुद ही मिल गया कि राजनीति में अंदरखाने क्या खींचतान चलती है। मंथन करते हुए जब इंद्रियां एकाग्र होती हुई फ्लैश बैक गयी तो पाया एनडी तिवारी सरकार में शेडो सीएम का तमगा पाने वाली फायर ब्रांड नेता इंदिरा हृदयेश एकाएक पिछड़ती क्यों चली गयी जबकि संसदीय ज्ञान की माहिर व 40 बर्षीय राजनीतिक अनुभव, सभी राजनेताओं में पॉपुलर व प्रसिद्ध, वाकपटु, तल्ख व सौम्य व्यवहार इंदिरा हृदयेश में कूट कूट कर भरे थे।
फ्लैश बैक से स्क्रीन पर लौटा तो होंठ मुस्करा दिए क्योंकि इस सबका जबाब जो मिल गया था। घाघ, कूटनीतिज्ञ, राजनीति शास्त्र के चाणक्य व जनप्रिय व लोकप्रियता हासिल करने वाला केंद्र से एक ऐसा राजनेता जो प्रदेश में आ गया था! जिनका नाम है हरीश रावत। अब समझने में देर न लगी कि 2014 का वह प्रश्न ही पार्श्व में नहीं गया बल्कि इंदिरा जी का राजनीतिक सूर्योदय भी अस्तांचल की ओर बढ़ने लगा था। वह एनडी तिवारी व शेखर तिवारी प्रकरण के बाद स्वयं भी पिछड़ने लगी थी व उन्हे शनै: शनै: बैक बेंच पर धकेला जाने लगा था। शायद इस बात का आभास उन्हें भी हो ही गया था क्योंकि वह विदुषी महिला जो थीं। इसमें दोष किसी राजनीतिक व्यक्तित्व का नहीं और ना ही पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का ही है बल्कि उनकी उम्र इसमें आड़े आने लगी थी जिस से उनकी भागदौड में कमी आ गयी थी व उन्हें यह भी अच्छे से आभास हो गया था कि मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे फिसलकर दूर निकल गयी है।
2014 के उस प्रश्न का जबाब, सूचना विभाग के अधिकारियों का रिएक्शन व मित्र पत्रकार अरुण शर्मा के प्रत्युत्तर का आज तब जबाब समझ आया जब प्रदेश की प्रथम पांत की नेता श्रीमती

