Tuesday, January 20, 2026
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बीस नाली जौ के बोझ के अंदर रोड़ी-रैंतोली से बैतड़ी पहुंची त्रिपुरा सुंदरी। हर बर्ष मेले में जुटते हैं हजारों लोग।

*भीड़ इतनी की जहां तक नजर पड़े सिर्फ लोगों के सिर दिखाई देते हैं। 

*अष्टमी को कटते हैं सैकड़ों की संख्या में रांगा लेकिन सुबह कहीं पता तक नहीं चलता।

*मन्दिर में आज ही रहती हैं दर्जनों देवदासियां।

*साल में दो बार अष्टमी, नवमी को लगता है मेला। छोटी जात (आषाढ़ी जात) व बड़ी जात (कार्तिक जात)।

बीस नाली जौ के बोझ के अंदर रोड़ी-रैंतोली से बैतड़ी पहुंची त्रिपुरा सुंदरी। हर बर्ष मेले में जुटते हैं हजारों लोग।●

(मनोज इष्टवाल ट्रेवलाग 22-23 नवम्बर 2009)।

अभी 20 नवम्बर 2009 यानि दो दिन पूर्व ही तो मैं देहरादून से पिथौरागढ व पिथौरागढ़ से बनाडा गांव झूलाघाट पहुंचा था। विगत 21 को महाकाली आँचल के झूलाघाट भ्रमण किया और महाकाली नदी के दूसरे छोर पर बसे पश्चिमी नेपाल के जिला बैतड़ी के छोटे से बाजार झूलाघाट से छतरी जूता इत्यादि खरीदा। शाम को जब हम वापस घर पहुंचे तो शानदार महाकाली नदी की मछलियां बन रही थी। यकीनन बनाडा गांव सड़क के ऊपर बसा पेड़ों की झुरमुटों से छुपा एक सुंदर सा गांव है। इसी की सरहद पर आईटीबीपी का एक बड़ा कैम्प है।

आज हिन्दू संवतसर के अनुसार 26 गते 2066 अष्टमी का दिन है। पंचांग अनुसार सूर्योदय लगभग 6:32 बजे होगा और सूर्यास्त 5:48 बजे शांयकाल। दो खंड के इस आवास में मेरे लिए ऊपरी मंजिल का कमरा था जबकि निचली मंजिल पर कमला,  पुष्पा, ललिता, सरु उनके जवाई- जीजा लोग व माँ जी।  अलसुबह से ही तैका चढ़ गया था और पूरियों का गर्म तेल की कड़ाई में नृत्य करने का संगीत व तेल की खुशबू नथुनों में पहुंच रही थी। घड़ी में वक्त देखा तो अभी 4:57 बजे थे। माता जी धीरे धीरे नेपाली में बोल रही थी कि धीमी आवाज में बात करो मेहमान की नींद खराब हो जाएगी। खैर खुसुर पुसुर की आवाज कान तक सुनाई दे रही थी। साथ ही माँ जी यह आदेश भी दे रही थी कि काली पार से सांगणी जाएंगे वहां से गाड़ी से त्रिपुरा सुंदरी व आते में नीचे पैदल आ जायेंगे। मेरे से रहा नहीं गया व मैं लगभग पौने छ: बजे बिस्तर छोड़कर नीचे उतर आया। माता जी बोली- अरे बेटा, नींद खराब हो गयी। सो जाओ अभी तो 2 बजे दिन में जुटेगा मेला।

गपशप के बीच चाय की चुस्कियां और घर परिवार की मीठी-मीठी यादें काफी लोक लुभावन हुई। यूँ तो नेपाल महेंद्र नगर क्षेत्र से कई बार आना जाना हुआ लेकिन सुदूर पश्चिमी नेपाल में आज पहली बार जाना था। मुझे लगता है भूमिका की यही इतिश्री कर देता हूँ, और आगे का ब्यौरा महाभारत के संजय की तरह आपके समक्ष रखूंगा।

बहुत कोशिश के बाद आखिरकार बनाडा बैंड से हमें झूलाघाट के लिए ट्रैकर मिल पाया। अभी 11:38 मिनट हुए थे व हम बिल्कुल काली नदी के तट से झूलाघाट का बमुश्किल डेढ़ सौ मीटर लम्बा सीता सेतु पार कर नेपाल झूलाघाट की छोटी से बाजार को पार कर पुलिस थाना झूलाघाट बैतड़ी पहुंचे। जहां मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि मेले में पहुंचने के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था करवा दीजिए ताकि हमसे दो गुना तीन गुना किराया न वसूला जा सके। डीएसपी नवराज भट्ट ने एक सिपाही फौरन मेरे साथ सड़क तक भेजा व मेरे साथ सभी बनाडा की बहनें उनके बच्चे व माता जी तथा जवाई के लिए एक जिप्सी आकार की जीप की व्यवस्था हुई। हम महरा-गोठलापानी-बुड्ढा-आदारपीना-बाराकोट-कापड़ी गांव-डूंगरा होकर पुजार गांव उतरे । यहां से बमुश्किल 500 मीटर की दूरी पर त्रिपुरासुंदरी का मंदिर था। यह मार्ग आगे जाकर दैनोला-पुजारगांव-गढ़ी बैतड़ी से पातन होकर अमरगढ़ी होकर धनगढ़ी और वहां से काठमांडू, व गढ़ी बैतड़ी से दारचूला, गढ़ी बैतड़ी से पाटन होकर भझांग व अमरगढ़ी से दीपायल होकर डोटी जा पहुंचती है।

मन्दिर में बज रहे नगाड़ों की आवाज के साथ भँकुरों का शोर धीरे -धीरे तेज होने लगा था। अब हम मन्दिर के पिछले भाग में थे जहां कुछ पक्की दुकाने थी व जिनमें जलेबी, भुटवा व सेल रोटी बनती दिखाई दे रही थी। ठीक 1:41 मिनट में हम मन्दिर प्रांगण पहुंचे। मैं मुस्करा दिया क्योंकि ठीक इसी समय कल यानि नवमी को पंचक बैठ जाएंगे।

मन्दिर प्रांगण के मुख्य भाग की तरफ बड़ा तो आश्चर्य की सीमा न रही करीबी 500 मीटर दूर तक इतनी भीड़ थी कि सिर्फ लोगों के सिर दिखाई दे रहे थे। मन्दिर के दाएं हाथ पर धुनि थी जिसके पास कई त्रिशूल गड़े हुए थे व बाएं छोर पर दर्जनों छोटे बड़े नगाड़े व भंकुरी बज रही थी। मन्दिर परिसर में घुसने के लिए लंबी लाइन थी, जबकि मन्दिर के दाएं व बाएं मुंडेर पर कई सजी संवरी महिलाएं व पुजारी थे। पुष्पा मेरे पास आकर बोली – ये सब महिलाएं देवदासियां हैं व बाकी पुरुष पुजारी । यहां रियांसि गांव के भाट रणसैणी माँ त्रिपुरा सुंदरी भगवती के पुजारी हैं। शायद आपके यहाँ माँ त्रिपुरा सुंदरी को राजराजेश्वरी माता बोलते हैं। मैं पुष्पा की इस जानकारी पर बहुत प्रसन्न हुआ।

आइए मैं अब आपको उन जानकारियों से अवगत करवा दूँ जो माँ त्रिपुरा सुंदरी का जिला बैतड़ी आने का वृतांत है। यह वृतांत न गूगल में ढूंढे मिलेगा और अगर किसी किताब में वर्णित होगा भी तो उसको ढूंढने में आपको महीनों मेहनत करनी पड़ेगी।

20 नाली जौ के भारे के अंदर आई माँ त्रिपुरा सुंदरी।

लोकमान्यताओं की जानकारी के लिए मेरा प्रश्न यह था कि-तपाई को शुभ नाम क्या पर्यो ! र माँ त्रिपुरा सुंदरी कईले आसो भएको, को बाटा आइनो भएको। बताई दिन हुस ।

खैर यह नेपाली में रटे रटाये शब्द मैंने अपने चैनल नेपाल-1 के लिए पूछने थे क्योंकि मुझे नेपाली भाषा में ही उसके जबाब भी चाहिए थे। फिर क्या था इतिहास की जानकारी कुछ इस तरह मिली।

लोकवार्ताओं, लोककथाओं व किंवदंतियों के अनुसार भुखमरी के दौर में मौनी जाति के लोग सुदूर गांव रोड़ी-रैंतोली से 20 नाली जौ का बोझा लेकर अपने गांव लौट रहे थे। खुश थे कि चलो कुछ दिन परिवार का गुजारा तो हो ही जायेगा व कुछ जौ बो कर अगले साल के लिए कुछ नाज की व्यवस्था हो जाएगी। जौ रैणी में रखकर ला रहे थे। मानव प्रवृत्ति के अनुसार कापड़ी गांव के  पास दिशा-फिराक जाने के लिए मौनी मानुष ने पीठ से जमीन पर उतारा। शौच निवृत्ति के बाद जब मौनी मानुष ने पानी ढूंढा तो दूर-दूर तक उसे कहीं पानी नहीं दिखाई दिया। शाम ढलने को थी व मौन गांव दूर था। जंगल का रास्ता व जंगली जानवरों का डर भी। थक-हार कर मौनी मानुष ने बोझा उठाने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया, बोझे से आवाज आई, मुझे मत छूना तू अशुद्ध हो गया है। मौनी मानुष घबरा गया व वहां से जैसे तैसे कापड़ी गांव गया व वहां सारा वृतांत सुनाया।

कापडी गांव से शुद्ध होकर अर्थात पँचस्नान करके वहां के कुछ भल मानुष के साथ मौनी मानुष वहां पहुंचा व रैणी में बोझा फंसाकर पीठ पर लादकर अपने गांव के लिए चल दिया। अब बोझा खड़ी चढाई होने के बावजूद भी फूल के समान हल्का लगने लगा था। पुजारगांव के दैनोला में एकाएक भार का वजन बढ़ गया और मजबूरन मौनी मानुष को बोझा वहीं उतारना पड़ा। थकान मिटाने के बाद फिर जैसे ही बोझा उठाना चाहा- बोझे के अंदर से आवाज आई मुझे यह स्थान पसन्द आ गया है। अब मैं यहीं रहूंगी। तू अपने गांव लौट जा ..! तेरे घर को मैं सर्वसम्पन्न कर दूंगी। मुझे जौ के भारे से बाहर निकाल।

मौनी मानुष ने आज्ञा का पालन किया व चार पत्थर इकट्ठा कर मूर्ति वहीं रख दी। माँ रणसैणी पुजारगांव के  सर्वेसर्वा के सपने में गयी और बताया कि उसको यह स्थान पसन्द आ गया है। आज से मैं तुम्हारी कुलदेवी हुई अर्थात तुम मेरे ससुरासी हुये व कापड़ी गांव मेरा मायका हुआ। पुजारगांव के लोगों को जब यह जानकारी मिली तब तक मौन गांव के मौनी मानुष, भट्ट गांव, चौंड़यालया गांव व औला गाँव के लोग भी आ पहुंचे। आनन -फानन मन्दिर स्थापित किया गया और रैणी में यहां तक पहुंची देवी रणसैणी कहलाने लगी। कालांतर में महात्मा मादवनन्द ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाकर इसे भव्य रूप दिया।

हर साल माँ की डोली उसके छत्तर व ढोल नगाड़ों के साथ इसी दिन कापड़ी गांव जाती है व शांय काल को वापस मन्दिर प्रांगण में लौटती है। डोली को कांधा देने के लिए मौन गांव वाले आगे से व भटगांव पल्या, चौंड़याल्या गांव, व औला गांव के पीछे से लगते हैं। उसके बाद बाद मन्नतों के रूप में सैकड़ों की संख्या में यहां बाका (बकरे) व रांगा (भैंसे) काटे जाते हैं। इस बार मुम्बई से बर्षों से मुम्बई में रह रहे स्वर्ण ब्यापारी हरेंद्र सिंह ठाकुर भी अपनी मन्नत पूरी होने पर अपने परिवार सहित देवास्था के रूप में कई कुंतल का रांगा लेकर आये थे। यही नहीं महेंद्र नगर, धनगढ़ी क्षेत्र तक के व्यवसायी भी मन्नत पूरी होने के बाद अपने रांगा माँ के चरणों में अर्पित करने पहुंचे थे। उत्तराखंड के कतिपय स्थानों में देवी मंदिरों में भी भैंसे की बलि देने की परंपरा है व यहां भी भैंसे कटते हैं। जिनमें कुमाऊँ दुशान्त की जोगी मढ़ी के पास कालिंका, बूंखाल की कालिंका सहित कई शक्ति पीठों में यह प्रचलन है। लेकिन यह धीरे/धीरे बन्द हो रहा है। लेकिन नेपाल में इतनी तादाद में रांगा कटना आश्चर्यजनक लगता है।

कहाँ जाते हैं सैकड़ों की तादात में काटे गए रांगा (भैंसे)।

अष्टमी के दिन अर्थात 26 गते (23 नवम्बर 2009) को जितनी संख्या में यहां बलियां हुई तो मुझे लगा नवमी के दिन जुटने वाले मेले में चारों तरफ उनकी संड़ाध फैली होगी लेकिन यह जानकार सुखद आश्चर्य हुआ कि आपको दूर दूर तक कहीं भी मांस का एक टुकड़ा पड़ा नहीं दिख सकता क्योंकि नेपाल मूल की कई आदि जातियां आज भी रांगा खाती हैं। हुआ भी यही दूसरे दिन पूरा मन्दिर परिसर व आस पास का क्षेत्र बिल्कुल साफ सुथरा था।

आषाढ़ी जात व नवमी को होती है सात्विक पूजा।

आषाढ़ी जात को भाद्रपद पूजा के रूप में भी देखा जाता है। यह आषाढ़ी पूजा भी अष्टमी व नवमी को ही आयोजित होती है लेकिन लेकिन इसमें नवमी को बेहद सात्विक पूजा के रूप में गेहुं, केराउ, गहथ, उड़द (मास), गुरांस (बुरांश) के पुष्प को तांबे के बर्तन में भिगोकर रखा जाता है, व गौरा पूजा के बाद इसे प्रसाद के रूप मे वितरित किया जाता है।

मन्दिर की देवकी प्रथा (देवदासी)।

माँ त्रिपुरा सुंदरी मन्दिर में देवकी प्रथा जिसे धामी भी कहा जाता है, प्रचलन में है। और यही कारण भी है कि यहां दर्जनों की संख्या में देवदासियां दिखाई देती हैं। अधेड़ उम्र की देवदासियां बहुतायत मात्रा में आपको मन्दिर परिसर में दिख जाएंगी। लेकिन कम उम्र की देवदासियों की संख्या में निरन्तर गिरावट आ रही है जिससे यह आभास होता है कि अब लोगों में जागरूकता ज्यादा आ गयी है या फिर अब मन्नतों के पूरी होने पर बेटियां मन्दिर को भेंट करने के स्थान पर लोगों ने बाका, रांगा, घाण्ड या चांदी स्वर्ण मूर्तियां चढ़ाना ज्यादा पसन्द कर लिया है।

मन्दिर में पूर्व में देवकी रही सानू भट्ट अब अपना गृहस्थ जीवन निर्वाहन कर रही है। वह कहती है कि देवदासी का कद देवकी बन जाने के बाद समाज व उसके स्वयं के घर में देवी तुल्य हो जाता है। वह स्वेच्छा से समाज व घर में कार्य कर सकती है लेकिन उस पर कोई पाबंदी नहीं लगा सकता।

वह बताती हैं कि नौ देवी जिनमें रणसैणी, निंगला सैणी, तिला सैणी, निला सैणी, दिला सैणी, पोटलासैणी, दुर्गा सैणी, काल सैणी व भऊनेली प्रमुख हैं, सभी मंदिरों में देवकी प्रथा है। देवकी किसी भी घर परिवार द्वारा अपनी पुत्री को देविदान दिए जाने को कहते हैं। सानू भट्ट बताती हैं कि कोई भी मनोकामना पूर्ण होने के बाद कोई भी परिवार छोरी घाड़ा फुन्दा कर मन्दिर में चढ़ा देता है। इस परम्परा के अनुसार उस दिन से आपका विवाह मन्दिर की देवी माँ के अनुसार हो जाता है। इसके बाद उस परिवार का बेटी पर कोई अधिकार नहीं रह जाता। बेटी अपनी मन मर्जी के मुताबिक निर्णय ले सकती हैं। देवकी या देवदासियों की दिनचर्या में मन्दिर की देखरेख स्वर्ग की परियों की भांति की जाती है।

सानू भट्ट के अनुसार हर देवकी का अपने माँ बाप की जायजाद में एक हिस्सेदारी होती है। उसे वह जब चाहे बेच सकती है या फिर इस्तेमाल में ला सकती है। यदि कोई देवकी अपनी मर्जी से शादी करती है तो वह फेरे लिए बिना किसी के साथ भी अपना घर बसा सकती है। उस पर कोई पाबंदी नहीं है। वह ससुराल में न जूठा खाएगी न जूठे बर्तन ही धोएगी। यदि ससुराल वाले उसे मजबूरी में ऐसा करवाते हैं तो उन पर कोढ़ हो जाता है।

मन्दिर परिसर में रहता है मणिधर नाग। 

लोगों का मानना ही कि त्रिपुरा सुंदरी मन्दिर परिसर में अक्सर मणिधर नाग विचरण करते रहते हैं लेकिन वे किसी का कभी कोई अहित नहीं करते लेकिन मन्दिर परिसर को नुकसान पहुंचाने पर वह किसी को माफ भी नहीं करते ।

नरबलि।

मन्दिर में पूर्व में नरबलि भी हुई हैं। किशन सिंह थापा पुजारगांव व कुंदन चंद कानिडी गांव से प्राप्त जानकारी के अनुसार कालांतर में यहां भट्टाडगांव के किसी मानुष की नरबली भी हुई है। ऐसा सुनने में आता है।

24 नवम्बर 2009 समय 1 बजकर 23 मिनट। ललिता आती है व खूबसूरत चेहरे में सौम्य मुस्कान लिए बोलती है- “भाई जी चलना नहीं है क्या, आज तो हमें पैदल ही उतरना है लगभग 5 किमी नीचे झूलाघाट। हाथ से दूर एक घर को दिखाती हुई सरु बोलती है- वो देखो, उसे खाण बोलते हैं, उससे दो गुना नीचे चलकर गोठलापानी है और फिर झूलाघाट। हम को तो फर्क नहीं पड़ता लेकिन आप शहरियों की आज रेल बनने वाली है। अब तक माता जी अपनी भतीजी के साथ व अन्य के साथ पहुंच जाती हैं। भतीजी को गढ़ी बैतड़ी जाना है क्योंकि माता जी का मायका वही जो ठहरा। हम अपने रस्ते के लिए बढ़ते हैं। तो फिर ललिता छेड़ती है। बेचारे भैय्या… काश..कि कोई गाड़ी वाला होता जो वहां तक इन्हें छोड़ देता। अब यह इंडिया तो नहीं है जो हर कदम पर गाड़ी हो। मैं मुस्कराया और मन हो मन बोला-नासमझ लड़कियों तुम्हे क्या पता मैं अब तक कितनी ट्रैकिंग कर चुका हूं।

(समाप्त)

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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