●हिन्दी पत्रकारी दिवस….पत्रकारिता में असुरक्षित भविष्य….।
●कड़वा है मगर सच है….जब असुरक्षित हो आजीविका, तो कैसे आजाद होंगे कंठ और कलम..?
(अवधेश नौटियाल की कलम से)।
सोशल मीडिया में लेक्चर देना आसान है लेकिन सर्वविदित है कि मीडिया जगत में वेतन की विसंगतियां बड़े पैमाने पर व्याप्त हैं। पगडण्डी और खड़ंजे से खबर बटोर कर लाने वाले संवाद सूत्र से लेकर रात के अंधेरे में खबरों के जंगल में भटकता उप संपादक महंगाई के इस युग में न्यूनतम वेतन पर अपनी सेवाएं देने को मजबूर है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो खबरों के आधार पर भुगतान की प्रारम्भ से ही परंपरा रही है। जितनी ज्यादा खबरे चलेंगी उतना ज्यादा भुगतान होगा।
खबरों में सनसनी का चटकारा ही उसकी गुणता का मापदंड है। किन्तु छोटे शहरों में प्रतिदिन बड़ी वारदाते नहीं होती अत: खबरें बनती नहीं, बनायी जाती हैं। सत्य शोधन के स्थान पर प्रहसन किया जाता है। ये सब कुछ मसले में सनसनी उत्पन्न करने की जुगत में होता है अन्यथा खबर का मूल्य कैसे प्राप्त होगा। यही पर सवाल उठता है कि जब आजीविका ही असुरक्षित हो, तो कंठ और कलम कैसे आजाद हो सकते हैं?
पूंजीपतियों, बिल्डरों, शराब सिण्डिकेटों के निवेश ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के मूल तेवर को जमकर प्रभावित किया है। कभी अखबार मालिक के खिलाफ ही लिखने का हौसला रखने वाला पत्रकार जगत आज विविध भारती के फरमाइशी गीतों की तरह डिमांड पर खबरें बनाता और बेचता है। इसके लिए पत्रकार ज़िम्मेदार नहीं है क्योंकि जनता को भी चटपटा पसंद है।
सदियों पहले किसी महानुभाव ने पेट को पापी कह दिया। आज तक पेट ऐसा विलेन बना बैठा है कि उसे भरने की हर जुगत पाप की श्रेणी में आ जाती है। भले ही पेट केवल एक अंग है, जहां चटोरी जीभ से होकर खाना पहुंचता है और शरीर के बाकी अंगों तक ज़रूरी रसायन को निचोड़ कर पेट ही भेजता है। कहने का तात्पर्य यह कि हमारी दुनिया में किसी भी चीज़ को लेकर एक सोच बन जाती है और फिर उस लेबल को हटा पाना नामुमकिन सा हो जाता है. ऐसा ही एक लेबल बाजार के माथे पर चस्पा है। मीडिया और बाजार के नाजुक रिश्ते को समझने से पहले चंद सच को स्वीकार करके चलना होगा। मीडिया समाज का चौथा स्तम्भ होने के साथ- साथ एक व्यवसाय भी है। मीडिया स्कूलों से निकलने वाले छात्र समाज सुधार के साथ-साथ रोटी भी कमाना चाहते हैं। मीडिया का विस्तार बाजारवाद के दौर में ही सम्भव हो पाया है, मीडिया के विस्तार से मीडिया की आज़ादी बढ़ी है लेकिन इसके साथ ही तैयार हो गई है, वह पतली-सी रेखा, जो मीडिया के बाजारी और बाजारू होने का फर्क तय करती है, जहां ख़बरें बाजार के मिजाज से लिखी जाती हैं, जहां स्पॉन्सर के पैसों की खनक, आवाज की धमक तय करती है तो क्या बाजारवाद के दौर का मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो रहा है या फिर वाकई मीडिया पर बाजारवाद हावी हो चुका है। क्या मायने हैं बाजारवाद के और कैसे इस दौर में रहते हुए मीडिया अपनी स्वतंत्रता केवल राजनीतिक विचारधारा से नहीं, बल्कि बाजार से भी बनाये रखे। इस पर एक कभी न खत्म होने वाली बहस होगी…हर ब्यक्ति के अपने तर्क होंगे…जिन पर दूसरे का सहमत होना जरूरी नहीं है।
पत्रकार की भूमिका का सैद्धान्तिक स्पष्टीकरण मुमकिन नहीं, क्योंकि जो एक समुदाय के लिए निष्पक्ष होगा, वह दूसरे के लिए जहरीला विश्लेषण होगा. जो ख़बर एक पार्टी को सच्ची लगेगी, वह दूसरी पार्टी के लिए झूठी होगी. इसीलिए बाजारू ख़बरों के तमगे से बचने के लिए हम पत्रकारिता के बुनियादी नियमों के पालन पर ही लौटें. अपने सोर्स से मिल रही ख़बरों की सभी पक्षों से पुष्टि करवायी जाए. ख़बर लिखते वक्त अन्दाज से अधिक महत्त्व तथ्यों को दिया जाए और टिप्पणी के लिए जानकारों की मदद ली जाए। हमें मंजूर हो न हो, वक्त बदल चुका है और बदले हुए वक्त ने सब कुछ बदल दिया है. अब एक महीने का नवजात करवट ले लेता है. दो साल के बच्चे मोबाइल, टेबलेट, आईपैड में महारत हासिल कर चुके हैं. धरती का पारा उलट-पुलट हो चुका है, तो पत्रकारिता भी बदली है। ख़बरों का कलेवर भी और ख़बर देखने वालों की पसन्द भी। लेकिन जो कभी नहीं बदलना चाहिए, वह है एक पत्रकार की अन्तरात्मा, एक पत्रकार का जमीर, क्योंकि लाख आरोप लगा दिए जाएं, लाख नियम-कायदे तय कर दिए जाएं, जो सही है और जो सच है, उसकी परिभाषा कभी नहीं बदलेगी।

