Monday, January 19, 2026
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बेहद दुर्लभ होता है भानुपंखी गरुड़ व सोन पंख़ी गरुड़ के दर्शन।

बेहद दुर्लभ होता है भानुपंखी गरुड़ व सोन पंख़ी गरुड़ के दर्शन।

हाँ…मैंने “हित्ती धार” में पहली बार देखे थे सूनी गरुड़। उन्हें देखकर सब प्रसन्नचित्त हुए -नमस्कार करके बोले, पूजा सफल हुई।

(मनोज इष्टवाल)

आपने ढोल के बोलों के साथ आवजी (ढोली) के बोलों पर शायद ही कभी ध्यान दिया होगा। जब वे देवता का आवाहन करते हैं तो बैठक ताल “झैने तू झैने ताने, झैने तू झैने ता” ।। के बोल सुने होंगे फिर यही ताल द्रुत गति में बजती है। आवजी बांये कान पर हाथ रखकर दांये हाथ से लांकुड़ से ढोल की राल लगी खाल पर हलके हलके प्रहार करता है और दमाऊं साथ संगत करता है-
प्रभात को पर्व जाग, गौ स्वरुप पृथ्वी जाग।
सतलोक जाग , इंद्र लोक जाग, मृत्यु लोक जाग।
जाग रे बाबा जाग ब्रहमा को वेद जाग, पयालु पाणी जाग।
सोन पंखी गरुड़ जाग, भानुपंखी गरुड़ जाग।

इन दो प्रजाति के दुर्लभ गरुड़ों का बर्णन अक्सर निरंकार यानि निराकार ब्रह्म के आवाहन पर ज्यादातर किया जाता है। यह अक्सर तब होता है जब पहाड़ों में पूजा के महीने होते हैं और वहां का जनमानस देवताओं की पूजा का आवाहन करते हैं। तब चाहे डौंर थाली हो या ढोल दमाऊं इन पर अक्सर नागराजा, देवी मंडाण, निरंकार इत्यादि के बाजे के साथ जागर गायी जाती है। नये नये देवता के अवतरण पर या फिर पारिवारिक मानस की पूर्ति न होने पर अक्सर सेम (दलदली जमीन/ जिसमे पानी का सोता फैला हुआ होता है) पर सम्पूर्ण परिवार गौ बंद (सबके गले में रस्सी डालते हुए) होकर गस-गुमान दूर करने के लिए प्रार्थना करता है ताकि देवता प्रसन्न हो । तब ऐसे समय में अगर दूर कहीं उड़ते हुए या बैठे हुए सोन पंखों या भानुपंखी गरुड़ दिख जाएं तो पूजा सफल मानी जाती है।

गरुड़ पुराण में उत्तरखंड ।

कश्यप ऋषि के पुत्र पक्षी राज गरुड़ को बिष्णु भगवान का वाहन माना जाता है। इस पुराण में मुख्य गारुड़ी विद्या के 19 हजार श्लोक हैं जिसके रचयिता ऋषि वेद व्यास हैं। गारुड़ी विद्या बहुत गूढ़ ज्ञान माना जाता है जो तंत्र साधना में भी प्रयुक्त होता है। इस विद्या का ज्ञान प्राप्त करना साधारण बात नहीं है। अठारह पुराणों में गरुड़ महापुराण का अपना एक विशेष महत्व है। इसके अधिष्ठातृदेव भगवान विष्णु है। अतः यह वैष्णव पुराण है। गरूड़ पुराण में बिष्णु भक्ति का विस्तार से वर्णन है। भगवान विष्णु के 24 अवतारों का वर्णन ठीक उसी प्रकार यहां प्राप्त होता है।

गरुड़ पुराण के  आरम्भ में मनु से सृष्टि की उत्पत्ति, ध्रुव चरित्र और बारह आदित्यों की कथा प्राप्त होती है। उसके उपरान्त सूर्य और चन्द्र ग्रहों के मंत्र, शिव-पार्वती मंत्र, इन्द्र से सम्बन्धित मंत्र, सरस्वती के मंत्र और नौ शक्तियों के विषय में विस्तार से बताया गया है। इसके अतिरिक्त इस पुराण में श्राद्ध-तर्पण, मुक्ति के उपायों तथा जीव की गति का विस्तृत वर्णन मिलता है।

इस खण्ड को प्रेतकल्प भी कहते हैं। ‘प्रेत कल्प’ में पैंतीस अध्याय हैं। इन अध्यायों में  की मृत्यु अवस्था तथा उनके कल्याण के लिए अंतिम समय में किए जाने वाले क्रिया-कृत्य का विधान है। यमलोक, प्रेतलोक और प्रेत योनि क्यों प्राप्त होती है, उसके कारण, दान महिमा, प्रेत योनि से बचने के उपाय, अनुष्ठान और श्राद्ध कर्म आदि का वर्णन विस्तार से किया गया है। इसमें भगवान विष्णु ने गरुण को यह सब भी बताया है कि मरते समय एवं मरने के तुरन्त बाद मनुष्य की क्या गति होती है और उसका किस प्रकार की योनियों में जन्म होता है।

गरुड़ पुराण के अनुसार जिस समय मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, उस समय वह बोलने का यत्न करता है लेकिन बोल नहीं पाता। कुछ समय में उसकी बोलने, सुनने आदि की शक्ति नष्ट हो जाती हैं। उस समय शरीर से अंगूठे के बराबर आत्मा निकलती है, जिसे यमदूत पकड़ यमलोक ले जाते हैं। यमराज के दूत आत्मा को यमलोक तक ले जाते हुए डराते हैं और उसे नरक में मिलने वाले दुखों के बारे में बताते हैं। यमदूतों की ऐसी बातें सुनकर आत्मा जोर-जोर से रोने लगती है। यमलोक तक जाने का रास्ता बड़ा ही कठिन माना जाता है। जब जीवात्मा तपती हवा और गर्म बालू पर चल नहीं पाती और भूख-प्यास से व्याकुल हो जाती है, तब यमदूत उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे बढ़ने के लिए कहते हैं। वह आत्मा जगह-जगह गिरती है और कभी बेहोश हो जाती है। फिर वो उठ कर आगे की ओर बढ़ने लगती है। इस प्रकार यमदूत जीवात्मा को यमलोक ले जाते हैं।

इसके बाद उस आत्मा को उसके कर्मों के हिसाब से फल देना निश्चित होता है। इसके बाद वह जीवात्मा यमराज की आज्ञा से फिर से अपने घर आती है। इस पुराण में बताया गया है कि घर आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में फिर से प्रवेश करना चाहती है लेकिन यमदूत उसे अपने बंधन से मुक्त नहीं करते और भूख-प्यास के कारण आत्मा रोने लगती है। इसके बाद जब उस आत्मा के पुत्र आदि परिजन अगर पिंडदान नहीं देते तो वह प्रेत बन जाती है और सुनसान जंगलों में लंबे समय तक भटकती रहती है। गरुड़ पुराण के अनुसार, मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए।

यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन फिर से आत्मा को पकड़ लिया जाता है। इसके बाद वह भूख-प्यास से तड़पती 47 दिन तक लगातार चलकर यमलोक पहुंचती है। गरुड़ पुराण अनुसार बुरे कर्म करने वाले लोगों को नर्क में कड़ी सजा दी जाती है, जैसे लोहे के जलते हुए तीर से इन्हें बींधा जाता है। लोहे के नुकीले तीर में पाप करने वालों को पिरोया जाता है। कई आत्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। किस आत्मा को क्या सजा मिलनी है ये उसके कर्म निश्चित करते है।

प्रसिद्ध फोटोग्राफर मुकेश खुगशाल ने आज अपनी इस फोटो पर न सिर्फ मुझसे जानकारी चाही बल्कि इस पर लिखने के लिए भी मुझे प्रेरित किया क्योंकि उनकी उत्कंठा थी क़ि आखिर गरुड़/चील जैसा ही यह प्राणी उनसे हटकर क्यों है।

सूनी गरुड़ व मेरा गांव धारकोट।

आज से लगभग 40 बर्ष पूर्व अपने बचपन की स्मृतियों में मैंने प्रत्यक्ष रूप से सूनी गरुड़ का जोड़ा अपने गांव धारकोट के तल्ला “हित्ती धार” में अपने खेतों में पहली बार देखे थे। तब शायद पहली व अंतिम बार मनोरथ प्रसाद ढौण्डियाल लोगों द्वारा निरंकार पूजा गया था। वैसे हमारे गांव में तीन जातियां मूलतः निरंकार की पुजाई किया करते हैं जिनमें थपलियाल, किंदरवाल नेगी व पंवार रावत ( स्व. सुखदेव सिंह रावत) प्रमुख हैं। ढौण्डियाल जाति ने निरंकार की पूजा क्यों की इसके पीछे मेरे पास तर्क नहीं हैं लेकिन यह घटना मेरे लिए आज भी जीवंत है। तब हम गांव की ही सरहद सीम के सेमंद से “ढौण्डियालों” की गस पूजा में निबटाकर वापस घर की तरफ लौट रहे थे। तब “धामी लोग” घर से लेकर सेमंद पूजा तक डौंर व थाली बजाकर जाया करते थे व आते समय भी यही उपक्रम करना पड़ता था। किंदरवाल नेगी तो अपनी पूजा में भँकुर निकाला करते हैं जबकि थपलियाल डौंर थाली व शंख ध्वनि करते हुए जाते हैं। घर वापसी में डौंर थाली व शंख ध्वनि बजाते हुए घर लौटने का जिम्मा अक्सर बच्चे ही निभाते थे। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था। सुनील ढौण्डियाल के पास डौंर चंद्रमोहन इष्टवाल के पास शंख व पीताम्बर के हाथ में कांस की थाली बज रही थी। मैं निरंकारी ध्वज लेकर चल रहा था व मनोरथ ढौण्डियाल भैैजी के पास पूजा अनुष्ठान की थाली थी। जैसे ही सारे ग्रामीण पंगतवार हैडा डाली होते हुए जगदीश भाई के खेत पहुंचे तो जोड़ेदार सफेद सूनी गरुड़ हमारे सिरों के ऊपर से उड़ते हुए दूर आसमान को निकल गए। उनकी चोंच (ठूँठ) पंजे व पंखों का निचला हिस्सा स्वर्ण की भांति चमकदार था। एक साथ बुजुर्गों के मुंह से सुनाई दिया “जय हो निरंकार देवता”। पूजा सफल हुई , सूनी गरुड़ कैलाश को लौट चले।मेरी उत्सुकता कहाँ शांत होने वाली थी मेरी निगाह मनोरथ ढौण्डियाल भैजी के चेहरे पर थी वह चेहरा चमक रहा था मानो सारी विपदाएं तर गयी हों। घर पहुंचकर पिताजी से बोला-आज सुख सागर की जगह मुझे सूनी गरुड़ वृतांत सुनाइये। उस दिन पिता जी ने सुख सागर पढ़ने की जगह उसे खोला और हाथ जोड़कर बन्द कर दिया फिर गरुड़ पुराण से सम्बंधित जानकारी व निरंकार देवता की पूजाई में भानु पंखी गरुड़ व सोन पंखी गरुड़ के आगमन का रहस्य बताया।

मैं स्वयं को बड़ा भाग्यवान समझता हूं क्योंकि तब मोबाइल क्रांति का युग नहीं था व हर माता-पिता व दादा दादी अपने पुत्र व नाती पोतों में धर्म संस्कार डालते थे व ये मेरे रुचिकर बिषय होते थे। मुझे खुशी है कि मैंने ऐसे बेहद गंभीर बिषयों पर सजगता के साथ काम किया है । सोन पंखी गरुड़ भानु पंखी गरुड़ से छोटा व् बेहद मोहक होता है। उसके पंख सुनहरे व् सर पर कली सफेद होती है। पैर बेहद खूबसूरत व चोंच सोने की सी प्रतीत होती है। जबकि कई बार इनके पंखों का रंग सफेद भी होता है। ये देखने बेहद दुर्लभ होते हैं। वहीँ भानुपंख़ी गरुड़ का आकार बड़ा होता है और मुखमुद्रा लाल होती है। सिर की बनावट गरुड़ प्रजाति से जरा हटकर होती है और जब उस की मुख मुद्रा पर नजर पड़ती है तो वह डरावनी सी लगती है। लेकिन इसमें समोहन शक्ति बेहद मजबूत होती है। गॉव के लोग अक्सर इन्हें जादूवी गरुड़ कहते हैं।

उनका मत है ये अपना भेष बदलने में माहिर होते हैं और ये कोई भी भेष बदल सकते हैं। जो भानु पंखी गरुड़ के बारे में नहीं जानता वह इन्हें डागिन यानि पर्वतों की आँछरी के रूप में भी पुकारता है। इनके दर्शन भी दुर्लभ होते हैं। जब ये आपके बेहद पास होते हैं तब आपके बदन के रोये खड़े हो जाते हैं। सोन पंखी या भानु पंख़ी गरुड़ कभी झुण्ड में नहीं होते।

ये पुरुष एवं मादा के रूप में ही आपको दो या चार दिख जाएँ तो आपके धन्यभाग। दिख जाएं तो आप इन्हें शष्टांग नमस्कार करें क्योंकि ये आपके सारे क्लेष हरते हैं व् बुद्धि का विकास करते हैं। भूलवश भी इन्हें पत्थर न मारियेगा क्योंकि इन्हें ब्रह्म के वेदों की उत्पत्ति का जरिया माना गया है और जब आप सच्चे मन से पूजा दे रहे होते हैं तब अगर ये दिख जाएँ तो समझा जाता है परिवार के किसी भी सदस्य का गस-गुमान नहीं है सब देवकार्य में पूरी श्रद्धा के साथ शामिल हैं।
फोटो- मुकेश खुगशाल (1- भानु पंखी गरुड़)
चंद्रशेखर चौहान (2- सोनपंखी गरुड़)

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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