(मनोज इष्टवाल)
यह रावत जरा अलग किस्म का है। जनता को लारे लप्पे देने की जगह जनता के बीच मजबूती से खडे होकर जनता जनार्दन बनने का यह हुनर हर किसी में नहीं है। यह बात जनता के बीच जाने की जगह जनता का समुख रखने का नायाब तरीका इस से बेहतर कोई हो भी नहीं सकता। अब यहां पूर्व मुख्यमंत्री पौड़ी में यह बयान दें कि अनुभव की कमी है तो क्या कहा जा सकता है। यह तो सचमुच मास्टर स्ट्रोक है।
मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने जो निर्णय इस दौरान लिए हैं उन्हें साहसिक कहना छोटा शब्द है, इसीलिए मैंने कहा यह रावत जरा अलग किस्म के हैं। अभी तक पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के कुछ ही फैसले पलटने की बात सामने आई थी लेकिन अब यह निर्णय बेहद अप्रत्याशित व अभूतपूर्व है। यह निर्णय जहां जनता के हित में सर्वोपरि है वहीं चुनाव की दहलीज पर खड़ी भारतीय जनता पार्टी के लिए कितनी लाभप्रद होगा यह कह पाना जरा असम्भव सा है क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल के दौरान जब भी उनकी कुर्सी पर बादल मंडराए उन्होंने हर बार लाल बत्तियां बांटकर माहौल अपने पक्ष में करने की जुगत भिड़ाई लेकिन पार्टी के भीतर यह असंतोष भी रहा कि त्रिवेंद्र द्वारा जितने भी राज्य मंत्री, अध्यक्ष उपाध्यक्ष व समितियों में छोटे बड़े गैर सरकारी लोगों को बैठाया है वे सभी पार्टी के कम व उनके व्यक्तिगत ज्यादा हैं। शायद यही बजह भी रही कि पार्टी के अंदरखाने इन चार बर्षों में कलह ने थमने का नाम नहीं लिया।
अब जबकि मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों को छोड़कर सभी दायित्वधारियों की सेवाओं की समाप्ति का ऐतिहासिक निर्णय लिया है जिनमें आयोगों, निगमों, परिषदों में नामित अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सलाहकार, राज्यमंत्री स्तर की सुविधाएं लेने वाले (संवैधानिक पदों पर निर्धारित अवधि हेतु नियुक्त महानुभावों को छोड़कर) सभी को पदमुक्त कर दिया है, ऐसे में उनकेे इस निर्णय ने जनता के बीच यकीनन वह खाई भरने की कोशिश की है, जिससे आम जनता पार्टी के मनमाने रवैये से आर्थिक बोझ झेलती हुई नाराजगी को चुनावी घमासान में परिवर्त्तित करने को आमादा दिख रही थी।
मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत का यह निर्णय पार्टी के अंदरखाने कितना दूरदर्शी है या नहीं! यह अभी कह पाना जल्दबाजी होगी लेकिन जनता के ऊपर करोडों का लादा गया वित्तीय बोझ जरूर इससे कम हुआ है व उनके इस निर्णय से जनता के बीच उनकी साख मजबूत हुई है।
यह सोचनीय पहलू है कि चुनाव के मुहाने पर खड़ी कोई भी राष्ट्रीय पार्टी ऐसे निर्णय लेने में 10 बार नहीं कई बार सोचेगी लेकिन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के इस मास्टर स्ट्रोक ने बॉउंड्री पार नहीं की बल्कि राजनीति की गेंद आसमान में उछालकर स्टेडियम से बाहर कर दिया, जिसे देखने के लिए विपक्षी टीम ही नहीं अपनी टीम व स्टेडियम में बैठी जनता भी खड़ी उठकर आसमान की तरफ देखती हुई कह पड़ती है-wow (वोsss…)! भले ही जनता इस शॉट पर तालियां बजाये लेकिन विपक्षियों के व टीम के होंठ wow वाली मुद्रा में गोल तो अवश्य हो जाया करते हैं।

