Tuesday, March 17, 2026
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“बडादित्य” अर्थात अल्मोड़ा में कटारमल का सूर्यमन्दिर।

(मनोज इष्टवाल)

उत्तराखण्ड राज्य में अल्मोड़ा जिले के अधेली सुनार नामक गांव में स्थित राजा कटारमल सूर्य मन्दिर पूर्वाभिमुखी है। कहते हैं इसका निर्माण कत्यूरी राजवंश के 12वें शासक कटारमल के द्वारा नवीं शताब्दी में करवाया गया। यह कुमांऊ के सबसे ऊंचे मन्दिरों की सूची में भी शामिल है। इस मंदिर का स्थापत्य और शिल्प कला का बेजोड़ उदाहरण है। मंदिर को एक ऊंचे वर्गाकार चबूतरे पर बनाया गया है। आज भी इसके खंडित हो चुके ऊंचे शिखर को देखकर इसकी विशालता व वैभव का स्पष्ट अनुमान होता है।

यह सूर्य मन्दिर न सिर्फ़ समूचे कुमाऊँ मंडल का सबसे विशाल, ऊँचा और अनूठा मन्दिर है, बल्कि उड़ीसा के ‘कोणार्क सूर्य मन्दिर’ के बाद एकमात्र प्राचीन सूर्य मन्दिर भी है। ‘भारतीय पुरातत्त्व विभाग’ द्वारा इस मन्दिर को संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका है। सूर्य देव प्रधान देवताओं की श्रेणी में आते हैं। वे समस्त सृष्टि के आधार स्वरूप हैं। संपूर्ण भारत में भगवान सूर्य देव की पूजा, अराधना बहुत श्रद्धा एवं भक्ति के साथ की जाती है।

कटारमल के सूर्य मंदिर का इतिहास:-
इस सूर्य मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। यह मंदिर कोणार्क के विश्वविख्यात सूर्य मंदिर से लगभग दो सौ वर्ष पुराना माना गया है। मंदिर नौवीं या ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित हुआ माना जाता है। इस मंदिर की स्थापना के विषय में विद्वानों में कई मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार समय-समय पर होता रहा है। यह सूर्य मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कटरामल के एक राजा ने करवाया था। प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में कुमाऊँ में कत्यूरी राजवंश का शासन था, जिन्होंने इस मंदिर के निर्माण में योगदान दिया था।

इस सूर्य मन्दिर को “बड़ आदित्य सूर्य मन्दिर” भी कहा जाता है। इस मन्दिर में भगवान आदित्य की मूर्ति किसी पत्थर अथवा धातु की नहीं अपितु बड़ के पेड़ की लकड़ी से बनी है। मन्दिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार भी उत्कीर्ण की हुई लकड़ी का ही था, जो इस समय दिल्ली के ‘राष्ट्रीय संग्रहालय’ की दीर्घा में रखा हुआ है। पूर्व दिशा की ओर मुख वाले इस मन्दिर के बारे में माना जाता है कि के इसे मध्य काल में कत्यूरी वंशज राजा कटारमल ने बनवाया था, जो उस समय मध्य हिमालय में शासन करते थे। मुख्य मन्दिर की संरचना त्रिरथ है, जो वर्गाकार गर्भगृह के साथ नागर शैली के वक्र रेखी शिखर सहित निर्मित है। मन्दिर में पहुंचते ही इसकी विशालता और वास्तु शिल्प बरबस ही पर्यटकों का मन मोह लेते हैं।

संरक्षित स्मारक:
पुरातत्व विभाग वास्तु लक्षणों और स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेखों के आधार पर इस सूर्य मन्दिर के बनने का समय तेरहवीं सदी बताया गया है। मन्दिर परिसर में स्थित कुछ भाग और शिव, पार्वती, गणेश, लक्ष्मीनारायण, नृसिंह, कार्तिकेय आदि अन्य देवी-देवताओं को समर्पित क़रीब 44 अन्य मन्दिरों का निर्माण अलग-अलग समय पर किया गया। भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका है। अब रखरखाव आदि के अभाव में मुख्य मन्दिर के बुर्ज का कुछ भाग ढह चुका है।

कुछ लोगों का मानना है कि कटारमल एक अपेक्षाकृत दुर्लभ सूर्य मंदिर के लिए जाना जाता है, जिसे 9 वीं शताब्दी में कैटीरी किंग्स (कत्यूरी राजवंशियों) द्वारा निर्मित किया गया था। एक कातूरिला राजा तर्मल्ला ने इस मंदिर का निर्माण किया, जिसमें सूर्य के मुख्य देवता के चारों ओर 44 छोटे मंदिर हैं, जिन्हें बुरहिदितया वर्धिदित कहा जाता है। शिव-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण आदि जैसे अन्य देवताओं को भी इस मंदिर परिसर में स्थापित किया गया है। मंदिर प्राचीन स्मारकों और पुरातत्विक स्थलों और 1958 के अधिनियम के अवशेष के तहत राष्ट्रीय महत्व का एक स्मारक घोषित किया गया है। ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर के बाद कटारमल सूर्य मंदिर सूर्य भगवान को समर्पित देश का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। अल्मोड़ा शहर से 16 किमी दूर स्थित यह मंदिर एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। मंदिर का परिसर 800 साल पुराना है, जबकि मुख्य मंदिर 45 छोटे-छोटे मंदिरों से घिरा हुआ है। हालांकि यह प्राचीन तीर्थ स्थल आज एक खंडहर में तब्दील हो चुका है, बावजूद इसके यह अल्मोड़ा का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। यह मंदिर प्राचीन सूर्य भगवान वर्धादित्य या बड़ादित्य को समर्पित है। मंदिर भवन में श्रद्धालु शिव-पार्वती और लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमाएं देख सकते हैं। मंदिर अपने आप में वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है और यहां की दीवारों पर बेहद जटिल नक्काशी की गई है।

लगता है इस मंदिर पर लिखने वाले इतिहासविदों ने जान बूझकर अपने को श्रेष्ठ साबित करने की दौड़ में इसमें कुछ ऐसे गूढ़ शब्दो की संरचना कर उसमें नयापन देेने का प्रयास किया है जो बेतुके से लगते हैं क्योंकि आप हाथ घुमाकर काम पकड़ने का काम कर रहे हैं जबकि वह कान ही है क्योंकि रिकॉर्ड से पता चलता है की इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी चक्रवर्ती सम्राट कटारमल ने 9वीं शताब्दी में करवाया था। समुद्र तल से 2116 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर का सामने वाला हिस्सा पूर्व की ओर है। इसका निर्माण इस प्रकार करवाया गया है कि सूर्य की पहली किरण मंदिर में रखे शिवलिंग पर पड़ती है। मंदिर की दीवार पत्थरों से बनी है और इनके खम्भों पर खूबसूरत नक्काशी की गई है। लकड़ी का दरवाजे इनकी सुंदरता में और भी इजाफा कर देते हैं। 10वीं शताब्दी में यहां से देवी की मूर्ति चोरी हो गई थी। इसे देखते हुए मंदिर के नक्काशीयुक्त दरवाजे और चौखट को दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में रख दिया गया था। यहां वर्ष भर दर्शन पूजा-अर्चना हेतु श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

पौराणिक उल्लेखों के अनुसार कहते हैं कि सतयुग व वैदिक काल में उत्तराखण्ड की कन्दराओं में जब ऋषि-मुनियों पर धर्म पर आस्‍था ना रखने वाले एक असुर ने अत्याचार किये थे। उस समय द्रोणगिरी कषायपर्वत और कंजार पर्वत के ऋषि मुनियों ने कौशिकी जो अब कोसी नदी कहलाती है, के तट पर आकर सूर्य देव की स्तुति की थी। तब ऋषि मुनियों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर उन्‍होंने अपने दिव्य तेज को एक वटशिला में स्थापित कर दिया। इसी वटशिला पर कत्यूरी राजवंश के शासक कटारमल ने ‘बड़ादित्य’ नामक तीर्थ स्थान के रूप में इस सूर्य मन्दिर का निर्माण करवाया, जो अब कटारमल सूर्य मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है।

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