(जागेश्वर जोशी)
पहाड़ों में वेगवान पवन और जलधाराओं के अतिरिक्त कुछ भी तो गतिमान नहीं है। सूरज तो उगता है पर कलियां उदास सी है। चिडियों की चह-चहांट भी कुछ कम सी हो गई है। जीवन स्तर उठा तो घिन्डूडियां भी बेगानी हो फुर्र उड़ गई। पधानों का खोला भी लगभग खाली हो चुका है। हां..मकान लेन्टरदार पक्के तो हो चुके…. ! पर वातावरण पहले से कुछ ज्यादा ही गर्म और बेरहम हो गया है। पधानों के परिवार का बचा-खुचा एक मात्र वारिश मकड़ू उकड़ू सा बैठा हुआ बीड़ी की लम्बी सुटकी खींच स्वच्छ आसमान में भूरे-सफेद छल्ले उड़ाता हुआ ‘शाम का प्लान’ बना रहा है। दिन अर रात की चिन्ता उसे नहीं है। वो अपने को बहुत सौभाग्यशाली मानता है कि उसका नाम बी.पी.एल की लिस्ट में चढ चुका है सो ये चिन्ता तो सरकार ने अपनी जिम्मे जो ले ली है। वैसे भी यें सरकार का दायित्व है। सरकार भी तो वहीं बनाता-बिगाड़ता है। शाम के समय वह किसी विगड़ैल नबाब से कमतर नहीं! नबाब तो राजकाज के लिए भी उत्तरदायी होते थे। मकड़ू तो अपने परिवार के लिए भी उत्तरदायी नहीं है! आप जानते ही हैं जब नाम बी.पी.एल की लिस्ट में चढ चुका हो तो परिवार की काहे चिन्ता! साथ ही मकडू तो रात का अराजक राजा है। घुटकी लगा तीन फुट्टी सड़क के गढ्ढे पर पांव पड़ता तो गांव की सरकार और उसके मुखिया पर जबानी झाग छोड कर नेता प्रतिपक्ष सा उग्र हो,प्रधान की सात पुश्तों धो डालता ‘‘आखिर बेइमानी की भी तो लिमिट होती है सड़क तो चैफुटी थी एक फुट से तो इसने घर भर दिया! साथ ही सलाद की तरह मुखिया सीमेंट भी खा गया खड्ढे तो पड़ंगे ही।’’ ‘‘अबे मुखिया सुन रहा है।’’ हम प्याला फुसफुसाया…….सचमुच उसकी गाली मुखिया की बीबी ने सुन ली थी। जब उसने अपने प्राण पति से शिकायत की तो वह मुस्करा कर बोला,‘‘लाटी इन्हीं गालियो को पचा कर ही तो कुछ बना हूं!…दो… अरे और दो…अरे तुम्हें गालियां देनी है इससे भी बुरी दो! इन्हीं के परताप से ही आगे बढा हूं और दोगे तो और आगे जाउंगा।’’वह भली-भांति जानता था कि गालियों की टी.आर.पी. ही उसकी लोकप्रियता का पैमाना है। मुखिया सब्बलसिंह परले दरजे का घुटा इंसान था। उसकी नजर में मकड़ू तो महज उसका छोटा सा मोहरंा था। सामान्यतः उसे तो वह एक बीड़ी से भी साध सकता था। थोड़ा और उग्र हुआ बीड़ी के बंडल से उसका कमन्डल भर देता! विद्रोह की पराकाष्ठा लांघने पर एक लाल क्वाटर से उसे नतमस्तक कर डालता। लेकिन मकड़ू लजा कर कहता,‘‘ वह तो बस प्यार का भूखा है प्यार से तो वह बोतल की तलछट से ही तृप्त हो जाता है।’’फिर तो वह अपनी आन-बान-शान सब नेच्छावर करने को उतारू हो जाता। लेकिन पीठ पीछे उसका कोई भरोसा नहीं था।
उस दिन मकड़ू कुछ ज्यादा ही आपे से बाहर हो गया हमप्याले से बोला ‘‘तू जानता है साऽले …. ‘कबी’ इस मुखिया के पूरवज हमारे इहां मजूरी-बेगारी करते थे। जब हमारे बाप दादा दस गज की पगडीयां पहना करते तो इनके पुरखे लंगोटियों से लाज बचाते थे। वक्त की भताग आजादी का लाभ हर किसी को थोडें ही मिला। हम कुछ शौकीन से हो गये। ये लोग फैदा उठा गये। बड़ी परधानी झाड़ता है।’’
ये हम प्याला कोई और नहीं मकड़ू का एक मुफ्तखोर दोस्त है पं0मुंशीराम का पोता सतेश्वर ऊर्फ सत्तू…..जो जमाने का बी.ए है। जब गांव-देहात में कोई दस-बारा भी बमुश्किल से हो पाते थे। थोड़ा सनकी पर स्प्वाइल सा जिनियस है मकड़ू पधान का लंगोटिया……मकडू की अर्जी-पुर्जी भी तो वही तैयार करता है। बदले में बंडल की बीड़ीयां सधिकार खींच कर बेखौप छल्ले उड़ाता तो था… साथ ही छल-बल से प्राप्त एक-आध तुराक उसे भी मिल जाती थी। मकडू को सुन रहा था.बोला ..‘‘.तो तुम्हारी ये गत कैसे हो गई! पधान थे तुम कभी।’’
बात सुन मकड़ू अतीत में खो सा गया! बात दिल में चुभ सी गई ‘‘ये सत्तू तू नहीं बोल रा समय बोल रा है। पधान हम तब भी थे अब भी …फर्क ताकत का है ! तब पधान रूतवे का सम्बोधन था। आज तंज का! पहले हम विजेता थे आज पराजित हैं। पुराने खूब ‘जर-जायदात’ छोड़ गये थे। क्या करें हम भी नबाबों की तरह गुलाबी दुनिया में खो गये! मौज मस्ती में पता भी न चला कि दौलत भाग कर न जाने कहां सिफ्ट हो गई। लक्ष्मी है न उल्लूओं को उड़ाना खूब आता है उसे। बची ‘जायदात’ खैकर खा गए। कानून भी हमारे खिलाफ़ हो ही गया। धरती माता भी तो रूठ गई ………. कुछ उगाओ तो दस दुश्मन सामने खड़े! अब तो आदमी क्या-गूंणीं-बांदर,सौल-सुंगर,चखुले-पोथले सब चुनौती दे रहे हैं हमारी पधानी को। मेरे पिता के जमाने में इलाके भर में तेरे दादा पं मंशाराम मुंशी ही ज्ञानवान और गुणी व्यक्ति थे। केवल हम ही थे जो उनकी सलाह समझ पाने में समर्थ थे। अब तो हर कोई ज्ञान की खुराफाती रोशनी से रंगा-पड़ाा है। हम निहत्थे और निढाल हो चुके हैं हे कुलदेवों ….पितरों बोलो दारू न पिये तो क्या करें। ताश न खेलें तो क्या करें
सत्तु गिलास गटकाते, सोड़ उड़ाते हुए दार्शनिक अन्दाज में रोज की तरह बोला-
मक्कू पधान- पहले हम प्रकृति के हिस्से थे अब सरकार के होे गये! प्रकृति रूठ गई है…नेता रंगमत हैं हमारे हाथ बस मत है ये हमसे इसे येन केन पं्रकारेंण लूट कर हमें चला रहे हैं.. सरकार भी हम ही तो चुनते हैं कि नही!’’
‘‘हूं!’’बात मकडू के भेजे में तो नहीं गई पर उसने अच्छे श्रोता की भांति मुंडी हिलाई
‘‘सत्तू भुला यार हम तो आज जो भी हों पहले थोकदार तो थें…हक-हकूक तो तुम्हारे पास भी थे तो हम जैसों ने आखिर कितनी लकड़ी उड़ाई होगी दो सौ साल से हम उसी पुस्तैनी मकान से सर छिपाये हैं. हमारे बाप-दादों छवांईं-मरोम्मत रंगाई-पुताई ही तो की है हमने! शहतीरें तो एक भी नहीं बदली हमारी ज्यादा से ज्यादा पांच-छ मन फी आदमी के मरघट में खर्च हुई होंगी… कौन खा गया होगा इन जंगलों को?’’
‘‘राजा महाराजा!..’’ सत्तू ने मुस्कराते हुए कहा….
‘‘ मैंने तो ये सुना था…वो तो शिकार करने जंगल मेें आते थे पर जंगल तो नहीं काटते थे।जंगल थे भी उनके किस काम के! शौक ओर शान वजह से आते थे।….साबबहादुरों के शिकार …नौकर मारते हाकिम टांग रख कर फोटो खिंचवाते.फिर निरीह मृगों पका सोरबा अर थोडी स्कांच-व्हिस्की पी और चित-पट. बाघ तो उनकी खातिरदारी में हमारे दादा-परदादाओं ने टमकाय थे’’मकड़ू ने कहा
‘‘तभी तो थोकदारी मिली होगी।’’
‘‘लेकिन बहादुरी से’’
‘‘मजाक कर रहा था। तू तो भोला है….सत्तू को कुछ और चढ सी गई आवेश में बोला‘‘ये तो राजा थे इनके साथ परदेशी गोरे थे।इनका काम था लूटना.. पब्लिक थोडे ही चुनती थी इन्हे! वे गये काले अंग्रेजों अर लोभी नोताओं ने भी कम जुल्म नहीं किये।हम से जल छीना जंगल छीना अर जमीन भी! अर दोष भी हम पर! बिना पूछे प्रतिबन्ध भी … जेगल जिनके बाप दादाओं ने काटे वे शहर जा बसे उन्हीं की औलादें उपदेश भी दे रहीं हैं और हम इन जंगलों के लिए पराये हो चुके हैं।’’सत्तू ने नाक सिकरते हुए कहां
‘‘तो किससे पूछ कर लगे प्रतिबन्ध’’
‘‘जिन्होंने जंगल न देखे न भोगे..एसी में बेठे कथित ज्ञनियों ने किताबी कीड़ों ने….. ’’
मकडू़ बात बीच में काटते हुए बोला- ‘‘सत्तू मेरे भाई …छोटी बुद्धि बड़ी बात.हम तो पुराने पधान रहे हैं हमें तो नहीं लगता कि हमने और हमारे पुरखों नें इतने पेड़ तो नहीं काट होंगेे जितना हमें जिम्मेदार ठहराया गया। तो आम-जन ने कितनी लकड़ी कटवाई होंगी कितनी घास हमारी छोटी सी गाय-बखरी ने खाई होगी?बदले में कितना गोबर डाल के आती थी।’’
‘‘बात पते की कही है तूने….जंगल सरकार,सरकारी कारिन्दों और उनके ठेकेदारों ने काटे हम पर तो बस प्रतिबन्ध लगा गये?हमारा हक़ छीन कर….किसी ने इनामात लिए, किसी ने चांदी काटी…… कितनी लकड़ी काटते थे हम? बदले में आग भी तो बुझाते थे । जब से कानून बना भस्मासुर नाच रहे हैं जंगलों में……अरे हम जंगल से कुछ लेते थे तो बदले में देते भी तो थे।’’
‘‘जब से हमसे जंगल छिना तभी से तो हमारी जवानी शहरों के लिए ज्यादा दीवानी हुई।भाग गई सारी…घर और प्यारे पहाड़ छोड़ना कौन सिरफिरा चाहता है!मजबूर थे!
‘‘भुत्त स्साले…तू ये चाहता है जवानी लौट के आये क्यों लौटे लाटे….वो भी शहर के ठाठ छोड़! डसे गन्ध की आदत हो गई…..यहां के ताजे हवा पानी में जान नहीं निकल जायेगी उनकी!’’ सत्तू ने ताना मारा!
‘‘ऐसी बात नहीं जंगल पनपाने का रोजगार करने’’-मकडू बोला
‘‘इतना मत सोच मक्की भाई! यार सोच के कुछ होता तो दुनिया हमारे खयालों के मुताबिक चलती…यार बीड़ी निकाल………..मूड बना साले…नहीं तो चलता हूं यार…..गोइंग…गच्छ.. भविष्य तो गया कल फिर पुरानी बातें होंगी….।

