Friday, March 13, 2026
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कारुणिक अंत….! और देखते ही देखते ओसला का हरपु ढोल सहित उड़कर काले पहाड़ में अंतर्ध्यान हो गया।

(मनोज इष्टवाल ट्रेवलाग 28-05-2013 )

यूँही हिमालय रहस्यों का खजाना नहीं कहा जाता। यहां हर अति का अंत है, लेकिन हरपु ने तो यह अति अपने ठाकुरों को खुश करने के लिए इसलिए की थी कि शायद इस बार उसके ठाकुर उसे ज्यादा ऊन देने वाले हैं जिससे वह अपने परिवार का तन ढकने के लिए कपड़े बना सके।

हरपु की कहानी कैसे सामने आई आप भी जानिए….

हर की दून…. सच कहूं तो लगता है मानो पृथ्वी का यही स्वर्ग हो।सबसे कारुणिक कहानी यहाँ ओसला के हरपु नामक बाजगी (ढोल वादक) की है। बहुत थकान के बाद आज हम यहां पहुंचे थे तो स्वाभाविकता नींद अच्छी आनी ही थी।  वन विश्राम गृह हर की दून में रात्री विश्राम कर रहे मैं और मेरे सहयोगी उस समय अजीबोगरीब स्थिति में थे।जब हमें प्रात: 4 बजे अचानक ढोल की आवाज में नौबत बजने के सुर सुनाई दिए। कड़ाके की ठंड में रजाई से बाहर सिर निकालकर ढोल की आवाज  सुनने का मन तो मेरा बिल्कुल नहीं था लेकिन ओसला गाँव से लगभग 10 किमी दूर  हिमालयी शिखरों के आलिंघन में यह घटना आश्चर्यचकित कर देने वाली थी, इसलिए जब रजाई से  जब मुंह बाहर निकालकर देखा तो पाया मेरे सहपाठी जो ठंड की अधिकता के कारण रजाई के अंदर अंग्रेजी के Z आकार में सोए थे, उन्होंने भी अपने सिर बाहर निकाले और हम सब प्रश्नवाचक दृष्टि से एक दूसरे को देखने लगे। ढोल की नौबत कानों में साफ आ रही थी लेकिन मैंने सबसे कहा सो जाओ सामने से बह रही मनिन्दा नदी के पानी का शोर है यह…!

सुबह जब मैंने बंगले के चौकीदार चंदराम से जानकारी चाही तो पहले वह टालने लगे लेकिन मैं कहाँ मानने वाला था। उनके पास वहां के भेडाल और पोर्टर हुक्का पीने के लिए बैठे हुए थे। जब वन रक्षक अमी चन्द राणा ने उन्हें उनकी भाषा में हरपु की कहानी को बताने की बात कही तो बुजुर्ग चौकीदार चन्द  राम बोल ही पड़े- साब…. मैं इसलिए नहीं बताता कि कहीं लोग ये न कहें कि पागल है, कपोल-कल्पित बातों से हमें बहलाने की कोशिश कर रहा है। मैंने कई बार लोगों से पूछा भी कि क्या तुमने भी ढोल की आवाज़ सुनी! तब सबने मेरा मजाक ही बनाया। अब तक मेरे सहयोगी संजय चौहान, प्रशांत नैथानी, गौरव इष्ट्वाल भी चाय की चुश्कियाँ लेते पहुँच गए थे।

हरपु औजी (ढाकी/बाजगी) की जो कहानी सामने आई वह यह थी कि हरपु नामक बाजगी हर वर्ष भेडालों से ऊँन मांगने यहाँ आया करता था क्योंकि सारे भेडाल एक नियत तिथि पर ही भेड़ों के बाल काटने हर की दून आया करते थे, जहां सारे ग्रामीण  वन परियों, मातृकाओं व ऐड़ी-आँछरियों के नाम सेरुवा (एक प्रकार का आटे से बना रोट व हलवा) काटते थे। उस वर्ष भी हरपु ढोल लेकर आया और नौबत बजाकर भेडालों के पुरखों का गुणगान करता रहा। वह ढोल सागर की धुन में ऐसे उलझा कि उसने अपना सारा ज्ञान उसी में झोंक दिया। कहा जाता है कि मातृकाओं (पर्वत में निवास करने वाली अप्सराओं/परियों) को हरपु का ढोल इतना पसंद आया कि वे उसे ढोल सहित उड़ाकर बन्दरपूँछ पर्वत की काली चोटी जिसे काला पहाड़ कहते हैं,  पर ले गयी। सब लोग हरपु को उड़ते देखते रहे। वह करुण पुकार करता रहा कि बचाओ…बचाओ लेकिन भला कहाँ हिमालयन की उतुंग शिखर पर रहने वाली अप्सराएं उसे कहाँ छोड़ने वाली थी। बेचारे हरपु जीते जी स्वर्गारोहिणी शिखर के सामने स्थित काले पहाड़ में लोप हो गया। तब से हरपु का सिर्फ ढोल ही सुनाई देता है वह भी किसी किसी को। इसीलिए हर-की-दून को यहाँ के स्थानीय लोग हरपु नाम से पुकारते हैं। हम भाग्यशाली थे कि हमें हरपु के ढोल की नौबत सुनाई दी वरना हम भी इस कहानी से महफूज रह जाते।

यहाँ हर शिला खंड के नीचे कोई न कोई कथा कहानी या किंवदंती छुपी हुई है, शायद इसलिए इसे देव लोक या पृथ्वी का स्वर्ग कहा गया है। हरपु के जिन्दा देव लोक जाने की गवाह जहां बन्दरपूँछ के दायीं ओर की आटा पीक की पहाड़ियां हैं जिसके दूसरी ओर चीन का लाल साम्राज्य है वहीँ बायीं ओर पांडवों को जिन्दा स्वर्ग पहुंचाने की गवाह स्वर्गारोहिणी की पर्वत श्रृंखलाएं भी हैं।

हर की दून बुग्याल धरा पर बिखरे प्रकृति के रत्न स्वरूपी सैकड़ों पुष्पों की प्रजातियाँ जिनमें लेसर, फ़र, जयाण, ब्रह्मकमल,भेड-फूलुड़ी, भेड़गदा, जयरी, बुरांस, सिमरु, सफ़ेद कमल, विश्कंदारी, सुन्फुलुडी इत्यादि सैकड़ो पुष्प हैं जो नित देवताओं और प्रकृति का श्रृंगार कर पर्यटकों से कहते नजर आते हैं. ‘‘श्रद्धापूर्ण: सर्वधर्मा: मनोरथफलप्रदा:। श्रद्दयाम साध्यते सर्वश्रद्दया तुष्यते हरिरू।।” अर्थात् श्रद्धा पूर्वक सभी धर्मों के आचरण करने वाले मनुष्यों को मनोरथ प्रदान हो,यही श्रद्धा सबके प्रेम में बसी हो तो उससे श्री हरि प्रसन्न रहते हैं।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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