Sunday, March 22, 2026
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बेहद अनूठी परम्परा है उत्तराखंड में दूल्हा-दुल्हन मंगल स्नान के बाद गुड़दणा/चँदोया बांटने की।

बेहद अनूठी परम्परा है उत्तराखंड में दूल्हा-दुल्हन मंगल स्नान के बाद गुड़दणा/चँदोया बांटने की।

(मनोज इष्टवाल)

सनातन हिन्दू धर्म में कर्मकांड का जितना महत्व है उससे ही अधिक खूबसूरत, लोकप्रिय व प्रकृति सम्मत उसकी परम्पराएं हैं। इन्हीं परम्पराओं में उत्तराखंड की विवाह परम्पराएं भी हैं जिनमें ज्यादात्तर ने अब सतयुग के वैदिक काल की परम्पराओं का त्याग कर पुरुषोत्तम श्रीराम के त्रेता युगीन परम्पराओं का अधिग्रहण कर दिया है। शायद यह इसलिये क्योंकि शादी-विवाह की वैदिक कर्मकांड परम्पराओं को दरकिनार करके फोटो परम्परा का ज्यादा जन्म हो गया है जिसने हमारी सनातन धर्म परम्परा से वर स्वरूपी भगवान विष्णु के पीताम्बर व लक्ष्मी सम्बन्धी वधु की परम्पराओं में शामिल दुशाला हमसे छीन लिया है।

अब ना गोत्राचार का पर्दा दिखता है न वेदी का पर्दा…! ऐसे में वैदिक मंत्रों के उच्चारण का क्या अर्थ रह जाता है समझ नहीं आता। न वेदी पूजन में इंद्र बधाई  (इंद्र बढैs) ढोल पर बजती है, और न मंगलेर के मंगल गीत ही।

और तो और मंगल स्नान के समय की कई परम्पराएं धूमिल हो गयी हैं। जैसे उर्खेला (ओखली) में कूटी जाने वाली समोया-कच्ची हल्दी और न तांबे की तौली में गर्म पानी में डोलता चांदी का सिक्का। ये सब बेवजह नहीं होते थे बल्कि अगर आप इनके मूल में जानकारी जुटाएंगे तो पाएंगे इसके पीछे वैज्ञानिक दृष्टिकोण हैं। फिलहाल हम चर्चा करते हैं मंगल स्नान या बाने के समय दुल्हन के सिर के ऊपर या दूल्हे के सिर के ऊपर दुशाले में रखे जाने वाली थाल की। जिसमें पूर्व में पकोड़ी, अरसे, चावल, तिल, गुड़/भेली व धातु रखी जाती थी। जिन्हें दुशाले के बीचोंबीच रखा जाता है। बाने देने के बाद दुल्हन की आरती देवी के रूप में जिसे लक्ष्मी स्वरूपा माना जाता है। इसमें रखे गुड़ की पांच डली, पांच लड्डू, पांच पकोड़ी, पांच अरसे व मोती (चावल) सब मिक्स किया जाता है। इन पंच तत्वों का मिश्रण कर सभी में बांटा जाता है।


थाली में रखे इन पंचतत्वों को गुड़दणा कहते हैं व जिस शाल को दोनों छोर से पकड़ा जाता है जिसे चंदुआ या चँदोया कहा जाता है थाली में रखे इस पंचतत्व को बांटा  नहीं  जाता है तब तक इसे चंदुआ/चँदोया का चौंळ कहते हैं। मूलतः यह परम्परा पहाड में पंच देवता व ऐड़ी आँछरियों से दुल्हन की रक्षा व आशीर्वाद के लिए प्रचलित मानी जाती है।

वहीं दूसरी ओर यह भी माना जाता है कि यह इन सबके द्वारा अनिष्ट से वर या वधु को बचाये रखने के लिए मूल मंत्रित होता है। व दुल्हन की आरती के पश्चात जब उसे दुशाला व दूल्हे को पीताम्बर पहनाया जाता है तब पंडित द्वारा अभिमन्त्रित चावल व मास (उड़द की दाल) व धातु के रूप में सिक्के उनके सिर के ऊपर से फिराकर फैंके जाते हैं ताकि दुष्ट आत्माएं व अला-बला पास न आ सकें। वहीं लोटे में भरे पानी को भी मंगल स्नान के बाद वर या वधु के सिर के चारों ओर फिराकर विवाहित माँ बहनें एक घूंट पीती हैं ताकि उन वर या वधु को दुष्ट शक्तियों से बचाया जा सके। इसी दौरान बिष्णु आरती की जलती बत्ती से उनका टीका किया जाता है ताकि उन्हें किसी की नजर ना लगे।

नहाते वक्त या उससे पूर्व उसमें गंध/अक्षत छिड़के जाते हैं, जो पंडित जी मंत्रोचारण कर छोड़ते हैं तो दूसरी ओर मंगलेर मंगल गीत गाती हुई कहती हैं- केन होई, केन होई कुंडी काजोल…दे द्यावा ब्रह्मा जी हल्दी का बाना। क्यान होई क्यान होई सूरीज धुमैलो, हमारी गौरा जी कु अस्नान होलो।

अब ये सब परम्पराएं इसलिए क्षीण हो रही हैं क्योंकि न वधु सम्बन्धी दुल्हन बनी लड़की इन परम्पराओं के बारे में जानकारी रखती है, न वर बने लड़के को ही इन परम्पराओं की जानकारी है न माँ बाप को ही होती है। इसके दोषी हम स्वयं भी हैं व साथ साथ वे पण्डित भी जो इनका विस्तार नहीं समझाते। शायद यही कारण भी है कि हमारे साथ जन्मों के रिश्ते कई बार साथ दिन तो कई बार 7 माह तो कई बार 7 साल भी नहीं निभ पा रहे हैं। हमें साथ फेरों के साथ बन्धन ही याद नहीं हैं तो भला हम गुड़दणा या चँदोया परम्परा को किसे समझ सकेंगे।

 

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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