रिवर्स माइग्रेशन ने लौटाया अपनी धर्म संस्कृति व लोकसमाज की ओर। 35 साल बाद धारकोट गांव ने खेले बग्वाली भैलो।
(मनोज इष्टवाल)
कोरोना संक्रमण काल से निजात मिली हो या न मिली हो, लेकिन इस गांव की कुलदेवी माँ बालकुंवारी के प्रताप से यहां के कोई भी वाशिंदे कोविड से संक्रमित नहीं हुए हैं। और तो और इस दौर ने कई युवाओं को रिवर्स माइग्रेशन के लिए लालायित किया है। यह लम्बे समय पश्चात गांव में दिखने को मिला कि दर्जनों युवा व परिवार दीपावली में बग्वाल मनाने गांव लौटे व उन्होंने बग्वाली भैलो की परंपरा का निर्वहन क़िया।
बुजुर्ग इस बात से खुश थे कि उनकी सनातन परंपरा की शुरुआत होनी प्रारम्भ हुई है। इसके लिए गांव के युवा कम उत्साहित थे जबकि बेटियों ने यह बागडोर अपने हाथों में ली व मर्सेटा (चौलाई2) के डंडों पर तिलठिंगा (तिल के झाड़) को लपेटकर उनके भैलो (होले/मशालें) बनाई। फिर क्या था शाम ढलते- ढलते गांव के आवजी आनन्द लाल के ढोल की घमक ने सबको जागृत किया और देखते ही देखते गांव का पंचायती आंगन लबालब भर गया। सबसे उत्सुक वह पीढ़ी दिखी जिन्होंने सिर्फ सुना ही था कि भैलौ भी कोई होता है। छोटे नौनिहाल से लेकर 30-32 साल तक के वे युवा ज्यादा उत्साही थे जिन्होंने सनातन संस्कृति का यह रूप नहीं देखा था। आज 1985 के पश्चात यानि 35 बर्ष बाद फिर से अपने गांव में बग्वाली भैलो की शुरुआत देखकर जहां युवा उत्साहित थे, वहीँ ग्रामीण बुजुर्गों की आंखों में चमक थी।
लगभग 80 बर्षीय श्रीमती दौंथि देवी कहती हैं कि हमने तो अपने गांव में सिर्फ भैलौ ही नहीं देखा बल्कि गैड खींचना भी देखा। तब अभाव जरूर था। रुपया पैसा नहीं था लेकिन भाई-चारे की मिशाल हमारे गांव में मशहूर थी। आज हमारे पास, हमारे नौनिहालों के पास वह सब सुख सुविधाएं उपलब्ध हैं जो मेरी उम्र के लोगों ने कभी नहीं देखी। लेकिन एक कमी बहुत आई है। पहले गांव में कोई नौकरी कर छुट्टी पर गांव आता था तब उसके घर शाम को सब लोग बैठने जाया करते थे जिन्हें गुड़ चना बांटा जाता था बाद में गुड़ की जगह लड्डू व और बाद में मिठाई बांटी जाती थी। सभी गांव वाले हुक्का गुड़गुड़ाते थे वे घर लौटते समय दो चार चने अपने बच्चों के लिए ले आया करते थे। जिस ख्वाळ (मोहल्ले) का नौकर लौटता था उस पूरे ख्वाळ में एक कटोरी चना व मिठाई या लड्डू बांटा जाता था। अब तो कब कौन आता है चला जाता है , पता भी नहीं चलता। लेकिन आज मैं बहुत खुश हूँ, सुनने में आया है कि आज मेरे गांव में भैलो खेला जा रहा है। काश. ..मैं भी चलकर वह सब देख पाती।
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श्रीमती दौंथि देवी की ही उम्र की श्रीमती सुलोचना देवी बिष्ट कहती हैं- “बेटा जब हमारा डोला यहां आया था तब बग्वाल की गैड व इगास के भैलो यहां बहुत प्रचलित थे। जिसकी तैयारी एक माह पूर्व से शुरू हो जाया करती थी। तब यहां ठिलठिंगे के ही नहीं बल्कि छिलों (भेमल की लकड़ी) के भी बड़े बड़े भैलो बनाये जाते थे। तब ग्रामीण जवान बूढ़े सब भैलो खेलने जाया करते थे। कभी ढ़करिया धार, कभी चांद का पुंगड, कभी घेरुआ तो कभी बेरीधार या कौडू घेरुआ…! तब ढोल की धुन पर भैलो बे भैलो बोलकर नाचते थे वे खरगड पार असवालस्यूँ के गांव व मरवीगाड़ पार बसे अपने पड़ोसी गांवों को गालियां देते थे। यही उपक्रम उन गांवों के लोग भी किया करते थे। ये गालियां ठट्ठा मजाक के सिवाय और कुछ नहीं होता था क्योंकि लोग इसे शगुन के समान माना करते थे व गालियां सुनने सुनाने में खुश हुआ करते थे। और तो और अगर गांव में कोई समधी, जवाईं या जीजा बग्वाल व इगास पर आ गया तो वह भैलो की रात खूब गालियां सुनने को तैयार रहता था। सुलु ताई आगे कहती हैं कि तब ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में पैसा शामिल नहीं था।खेती से जो अन्न उत्पन्न होता था उसी पर ग्रामीण निर्भर रहते थे। भैलो हमेशा उस सार (सरहद) में खेले जाते थे जहां गेंहूँ बोए होते थे व उनके अंकुर फूटने को होते थे। जिन खेतों में भैलो खेला जाता था वहां ज्यादा पैदावार होती थी। आज न समय की बारिश है न तीज त्यौहार के प्रति श्रद्धा। लेकिन आज मन से खुश हूं कि बर्षों बाद भैलो खेले जा रहे हैं। जुगराज रह बेटे तूने यह शुरुआत कर ही दी। यह होनी भी चाहिए ताकि हमारी संस्कृति बच सके व नौनिहाल उसे समझ सकें।
नई शिक्षित बहुवें व बेटियां तो सचमुच आज बहुत आनन्द विभोर थी। दामिनी, मानसी रावत, राखी शैली, अंजलि शैली आदि तो पहले ही अपने चौक में ठिलठिंगा इकट्ठा कर भैलो बना चुकी थी। बहुवें भी खासी उत्साहित दिखी। श्रीमती सुमति बिष्ट, दीपा रावत, नीलम शैली इत्यादि का कहना था कि वे सचमुच भैलो खेल कर बहुत रोमांचित हुई। यह हमारी सनातन परंपरा के पर्व बग्वाल का अद्भुत हिस्सा है। अभी तक हम सब इसे टीवी न्यूज चैनल्स में देखा करते थे। आज खुद भैलो खेलकर क्या बेटियां क्या बहुएं सब बेहद खुश हैं।
कैप्टन एस पी शैली ने बग्वाल की शुभकामनाएं देते हुए पीठ थपथपाते हुए कहा कि वास्तव में बग्वाल के भैलो हमारे लोकसमाज व लोक संस्कृति का बेहद खास हिस्सा है। इसे जीवंत बनाने के लिए आप सब युवाओं को शुभकामनाएं। इस बर्ष गांव में आधे परिवारों की बग्वाल नहीं है लेकिन आने वाले साथ से हम इस बग्वाल व इगास के भैलो को बेहद विस्तार देंगे ताकि हिन्दू धर्म की सनातन परम्पराएं जीवित रह सकें। उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी को शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए कहा कि इसमें उनका भी कहीं न कहीं इसे जिंदा करने में योगदान है।
आवजी आनंद लाल बोले- मुझे लगता है कि जब तक मैं जिंदा हूँ तभी तक यह ढोल इस गांव में जिंदा है। आगे भी रह पाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं लेकिन आज मन खुशी से झूम रहा है कि हमारी पुरानी परंपराये लौट रही हैं।
बहरहाल भैलो खेलने से पूर्व ग्रामीणों ने माँ बालकुंवारी का दीप प्रज्वलित कर मिष्ठान वितरण किया व पंचायती आंगन से भैलो जलाकर गांव के खेतों में भैलो के प्रकाशपुंज बिखेरे व सामूहिक स्वर में खुशियां मनाते हुए कहा – भैलो बे भैलोss ss…!



