(हिमालयन न्यूज़ टीम)
यह एक ऐसी महिला की आत्मकथा है जो कुमाऊं यूनिवर्सिटी में वाइस प्रेसीडेंट रह चुकी है लेकिन अचानक 09 बर्ष पूर्व जिंदगी ने ऐसी पलटी मारी कि हंसी प्रहरी हरिद्वार में भीख मांगकर अपना व अपने बच्चे का पेट भर रही है।
सोशल साइट पर जैसे ही यह खबर प्रदेश की राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्रीमती रेखा आर्या की नजरों में पड़ती है वह हरिद्वार जा पहुंचती हैं। वह हंसी प्रहरी से मुलाकात कर फेसबुक में ट्वीट करती हैं -“हरिद्वार में बहुत मुश्किल हालातो में गुजर बसर कर रहीं मेरी विधानसभा क्षेत्र की #हंसी_प्रहरी जी से मुलाकात कर उनके दर्द को सुन साझा किया,और हंसी जी को सरकार एवं महिला कल्याण विभाग द्वारा नारी निकेतन में रहने की व्यवस्था,शिशु सदन में उनके बच्चे की शिक्षा व नौकरी के लिए मैंने प्रस्ताव दिया है। जिसमे हंसी जी ने समय लेकर विचार कर अपना निर्णय बताने के लिए कहा है। उम्मीद है कि हंसी जी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर समाज की मुख्य धारा से जुड़ेंगी। #narendramodiji #smritiirani ।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि हंसी प्रहरी आसमान से जमीन में आ गयी। इसकी पड़ताल हिमालयन न्यूज़ द्वारा की गई तो जो जानकारी सामने आई वह हतप्रभ कर देने वाली हैं।
हंसी प्रहरी की कहानी …एक ऐसी दास्तां जो आपको रुला देगी !
कुमाऊं यूनिवर्सिटी का कैंपस कभी हंसी प्रहरी के नाम के नारों से गूंजता था। प्रतिभा और वाकपटुता इस कदर भरी थी कि वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव लड़ी और जीत गई। राजनीति और इंग्लिश जैसे विषयों में डबल एमए किया। तब कैंपस में बहसें हंसी के बिना अधूरी होती थीं। हर किसी को इस बात का यकीन था कि हंसी जीवन में कुछ बड़ा करेगी। पर समय का पहिया किस ओर घूमता है ये किसे पता। जोे लड़की कभी विवि की पहचान हुआ करती थी वह आज भीख मांगने के लिए मजबूर है। हरिद्वार की सड़कों, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और गंगा के घाटों पर उसे भीख मांगते हुए देखने पर शायद ही कोई यकीन करे कि उसका अतीत कितना सुनहरा रहा होगा।
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर क्षेत्र के हवालबाग ब्लॉक के अंतर्गत गोविंन्दपुर के पास रणखिला गांव पड़ता है। इसी गांव में पली-बढ़ीं हंसी पांच भाई-बहनों में से सबसे बड़ी बेटी है। वह पूरे गांव में अपनी पढ़ाई को लेकर चर्चा में रहती थी। पिता छोटा-मोटा रोजगार करते थे। उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन रात एक कर दिया था। गांव से छोटे से स्कूल से पास होकर हंसी कुमाऊं विश्वविद्यालय में एडमिशन लेने पहुंची तो परिजनों की उम्मीदें बढ़ गईं। हंसी पढ़ाई-लिखाई के साथ ही दूसरी एक्टिविटीज में बढ़-चढ़ कर भाग लेती थी। साल 1998-99 वह तब चर्चा में आई जब कुमाऊं विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन की वाइस प्रेसिडेंट बनी।
हंसी विश्वविद्यालय में 4 साल लाइब्रेरियन भी रहीं।
हंसी प्रहरी के मुताबिक उन्होंने करीब चार साल विश्वविद्यालय में नौकरी की। उन्हें नौकरी इसलिए मिली क्योंकि वह विश्वविद्यालय में होने वाली तमाम एजुकेशन से संबंधित प्रतियोगिताओं में भाग लेती थी। चाहे वह डिबेट हो या कल्चर प्रोग्राम या दूसरे अन्य कार्यक्रम, वह सभी में प्रथम आया करती थी। इसके बाद उन्होंने 2008 तक कई प्राइवेट जॉब भी की। 2011 के बाद हंसी की जिंदगी अचानक से बदल गई। उन्होंने साफ-साफ कुछ भी बताने से तो इन्कार कर दिया। क्योंकि वह नहीं चाहती कि उनकी वजह से दो भाई और बाकी परिवार के सदस्यों पर किसी तरह का भी फर्क पड़े। हंसी ने बताया कि वह इस वक्त जिस तरह की जिंदगी जी रही हैं, वह शादी के बाद हुई आपसी विवाद का नतीजा है।
दोबारा से जिंदगी की शुरुआत करने की हसरत !
शादीशुदा जिंदगी में हुई उथल-पुथल के बाद हंसी कुछ समय तक अवसाद में रहीं और इसी बीच उनका धर्म की ओर झुकाव भी हो गया। परिवार से अलग होकर धर्मनगरी में बसने की सोची और हरिद्वार पहुंच गईं। तब से ही वो अपने परिवार से अलग हैं। वो बताती हैं कि इस दौरान उनकी शारीरिक स्थिति भी गड़बड़ रहने लगी और वह सक्षम नहीं रहीं कि कहीं नौकरी कर सकें। हालांकि अब उन्हें लगता है कि यदि उनका इलाज हो तो उनकी जिंदगी पटरी पर आ सकती है। वह दोबार से अपनी जिंदगी की शुरुआत कर सकती हैं।
कई बार मुख्यमंत्री को लिख चुकी हैं पत्र।
हंसी प्रहरी ने बताया कि वह 2012 के बाद से ही हरिद्वार में भिक्षा मांग कर अपना और अपने छह साल के बच्चे का पालन-पोषण कर रही हैं। बेटी नानी के साथ रहती है और बेटा उनके साथ ही फुटपाथ पर जीवन बिता रहा है। फर्राटेदार इंग्लिश बोलने वाली हंसी जब भी समय होता है तो अपने बेटे को फुटपाथ पर ही बैठकर अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत और तमाम भाषाएं सिखाती हैं। इच्छा यही है कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर बेहतर जीवन जीएं। इतना ही नहीं, वह खुद कई बार मुख्यमंत्री को पत्र लिख चुकी हैं कि उनकी सहायता की जाए। कई बार सचिवालय विधानसभा में भी चक्कर काट चुकी हैं। इस बात के दस्तावेज भी हंसी के पास मौजूद हैं। वह कहती हैं कि अगर सरकार उनकी सहायता करती है तो आज भी वह बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकती हैं।
यह जानकर बड़ी हैरत होती है कि आये दिन मातृशक्ति के नारों से सरकारी महकमें गुलजार रहते हैं लेकिन जब नौबत मातृशक्ति के संरक्षण व संवर्धन की होती है तब राजनैतिक और सरकारी गलियारों में इनका कहीं शोर नहीं गूंजता। राज्य मंत्री रेखा आर्या चाहती हैं कि उन्हें हंसी प्रहरी की वर्तमान हालात नारी निकेतन में रखने लायक हैं लेकिन यहां भी प्रश्न उठता है कि क्या फुटपाथ के संघर्ष के बाद अब हम हंसी प्रहरी को एक और संघर्ष के लिए तैयार नहीं कर रहे हैं। होना तो यह चाहिये था कि कुछ दिन हंसी प्रहरी की मनोस्थिति का जायजा लेकर उन्हें सबलता प्रदान करने के लिए किसी विभाग में संविदा पर नौकरी दी जाती ताकि वह अपनी जिंदगी की नई शुरुआत कर पाती।

