मुझे लगता है कि इस रक्त सरोवर या बहती हुई रक्त की नदी की जानकारी साझा करने से पूर्व मुझे दुर्गा सप्तशति के आठवें अध्याय के रक्तबीज महाकाली संग्राम की जानकारी लेनी चाहिए क्योंकि जैसे ही इस जानकारी को आप पढोगे तो अविश्वसनीयता के साथ मुंह से एक ही शब्द निकलेगा असम्भव! क्योंकि भला कोई एक महिला या देवी इतनी शक्तिशाली कैसे हो सकती है जिसने दैंत्यों की कई अक्षणी/कई करोड़ सेना को कैसे दौड़ा-दौड़ाकर मारा होगा? और जब उसकी रक्तपिपासा पूरी नहीं हुई तो उसने देवताओं को भी मारना शुरू कर दिया! वह तो भला हो भोले नाथ का जो माँ काली के पैरों के नीचे आ गए व माँ काली का गुस्सा शांत हुआ वरना यह श्रृष्टि बची भी रहती या नहीं…कहा नहीं जा सकता! यकीन न हो तो आप भी पढ़िए कि महिषासुर से लड़ती हुई देवी के सामने कितनी विशाल सेना हैः-युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरंग्बलान्वितः। स्थानामयुतैः षड़भियदग्राख्यो महासवुरः।।
आयुध्यातायुताना च सहस्त्रेण महाहनुः। पंच्चाशदभिश्त नियुतैरसिलोमा महासुरः।। आयुतानां शतैः षड्भिर्वाकलो युयुधे रणे। गजवाजिसहस्त्रोधैरनेकैः परिवारितः।। वृतो स्थानां कोटच्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत। बिडालाख्योडयुतानां च पच्चाशद्रभिरधायुतैः।। युयुधे संयुगे तत्र स्थानां परिवारितः। अन्ये च तत्रायुतशो स्थनागयैर्वृत्ताः।। युयुधः संयुगे देव्या सह सत्र महासुराः। कोटि कोटि सहस्त्रैस्तु स्थानां दन्तिनां तथा।।
(अन्य दैत्यों की चतुरंगिणी सेना साथ लेकर चामर भी लड़ने लगा, साठ हजार रथियों के साथ आकर उदग्र नामक महादैत्य ने लोहा लिया। एक करोड़ रथियों को साथ लेकर महाहनु नामक दैत्य युद्ध करने लगा। जिसके रोएँ तलवार के समान तीखे थे, वह असिलोमा नाम का महादैत्य पाँच करोड़ रथी सैनिकों सहित युद्ध में आ डटा। साठ लाख रथियों से घिरा हुआ वाष्कल नामक दैत्य भी उस युद्धभूमि में लड़ने लगा। परिवारित नामक राक्षस हाथी सवार और घुड़सवारों के अनेक दलों तथा एक करोड़ रथियों की सेना लेकर युद्ध करने लगा। बिडाल नामक दैत्य पाँच अरब रथियों से घिरकर लोहा लेने लगा। इसके अतिरिक्त और भी हजारों महादैत्य रथ, हाथी और घोड़ों की सेना साथ लेकर वहाँ देवी के साथ युद्ध करने लगे। स्वयं महिषासुर उस रणभूमि में कोटि-कोटि सहस्त्र रथ, हाथी और घोड़ों की सेना से घिरा हुआ खड़ा था)।
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू से सैंज व सैंज से लगभग 70 किमी. दूर पहाड़ी के अंतिम छोर पर स्थित रक्तिसर (सरोवर) अपने प्राचीन इतिहास को कायम रखे हुए है। पूर्व में इसका नाम रति था लेकिन बाद में यह रक्तिसर नाम से कहलाया जाने लगा। किंवदंती के अनुसार इस स्थान पर महाकाली के हाथों रक्तबीज नामक राक्षस का वध हुआ था।
रक्तबीज को ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था कि उसके वध करने पर जितनी खून की बूंदें धरती पर गिरेंगी, उतने ही रक्त बीज पैदा होंगे। अपनी शक्ति पर घमंड करते हुए रक्तबीज ने पाप के रास्ते पर चलना नहीं छोड़ा। इससे देवी-देवता काफी दुखी हो गए। उससे छुटकारा पाने के लिए देवताओं ने अपनी शक्ति मां काली को देकर रक्तबीज का अंत करने की योजना बनाई। मां काली ने अपने दिव्य अस्त्रों द्वारा रक्तबीज का पीछा करके रक्ति नामक स्थान पर भयंकर युद्ध किया। मां काली ने अपनी खडग़ से रक्तबीज का वध करके खून को धरती पर नहीं गिरने दिया व सारा खून पी डाला। काल का चक्र धीरे-धीरे चलता गया और कुछ समय के बाद इस स्थान पर स्थित सरोवर का पानी खून की तरह लाल हो गया। जिस कारण इस स्थान को रक्तिसर के नाम से जाना जाने लगा।
हरिराम चौधरी जानकारी साझा करते हुए बतातें हैं कि धार्मिक स्थल रक्तिसर के भीतर आज भी छोटे-छोटे जलाशय बने हुए हैं। रक्तिसर के मध्य में एक स्थान ऐसा भी है, जहां पुरातन घटना का साक्षात प्रमाण देखने को मिलता है। वहां की कुछ भूमि अभी भी लाल रंग की है वहीं निचली सतह से निकलने वाला पानी भी खून की तरह लाल है। माना जाता है कि इस सरोवर के नीचे रक्तबीज का शव दबाया गया है, जिस कारण यहां से लाल रंग का पानी निकलता है।
हरिराम चौधरी के अनुसार सैंज घाटी के अंतिम शिखर पर स्थित रक्तिसर जाने के लिए 3 दिन का समय लगता है। रक्तिसर पहुचने के लिए पहले दिन सैंज से न्यूली होकर रात्रि ठहराव बाहे-पुल के समीप करना पड़ता है। दूसरे दिन मरौड़ गांव तथा तीसरे दिन शाम को रक्तिसर मां काली के दरबार में श्रद्धालु पहुंच पाते हैं।
चौधरी बताते हैं कि सैंज और बंजार घाटी के सैंकड़ों हरियान सदियों से प्राचीन देव परंपराओं का निर्वहन करते आ रहे हैं। जब भी बंजार के आराध्य देवता श्रृंगा ऋषि, शैंशर के मनु ऋषि और थाची के देवता श्री लक्ष्मीनारायण का नया रथ बनता है तो रथ की शुद्धीकरण के लिए कई किलोमीटर दूर खतरनाक रास्तों को लांघकर सैंकड़ों हरियानों को रक्तिसर पहुंचना बेहद जरूरी होता है। यहीं नहीं, हरियान क्षेत्र में देवता द्वारा नया गुर निकाला जाता है तो इसके पूजन व शुद्धीकरण के लिए रक्तिसर जाते हैं। इसके अलावा घाटी के दर्जनों देवी-देवता शक्तियां अॢजत करने के लिए इस क्षेत्र का रुख करते हैं।
वे जानकारी देते हैं कि सैंज और बंजार घाटी के अलावा जिला के दूरदराज क्षेत्रों के लोग भी यहां तीर्थ स्नान के लिए पहुंचते हैं वहीं कुल्लू घाटी के 18 करड़ू देवी-देवताओं का आना-जाना लगा रहता है। यहां पर रात्रि ठहराव की व्यवस्था न होने से दूरदराज के लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है।
उनका मानना है कि रात्रि ठहराव की व्यवस्था करने के लिए संबंधित विभाग और सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं जबकि यहाँ हर बर्ष हजारों की संख्या में धर्म-आस्था व धार्मिक पर्यटन से जुड़े लोग पहुँचते हैं।
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