(मनोज इष्टवाल)
उनकी झोली में ऐसे दर्जनों पुरस्कार हैं जो अमूल्य हैं! कई सामाजिक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित भी किया लेकिन उन सभी सम्मानॉन से इतर आज भी उनकी आँखों की चमक तब ज्यादा दिखाई देती है, जब वह सड़क पर चलते स्कूल को बढ़ते क़दमों में कॉपी-किताब का बस्ता लादे किसी मुफलिस, गरीब, बेसहारा बच्चे को देखती हैं। उनकी आत्मा तृप्त तब होती है, जब उन्हें इस बात का आभास होता है कि उसके होंठ सूखे नहीं हैं, भूख से उस बच्चे का चेहरा कुम्हलाया नहीं है! उन्हें भूख भी तभी लगती है जब वह स्कूल से आने के बाद एक चक्कर शहर की झुग्गी-झोपडी बस्ती, नदी तट या नालों के किनारे बसी मलिन व संपेरा बस्ती में घूमकर उन बच्चों को दो आखर शिक्षा ज्ञान देकर तसल्ली नहीं कर लेती कि आज न ये कूड़ा बीनते मिले, न किसी को उन्होंने कटोरा पकडे भीख मांगते देखा और न किसी को नशे के कारोबारी के साथ खड़े देखा। आखिर माँ सरस्वती की चेली जो हैं वो..! एक शिक्षिका और नाम है संगीता कोठियाल फरासी।
यह सब यूँही हर कोई नहीं कर पाता और न ही किसी आम शिक्षक के पास इतनी फुर्सत है कि वह मोटी तनख्वाह लेने के बाद अपने वेतन का आधा से ज्यादा हिस्सा अपने घर परिवार पर खर्च करने की जगह ऐसे अपरिचित, अमान्य और समाज की नजर में बहिष्कृत लोगों पर खर्च करे जो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी गटर की सी जिन्दगी जीते रहे हैं उन्हें भला क्या सरोकार कि वे पढ़ें-लिखें, नौकरी कर सम्मान भरी जिन्दगी जीयें। लेकिन श्रीमती संगीता कोठियाल फरासी ज़रा कुछ अलग हाड़-मांस की शिक्षिका हैं। उन्हें लगता है कि फिर अध्यापन जैसा पेशा चुनने का फायदा ही क्या है जब हम समाज के उस वर्ग बिशेष के लिए काम न करें जो दीये की रौशनी के नीचे अँधेरे में सदियों से अपनी जिन्दगी काट रहा है।
“हिमालयन डिस्कवर” से बात करते हुए संगीता कोठियाल फरासी इस बात से बेहद खुश थी कि वो बच्चे जो कल तक अपने परिवार के साथ रोजी रोटी की तलाश में लखनऊ के आस-पास के गाँवों से गढ़वाल श्रीनगर में आकर अपनी दो जून की रोटी जैसे-तैसे जुटा रहे थे, आज वही परिवार व उनके बच्चे कोरोना काल में भी उनसे ऑनलाइन शिक्षा ग्रहण करते हुए बेहद उत्साहित हैं। श्रीमति संगीता कोठियाल फरासी बताती हैं कि कोरोना काल में जब ये परिवार भुखमरी से बचने या कोरोना की दहशत से घबराकर वापस अपनी जड़ों के लिए लौटे तब वह बहुत अपसेट रही। इतनी अपसेट कि उनकी भूख ही खत्म हो गयी। वह दिन-रात यही सोचती कि जिन बच्चों पर उन्होंने रात दिन खर्च कर उन्हें स्कूल में अक्षर ज्ञान के लिए भेजा। जिन्होंने पढ़ना लिखना सीख लिया था और मेरे जाते ही जिनके चेहरों पर मुस्कान दौड़ने लगती थी। अब वापस लखनऊ जाकर फिर वे वही कूड़ा बीनने वाले, भीख मांगने वाले न बन जाएँ। मेरा कई बार मन भी हुआ कि उन 15-20 परिवारों का आर्थिक बोझ खुद उठा लूँ ताकि उनके बच्चे यहाँ पढ़ लें, लेकिन यह आसान काम नहीं था। वक्त और परिस्थितियों के आगे हम सब बौने हो जाते हैं। आखिर किसी भी पागलपन की एक सीमा रेखा होती है। यह मेरा पागलपन ही तो है कि मैं अपने वेतन में से करीब आधा वेतन ही अपने बच्चों व अपने परिवार पर खर्च कर पाती हूँ। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे सचमुच ऐसा पति परमेश्वर मिले हैं जिन्होंने कभी मेरे इस पागलपन पर अंगुली नहीं उठाई बल्कि हर बार मुझे उत्साहित और प्रेरित ही किया।
संगीता कोठियाल फरासी कहती हैं कि एक दिन अचानक एक अनजान फोन नम्बर से फोन आया और किसी महिला ने कहा कि मैडम मैं आपके विद्यार्थी की माँ बोल रही हूँ। मैं बच्चों की जिद पर आपको फोन कर रही हूँ। यहाँ लगभग 10 बच्चे पिछले एक हफ्ते से अपने माँ-बाप को परेशान कर रहे हैं कि या तो हमें वैसे ही पढ़ाई करवाओ जैसे और स्कूलों के बच्चे फोन में देखकर करते हैं वरना वापस श्रीनगर चलो! हमें पढ़ाई करनी है। मैडम- आपने ये क्या कर दिया अब ये कोई भी अपना पेट कैसे पालेंगे सब पढ़ाई की जिद किये हुए हैं। अब आप ही बताओ कि इस महामारी में अपना ही गुजारा चलाना मुश्किल है फिर इन्हें फोन पर पढ़ाई कैसे करवाएं।
सचमुच यह सब बताते हुए संगीता मैडम की आँखें ऐसे लगी मानों छलकने ही वाली हों। अपने को संयमित करती हुई बोली- सर, सच मानिए मैं इतनी खुश हुई कि क्या कहना। मैंने सभी बच्चों को पूछा कि तुम एक गाँव में कितने बच्चे हो जो ऑनलाइन पढ़ना चाहते हो तो पता चला कि वे लगभग 12 से 15 बच्चे हैं। फिर पता चला कि उनमें से ज्यादात्तर के माँ बाप के पास सेकंड हैण्ड एंड्राइड फोन भी हैं। मैंने सभी से उनके अकाउंट नम्बर भेजने को कहा और सभी के खाते में हजार दो हजार या तीन हजार रूपये भेजे। किसी के घर में राशन खत्म था तो उसे तीन हजार, किसी के घर में कोई और बात थी तो उन्हें इच्छानुकुल हजार या दो हजार भेजे व यहीं से सबके फोन रिचार्ज किये! फिर संगीता कोठियाल फरासी शंकित भाव में बोली- सर, आपसे गुजारिश है कि यह बात नहीं लिखना वरना लोग इस पर मेरा मजाक बनायेंगे। खैर मैंने कहा- आप निश्चित रहिये। (अगर इसी बात को नहीं लिखूंगा तो आगे और प्रेरणास्रोत कैसे बनेंगे)! फिर मैडम बोली- अब नित उन्हें मैं ऑनलाइन जोडती हूँ और वे सभी उतनी ही लगन और मेहनत के साथ पढ़ रहे हैं जितना श्रीनगर में पढ़ते थे। और तो और उनकी देखा-देखी उनके समाज के और भी बच्चे उनके साथ जुड़ रहे हैं। संगीता कोठियाल फरासी हंसती हुई बोली- सर, ब्यस्तता के कारण अगर किसी दिन मैं उन्हें अटेंड नहीं कर पाती तो वे शिकायती लहजे में अपनी शिकायत दर्ज करते हुए कहते हैं कि मैम…आज आपने हमारा काम चेक नहीं किया!
यह एक शिक्षिका का वह छोटा सा प्रयास है जिसमें वह समाज के उस अंग को मुख्यधारा से जोड़ने का काम कर रही हैं, लेकिन इसके फ्लैशबैक स्टोरी का चेहरा जरा अलग है! संगीता कोठियाल फरासी बताती हैं कि वह जब शुरूआती दौर में इन बच्चों को पढ़ाने की बात करने लगी तो इनके माँ बाप सीधे मुंह बात करने की जगह उल्टा बोलते थे-“ओ मास्टरनी, अपने स्कूल के बच्चों को पढ़ा ले, वही बहुत है! हमारे को व हमारे बच्चों को तू रहने ही दे! अरे बमुश्किल वे कूड़ा बीनकर हमारे घर की दाल रोटी चलवाने में हमारी मदद कर रहे हैं, तू है कि उन्हें उल्टी सीख देने आई!” चल यहाँ से.. …!मास्टरनी अपने मोहल्ले स्कूल की बनियो!”
मेरे लिखे शब्दों में व संगीता मैडम के कहे शब्दों में अंतर हो सकता है लेकिन कुछ ऐसे ही बोल सुनने के बाद फिर सुनना पड़ता था कि तू फिर आ गयी! यह ऐसे मोहल्ले हैं जहाँ दिन में भी शराब की बदबू आपको झोपड़ियों से उठती दिखाई देगी। संगीता मैडम बोली- मैंने भी हार नहीं मानी क्योंकि मैंने तो बचपन से ही तय कर रखा था कि मैं बड़ी होकर अध्यापिका बनूँगी व गरीबों को पढ़ाऊँगी। बस फिर क्या था मैंने इन कूड़े के ढेरों में थैला लादे बच्चों को, चोराहे पर हाथ पसारते पैंसे मांगते बच्चों को टॉफ़ी चाकलेट देकर उन्हें अपने पक्ष में करना शुरू किया और फिर उनके माँ बापों के घर में घुसपैठ शुरू की। उनके घरों में राशन पानी पहुंचाना शुरू किया तो उन्हें भी लगने लगा कि शायद उनके बच्चे पढ़ लिख जायेंगे तो वे भी कहीं नौकरी लग सकेंगे। मैंने उनके ख़्वाबों में, ख्यालों में सपने बोने जो शुरू कर दिए थे। ठीक एक अध्यापिका की तरह…! वह सपने जो हम आये दिन हर नौनिहाल की आँखों में जगाते हैं। हम उन्हें राह दिखाने का काम करते हैं और बताते हैं कि जिस दिन वे पढ़ लिखकर कुछ बन जायेंगे उस दिन उनके घर परिवार के अलावा समाज व मुझे भी उतनी ही ख़ुशी होगी। फिर संगीता मैडम बोलती हैं- मैं अपने बच्चों में आदर्श शिक्षक वाले बीज बोती हूँ ताकि जब ये बीज अंकुर बनकर पनपे तो सिर्फ अपना व अपने परिवार का ही न सोचें बल्कि उनकी सोच में विस्तारवाद हो और वह उस समाज के हर तबके के प्रति समान दृष्टिकोण रखे जिसे वास्तव में उनकी सख्त आवश्यकता है।
संगीता कोठियाल फरासी की यह मुहीम यहीं शांत नहीं हुई। क्योंकि वह प्रदेश के वन मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत के गाँव गहड़ विकास खंड खिर्सू में सरकारी स्कूल में अध्यापिका हैं इसलिए व्यस्तता के चलते उन्होंने दो अध्यापक उन्हें पढ़ाने के लिए रखे हुए हैं जिन्हें वह वेतन देती हैं। यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि पहाड़ों के सरकारी स्कूल छात्र शून्य हो रहे हैं और संगीता कोठियाल फरासी के स्कूल में श्रीनगर बाजार से भी बच्चे उनके साथ पढने जाते हैं। उनके स्कूल की साज-सज्जा हो या फिर रख-रखाव व पठन-पाठन का स्तर..! इस संदर्भ में पूरा शिक्षा विभाग उनकी प्रशंसा करता है।
शिक्षक, शिक्षा, समाज व विद्यार्थी को जोडती संगीता कोठियाल फरासी अभी यहीं नहीं रुकी यहीं नहीं थकी बल्कि उनके मनो-मस्तिष्क में पहाड़ की वह बेटियाँ भी शामिल हैं जो अभावों का जीवन जीकर न पढ़ पाती हैं न ही भविष्य के सपने देख पाती हैं। संगीता मैडम ने ऐसी ही एक अभावग्रस्त लड़की को अपनी बेटी बनाकर पाला, पढ़ाया लिखाया व उसकी धूमधाम से शादी भी की। भले ही संगीता मैडम की एक पुत्री व एक पुत्र हैं। पति बीआरओ में इंजीनियरिंग ट्रेड में हैं। फिर भी वह बेटी जब भी चाहे मायके के रूप में संगीता मैडम के घर आ धमकती हैं व संगीता मैडम व उनके परिवार से उन्हें व उनकी ससुराल पक्ष को वही आतिथ्य मिलता है जो एक बेटी को उसके मायके में मिलना चाहिये।
अब यह सब हम सब उन लोगों के मुंह को बंद करने जैसा नहीं तो और क्या है जो कहते हैं कि अध्यापक बेहद कंजूस होते हैं और उनका फ़ॉर्मूला होता है – “चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए”। हाँ इतना जरुर हुआ कि संगीता मैडम उन सवालों से बचती रही जिन सवालों के दायरे में उनका विभाग व आम शिक्षक व वर्तमान शिक्षा पद्धति आती है। उनका कहना था कि कोई भी शिक्षक या शिक्षा तभी तक सम्मानीय दृष्टि रखती है, जब तक उसका बाजारीकरण नहीं होता। उन्हें इस बात से बहुत पीड़ा है कि शिक्षा की बड़ी बड़ी दुकानों ने जो बाजारीकरण शुरू किया है उसमें सबसे बड़ा सवालिया निशान अगर किसी पर लगा है तो वह शिक्षक ही है, क्योंकि इस बाजारीकरण में शिक्षक के प्रति आम समाज का दृष्टिकोण बदला है। समाज शिक्षा के चमचमाते उन हब्स को नहीं देखता जहाँ बनिया बैठकर तराजू और तिजोरी देखता है बल्कि वह शिक्षक को ही इसका मूल कारण मानता है क्योंकि अब शिक्षा का मतलब धन दौलत से अर्जित ज्ञान ज्यादा हो गया है। वह कहती हैं हम सबने शिक्षक व शिक्षा को बीच चौराहे पर ला खड़ा कर दिया है और साथ में हम सभी शिक्षक भी उसमें बराबरी की भागीदारी निभा रहे हैं। हमें मैकाले की शिक्षा पद्धति उतनी ही अपनानी चाहिए जितनी उसकी आवश्यकता है वरना भारतीय शिक्षा पद्धति का विश्व स्तर में कहीं तोड़ नहीं है। हमें अगर अपनी भारतीय शिक्षा पद्धति अपनानी है तो उसकी जड़ खोदने की जगह उसे खाद पानी देने की आवश्यकता ज्यादा है।
बहरहाल “हिमालयन डिस्कवर” से बात करते हुए वह इस बात से ब्यथित जरुर नजर आई कि कुछ कारणों से सरकारी शिक्षा व शिक्षक का स्तर घटा है, क्योंकि इसकी गुणवता में कहीं न कहीं कमी जरुर आई है जिससे शिक्षा का ह्रास हुआ है! संगीता कोठियाल फरासी को शिक्षक दिवस पर शिक्षक, शिक्षा व समाज को जोड़ने व दबे कुचले मजलूमों को आखर ज्ञान देने के लिए किये गए प्रयासों के लिए सलूट।



