Saturday, March 21, 2026
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फीस मामले में प्राइवेट स्कूलों को फिर बैरंग लौटाया हाईकोर्ट ने! फाइनल पिटीशन नत्थी कर दिखाया आइना!

(मनोज इष्टवाल)

सच कहूँ तो यह सब एक ब्यक्ति की जिद व दृढ संकल्पता के कारण ही सम्भव हो सका! जब उन्होंने मई माह में पीआईएल दाखिल की थी तब प्रदेश भाजपा संगठन ने न सिर्फ उनको आँखें तरेरी बल्कि उन्हें ऐसा करने के लिए कारण बताओ नोटिस तक जारी कर दिया! मामला 26 लाख से अधिक छात्रों व उनके परिवारों का था इसलिए संगठन की मजबूरी हो गयी कि वे खुलेआम कुंवर जपेंद्र सिंह को दिए कारण बताओ नोटिस पर कोई कार्यवाही नहीं कर पाए! क्योंकि इस से पार्टी की साख गिरने का खतरा था!

12 मई 2020 को कुंवर जपेंद्र सिंह की पीआईएल की सुनवाई से पहले पूरे प्रदेश के प्राइवेट स्कूलों के सिंडिकेट ने वकीलों की एक बड़ी फ़ौज हाईकोर्ट पर खड़ी कर दी लेकिन मुख्य न्यायाधीश एक पल भी डिगे नहीं व उन्होंने जनहित याचिका पर जनहित में सुनवाई देते हुए कहा कि कोइ भी तीन माह की फीस वसूल नहीं कर सकता क्योंकि जब विद्यालय ही नहीं खुले हैं तो फीस किस बात की! 

हाईकोर्ट से शिकस्त खाने के बाद प्रदेश के निजी विद्यालय संगठनों ने कुंवर जपेंद्र सिंह को मजा चखाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी सुप्रीम कोर्ट के नामी वकीलों की फ़ौज भेज कर अपने पक्ष में सुनवाई के लिए खडे किये लेकिन यहाँ भी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला जनहित में सुनवाते हुए हाईकोर्ट के फैसले को यथावत रखने के निर्देश दिए!

थक हार कर इन स्कूलों ने फीस वसूली के लिए एक माध्यम ऑनलाइन पढ़ाई का ढूंढा जिसमें उनके द्वारा छात्र-छात्राओं को घर का काम दिया जाने लगा और इसी बीच ये लोग सरकार को अपने पक्ष में करने में कामयाब हो गए! शिक्षा विभाग द्वारा सचिव मिनाक्षी सुन्दरम के हस्ताक्षरयुक्त एक शासनादेश को 22 जून को जारी किया गया जिसमें हाईकोर्ट द्वारा दिए गए पूर्व निर्णयों में से किसी एक का संज्ञान लिए बिना ही शासनादेश जारी करते हुए फिर से प्राइवेट स्कूलों के पाले में गेंद सरका दी ताकि वे जब तक दूसरी पीआईएल इसके विरुद्ध हाई कोर्ट में दर्ज की जाती है तब तक अभिवाहकों से आनन-फानन फीस वसूल कर लें! लेकिन भला कुंवर जपेंद्र सिंह कहाँ घुटने टेकने वाले थे, उन्होंने शासना देश के विरुद्ध फिर कोर्ट में जनहित याचिका डालते हुए कोर्ट के ध्यान में लाया कि सरकार द्वारा हाईकोर्ट के पुराने आदेशों की अवहेलना करते हुए शासनादेश लाया गया है! 

विगत शुक्रवार 3 जुलाई 2020 को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन तथा न्यायमूर्ति आरसी खुल्वे की खंडपीठ ने कुंवर जपेंद्र सिंह की जनहित याचिका का संज्ञान लिया जिसमें कहा गया था कि उत्तराखंड के प्राइवेट स्कूलों द्वारा ऑनलाइन क्लासेस के नाम पर जबरन फीस की डिमांड की जा रही है, साथ ही जबरन ऑनलाइन पढ़ाई करवाई जा रही है! जिससे बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है व छोटी कक्षा के छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाई समझ में नहीं आ रही है! 

कुंवर जपेंद्र सिंह द्वारा अपनी जनहित याचिका में कहा गया है कि उत्तराखंड में कई जगह इन्टरनेट सुविधा नहीं है और नहीं कई अभिवाहकों के पास एंड्राइड फोन या अन्य माध्यम  ही हैं! जिससे कारण अनेकों बच्चे पढ़ाई से बंचित हैं! लिहाजा दूरदर्शन के माध्यम से बच्चों की पढ़ाई करवाई जाय!

हाईकोर्ट ने अपना निर्णय देते हुए सख्त निर्देश देते हुए कहा है कि जिन छात्रों ने ऑनलाइन पढ़ाई की है व पढ़ाई उनकी समझ आ गयी है, उनके अभिवाहक चाहें तो फीस दे सकते हैं! जिनकी समझ में पढ़ाई नहीं आई या फिर वे इस महामारी के दौर में फीस देने की स्थिति में नहीं हैं, ऐसे अभिवाहकों से जोर-जबरदस्ती फीस न अभी वसूली जा सकती है न बाद में! हाई कोर्ट ने अपने निर्णय देते हुए इस समस्त केस को यहीं समाप्त करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब इस मामले में प्राइवेट स्कूल दुबारा कोर्ट में पिटीशन नहीं दाखिल कर पायेंगे! जिससे स्पष्ट हो गया है कि अब न सरकार ही इस मामले में नया शासनादेश ला सकती है और न ही  प्राइवेट स्कूल्स इस मामले में अभी सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में अभी कुंवर जपेंद्र सिंह ने अपना पक्ष नहीं रखा है! 

प्रिंसिपल प्रोग्रेसिव स्कूल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रेम कश्यप ने कहा है कि “हाई कोर्ट के नियमों का पालन किया जा रहा है! अभिवाहकों को किसी निजी स्कूल में नियमों का उल्लंघन लगता है तो वे शिक्षा विभाग में शिकायत कर सकते हैं! निजी स्कूलों में फीस देने से असमर्थक अभिवाहकों को फिलहाल जायज कारण पर उनसे फीस ना लेना तय किया गया है! अभिवाहकों को प्रिंसिपल को लिखित में फीस ना देने का कारण बताना होगा!”

वहीँ कुंवर जपेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया है कि “कोई भी अध्यापक जो फीस भरने में असमर्थ है वह फीस न दे और न ही उनसे यह फीस बाद में वसूली जा सकती है! जिन बच्चों ने ऑनलाइन पढ़ाई की है व वे इस पढ़ाई से संतुष्ट हैं सिर्फ उन्हीं के अभिवाहक फीस भर सकते हैं! उन्होंने कहा है कि कोई भी अभिवाहक इस बाद से बिलकुल न हडबडाये कि अगर वे फीस नहीं दे पायेंगे तो उनके बच्चे का नाम काट दिया जाएगा या उसे मेंटली ह्रास या शारीरिक टॉर्चर किया जाएगा! अगर ऐसा होता है तो कोर्ट के आदेश के अनुसार उस संस्थान पर सख्त कार्यवाही हो सकती है! “

उन्होंने अभिवाहकों से अपील की है कि वे संगठित होकर हर गलत नीति का विरोध करें! अपने लिए न सही बच्चो के भविष्य के लिए उनके ब्यथा समझे व किसी भी हाल में प्राइवेट स्कूलों की गलत नीति का समर्थन न करें!

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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