(मनोज इष्टवाल)
यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि आजादी के बाद भी जनपद पौड़ी के पौड़ी शहर से मात्र 3 से 5 किमी दूरी पर बसे गडोली टी स्टेट की हरी चाय इंग्लैंड निर्यात होती थी। यह चाय दार्जिलिंग या कौसानी की चाय जैसी ही उन्नत बताई जाती है और इसका रेट 30 हजार रुपए किलो आंका जाता रहा है। चाय का नाम था गोल्डन पीकॉक।
उत्तराखंड चाय बोर्ड को लंदन, यूरोप, अमेरिका का ख्याल रहता है। उन्हें जितनी चाय चाहिए उतनी पैदावार यह लोग चाय बोर्ड की इज्ज़त बचाने के लिये करते हैं उससे अधिक मात्रा में नहीं। हालांकि लंदन , यूरोप, अमेरिका इस तरह की चाय पर दार्जिलिंग के भरोसे है। लेकिन उत्तराखंड चाय की लंदन में इंट्री है।
1835 में जब अंग्रेजों ने कोलकाता से चाय के 2000 पौधों की खेप उत्तराखंड भेजी तो उन्हें भी यकीन नहीं रहा होगा कि धीरे-धीरे बड़े क्षेत्र में विस्तार ले लेगी । सन 1838 में पहली दरमियान जब यहां उत्पादित चाय कोलकाता भेजी गई तो कोलकाता चैंबर्स आफ कॉमर्स ने इसे हर मानकों पर खरा पाया। धीरे-धीरे अल्मोड़ा, पौड़ी, देहरादून समेत अनेक स्थानों पर चाय की खेती होने लगी। आजादी से पहले तक यहां चाय की खेती का रकबा करीब 11 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया।
आइये उत्तराखंड के चाय बागान व चाय उत्पादन पर हम एक दूसरे का ज्ञानवर्द्धन कर दें। बर्ष 1827 में ईस्ट इंडिया कम्पनी के डॉ रॉयले ने लॉर्ड एमहर्स्ट को सलाह दी कि कुमाऊँ मण्डल की पहाड़ियों पर उन्नत किस्म की चाय का उत्पादन हो सकता है। इसका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक “इलेस्ट्रेशंस ऑफ हिमालयन बॉटनी” में किया है। डॉ रॉयले की सलाह पर लॉर्ड एमहर्स्ट ने सर जोसेफ बैंक्स, डॉ गोबन, डॉ बैलिच और डॉ फॉलकोनेर को इस पर अमल करने को कहा। सन 1834 में लॉर्ड डब्लू बैंटिक ने डॉ. बैलिच की अध्यक्षता में समिति गठित की।
सन 1835 में चीन से चाय का बीज मंगवाकर कोलकत्ता में उसकी नर्सरी विकसित की गई व पौध तैयार कर उसे असम व गढ़वाल, कुमाऊँ भेजा गया। गढ़वाल-कुमाऊं व सहारनपुर में वनस्पति वैज्ञानिक डॉ फॉलकोनेर ने पौधालय विकसित किये। 1841 में गढ़वाल कुमाऊं में चाय की संभावनाएं देखते हुते 1842 में चाय निर्माता गढ़वाल व कुमाऊं पहुंचे। लेकिन इसी दौरान डॉ फॉलकोनेर का स्वास्थ्य खराब हुआ और उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। बर्ष 1843 में पानी के जहाज से जब डॉ फॉलकोनेर इंग्लैंड पहुंचे तो वे अपने साथ कुमाऊं के कौसानी के बागों की चाय का नमूना अपने साथ लेकर गए थे जिसकी इंग्लैंड में जमकर प्रशंसा हुई।
डॉ फॉलकोनेर के स्थान पर वनस्पति वैज्ञानिक डॉ जैमसन ने अल्मोड़ा में चार्ज सम्भाला। उन्होंने 1835 की चीन से मंगाई चाय का सैम्पल चीन भेजा तो चीनियों को इस चाय में कम गुणवता दिखाई दी।
ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा गढ़वाल कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर मिस्टर आर. फॉर्च्यून को सन 1848 में चाय की उन्नत किस्म विकसित करने के लिए चीन भ्रमण पर भेजा, जहां से वे गढ़वाल की भौगोलिकता के आधार पर 20 हजार काली व हरी चाय की पौध अपने साथ लाये। उनके साथ कुछ चीनी व्यवसायी बागान मालिक भी गढ़वाल-कुमाऊं आये। जिनमें 6 प्रथम श्रेणी चाय उत्पादक, दो कामगार प्रमुख मुख्य थे।
1851 में तीन चीनी व्यवसाइयों व एक स्थानीय व्यक्ति द्वारा पौड़ी के नजदीक करीब 3000 एकड़ से अधिक जमीन पर चाय के बागीचे लगाए। जहां ज्यादात्तर उन्नत किस्म की हरी चाय का कारखाना भी विकसित किया गया जिसमें गडोली क्षेत्र के स्थानीय मजदूरों ने काम किया व गडोली के चाय कारखाने की हरी चाय इतनी उन्नत निकली की उसकी मांग इंग्लैंड व यूरोपीय कई देशों में होने लगी। उत्साहित ब्रिटिश सरकार ने पौड़ी गढ़वाल के लोहाबा व एक स्थानीय व्यापारी ने सिलकोट में चाय की फैक्टरी खोली। डॉ. जैम्सन के अनुसार गढ़वालियों की अकर्मण्यता व उदासीनता से सारी मेहनत पर पानी फिर गया और जल्दी ही ये दोनों फैक्ट्री बन्द करनी पड़ी। गडोली पौड़ी के चौफीन बन्धुओं ने गडोली बागान खूब विकसित किया व उन्होंने से ब्रिटिश सरकार को लाभ भी पहुंचाया। डॉ फॉलकोनेर की पुस्तक में संस्मरण हों या फिर डॉक्टर जैम्सन के ब्रिटिश सरकार को भेजे लेख, दोनों ने ही गडोली चाय बागान में तीन चीनी व्यवसायियों के प्रयास की सराहना की। प्रश्न यहाँ भी यही सामने आकर खड़ा हो जाता है कि क्या चौफीन बन्धु ही वे चीनी व्यवसाइयों के वंशज हैं या फिर ब्रिटिश काल में कन्वर्टेड ईसाई।
(चोपड़ा स्थित सन 1840 टी स्टेट के मैनेजर का आवास)
सुप्रसिद्ध सोशलिस्ट उदित घिल्डियाल जो कोरोना काल में लगातार पौड़ी गढ़वाल के विभिन्न गांवों का भ्रमण कर शहरों से गांव लौट रहे युवाओं के बीज कृषि सम्बन्धी जागरूकता पैदा कर युवाओं को प्रशिक्षण भी उपलब्ध करवा रहे हैं बताते हैं कि आज भी ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा बनाए गए प्रबन्धक आवास सन 1840 के लेकर अभी तक ज्यों के त्यों जिंदा हैं व उनमें लोग रह रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि इनकी 180 बर्ष बाद भी जीरो मेंटिनेंस की गई है। उनका मानना है कि चौफीन कन्वर्टेड क्रिश्चियन नहीं बल्कि चीन से पहले अल्मोड़ा कौसानी और बाद में पौड़ी गडोली आये चाय बागान एक्सपर्ट व्यवसायी असिवोंग के वंशज हैं। जिनका नाम अपभ्रंश होकर चौफ़ीन हो गया क्योंकि गढ़वाली जनमानस उसका सही उच्चारण नहीं कर पाए। असिवोंग को लोग असिफोंग व उनके पुत्र चाउवोंग चौफोंग बोलते थे यही चौफोंग कब चौफ़ीन हुए इसका अपभ्रंश काल उन्हें भी नहीं पता। लेकिन इतना जरूर है कि इन लोगों ने हिंदुस्तान आते ही क्रिश्चियन धर्म अपना लिया था।
(कृषि बागवानी कार्य में ब्यस्त अनिल राज चौफीन व टमाटरों के उत्पादन के साथ उदित घिल्डियाल)
उदित बताते हैं कि उन्ही के वंशजों में एक अनिल राज चौफ़ीन हैं जो बैंक ऑफ बड़ौदा मुम्बई से बेहद सीनियर पद से सेवानिवृत्त होकर मुंबई या महानगरों में बसने की जगह सीधे अपने गडोली आ बसे। जिसका सीधा सा अर्थ हुआ कि उन्होंने कभी पलायन नहीं किया। उन्होंने जानकारी देते हुए बताया है कि ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कम्पनी का अधिगृहण कर लिया था और बाद में वापस लौटते समय ब्रिटिश सरकार गडोली चाय बागान की करीब 4000 एकड़ जमीन चौफीन बन्धुओं को ही बेच गयी।
इसके बाद पौड़ी जिले के आमास्टेट ग्वालदम में बड़ा चाय बागान विकसित हुआ जबकि मुसेटी, बेनीताल और सिलकोट में छोटे चाय बागान। वहीं कुमाऊं मंडल के कौसानी व मल्ला कत्यूर में भी चाय के बड़े बागान विकसित हुयर जिनकी 1897 में उत्पादन क्षमता 69000 पौंड माफी गयी जो बर्ष 1907 तक घटकर 52000 पौंड हो गयी थी।
वरिष्ठ पत्रकार शीशपाल गुसाईं बताते हैं कि आजादी के बाद वर्ष 1960 के दशक तक उत्पादन में जरूर कमी आई, लेकिन यहां की चाय देश-विदेश में महक बिखेरती रही। वक्त ने करवट बदली और तमाम कारणों से चाय की खेती सिमटने के साथ ही सिमटते चले गए चाय बागान और उत्पादन भी नाममात्र को रह गया। अविभाजित उत्तर प्रदेश में 1990 के दशक में थोड़े प्रयास हुए तो रसातल में पहुंची चाय की खेती थोड़ी आगे बढ़ी। आज भी चाय राज्य में पैदा वार कर रहा है। लेकिन सीमित जगह में। चाय की 9 हजार हेक्टेयर और खेती महज 1141 हेक्टेयर में।
गुजरे 20 सालों में शेष 7859 हेक्टेयर भूमि को भी चाय बागानों के रूप में विकसित करने की दिशा में पहल होती तो आज सात लाख किलो से अधिक चाय का उत्पादन मिलता।
राज्य में 2002-03 में चाय विकास बोर्ड का गठन होने पर प्रयास हुए, लेकिन अभी तक आठ जिलों अल्मोड़ा, बागेश्वर, नैनीताल, चंपावत, पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग और पौड़ी में करीब 11 सौ हेक्टेयर क्षेत्र में ही सरकारी स्तर पर चाय की खेती हो रही है। जिसमें उत्पादन करीब 80 हजार किलोग्राम मिल रहा है



