(मनोज इष्टवाल कहानी संस्मरण 5 अक्टूबर 2019)
चौडू मुख गोरी पुसरी..। दमदार आवाज़ अर मयलु व गळद्यवा गिच्ची। गौं कु सबसे मथ्यो कूडू..! रंगत्या मिजाज की खूब हट्टी-कट्ठी व मंगला बोडी।
ज्वा मुंगरा लगुला बूती त ग्या पर खाण से पैली सुरुग सिधारी ग्याया। जिकुड़ी म इनि क्वांसी लग कि क्य बुन तब। मुंगरा मुंगरेड ही सुखी ज्ञेनी पर मजाल क्याच जु स्याळ भी धधौढ़ी साकु ऊँ मुंगरौ थैंन किलैकि ऊ भी जणदिन कि यूँ सगोड्यूँ, मुंगरेडों की जग्वल्या ज्व बुढड़ी च व अगर द्याखली त हमरी शामत नीच।
सगवड़ी का किन्नर पर कंदलौकु डाळऊ अर व्हेका बगल म स्यामसुंदरी…! अहा क्य मजादार भुज्जी बणदि छई वांकी। चौका तीर जखम भांडा मंज्यांदि छाई व्हे छौंदणकी चिफली फटाली का बगल मा माल्टा अर लिम्बा की डाळी की वा पिंगलात अहा दिखदै जु तर्र दांतुं का जाड़ भट्टी पाणी छुट्टी जा। पर मजाल क्याच जु क्वी बिना पूछयां ऊँ फर्र नजर भी उठै साको।
पर मंगला बोडी..धर्म की इनि दानी छई कि अगर मांगी याल त अपणु जिकुडु भी निकालिकि दे द्यो। चा रखिड़ी कु त्यूहार हो या फिर श्राद्ध पक्ष या इगास बग्वाल। हम बमणुकु आदर सत्कार का वास्ता मंगला बोडी का घार की पुडकी नि पौंछि हो इन कभी नि व्हे।
1980 की बात च। तब गौं म जतका मौ ततका ज्वान नौना। तब मी सैद सात आठ म पढ़दु रै होलो। म्यारा भैजी हरी (हरीश), मदन , जैकृत, अर्जुन वगैरह झणी क्य काम छयो तब मंगला बोडी का घारम बैठयां छाया। सैद अगरोडा की रामलीला देखण की चर्चा म बाडयूं की नारंगी चूरनैकि बात छई होणी। बोडी भैर आई अर सभ्यूंकु खिज्येकी बुन बैठ। हमरु इतनु बडू गौं अर धिक्कार हमकु कि अब भी हम अगरोडा जंदवा रामडिला दुखुणुकु। कन….तुम स्यु छवा तत्तरा लम्बा चौड़ा ढाँठ पुड़याँ माचद। कन… तुम यख नि कै सकदा रामडिला..!
क्यांकि कमी च तुममा स्यु छवा बांका बिगरैला! बोडी की बात सूणीकि सब चुप व्हे ज्ञेनी पर हरी भैजी जरा तुनक मिजाज छा यो। धम्म चिरढै ग्याया। व्हेन बोली – तू त इन बुनि छई बुलिंद हम्मी कमाणा छवां लाखों। इनि व्हे जांद रामलीला।
बोडी थैंकी भी ऐ गुस्सा। व्हीन भी बोली- द ल्वाला धूळी! वीं मथरा दीदी की नारंगी चुरणुकु त अपडा बुबौकु बरंडी कोट छई ढूंढणु। कन मिलाक लगावदि गौं म। अब मदन भैजीन बोली- अरे कैल कन हम पर विश्वास? बोडी सड़म ग़ा भित्तर अर ग़ाळम टँगी चाबिन खोली बक्सा। सडक निकाळी द्वी रुपया कु करकुरु नोट अर ब्वाळ -ल्या पैलु कूडू म्यारु च गौं म इखी भट्टी शुरात कारा। पर खबरदार जु गौं का बुढया पंच पर्वाणु म बुल्यां। यूँ बुढयोंन बणदु काम भी बिगाड़ी दींण। हां मास्टरम बुल्यां..! गिरि (गिरीश) सबसे पढयूँ लिख्यूँ आदिम च। वू अर प्रवीण द्वी का द्वी चाला त काम व्हे जाण।
बस व्हे दिन ही मिलाक शुरू व्हे अर गौं म “रूप बसन्त” नाटक गिरीश भैजी का निर्देशन म शुरू ह्वे। जैका पात्र म कुछ खास रूप बसन्त, चित्रमुकुट राजा, सूत्रधार व बुद्धिमत्ती रानी का पात्र म प्रवीण भैजी, रामचन्द्र भैजी, हरीश भैजी, मदन भैजी, अर्जुन भैजी, लखपत भैजी अर जैकृत जना कलाकार व्हेनी।
धरकोट गौंका ये नाटक की चर्चा इतगा व्हेकी लोग रस्ता आन्द जांद भी व्ही डायलॉग याद करदा छाया।
हम स्कूल जांदी दां सूत्रधार का डायलॉग बुलदा छाया:-
सूत्रधार ने जगत के, अहा मेल बेमेल। दुनिया के रंगमंच पर रचे अनेकों खेल।
एका बाद द्वी साल तक और यू नाटक व्हे अर तब जगदीश भैजी दिल्ली का चावड़ी बाजार भट्टी रामलीला कु सामान लै।
अहा…बिचारि मंगला बोडी। आज हीरू दीदी सैसुर च। अर वीन्का दयुरौकु नौनु जै थैंन बोडी अपडु ही मनद आनन्द भैजी अर उंकी भुलि लीला दीदी भी अपणी नौकरी अर सैसुर छन।
बिचारि मंगला बोडी की सगवड़ी आज भी मुंगरी, कखडी, छीमी, कक्वडा अर बसगळया भुज्यूँन झक्क बणीन पर खंदरु क्वी नीचा। मुंगरेडों मुंगरा सुखी ज्ञेनी पर कु खालू..कु सम्भाळलू…! छि: यार । लोलु पराण भारी गासी लगैग्ये।।
(समाप्त)

