Wednesday, March 11, 2026
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देवीधुरा मेले में युद्ध के दौरान 122 लोग घायल। मानव बलियों के इतिहास को संजोकर आगे बढ़ी माँ देवी बाराही मुखाग्नि क्या अब सिर्फ नारियल बलि से शांत हो पाएगी…? यक्ष प्रश्न..!

(मनोज इष्टवाल 29 अगस्त 2015)

देहरादून से लम्बी यात्रा के उपरांत कल यानि 28 अगस्त को कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की छात्रा अनीता के गांव पहुंचा हूँ। यहां फिजाओं में हल्की ठंडक जरूर है लेकिन उत्साह अप्रितम। इनका तोक लमगड़िया है जिनका इतिहास शौर्यपूर्ण माना जाता है व साथ ही दागदार इसलिए कि अपने बल के आधार पर इन्होंने देवीधुरा बग्वाली मेले में कई लाशें बिछा दी थी। जिससे देवी माँ लमगड़ियों पर कुपित रही। कल से ही जश्न की तैयारी में जुटा अनिता का परिवार उत्साह से लवरेज था। उनके पिता ने अपनी ढाल रूपी छंतोली तैयार की व हम चल पड़े माँ बाराही के दर्शन को। लेख को विस्तार बाद में दूंगा फिलहाल आंखों देखा हाल सुनाए देता हूँ।

1-2 युद्ध भूमि में चार खाम के रणबांकुरे। 3- घायलों के इलाज के लिए तैयार डॉक्टरी टीम।

रक्षाबन्धन के दिन देवीधुरा में माँ बाराही के मंदिर प्रांगण में खेली जाने वाली ऐतिहासिक बग्वाल समाप्त हो गई। परंपरानुसार चार खामों में 7 तोकों के बीच ये बग्वाल खेली गई। प्राचीन युद्ध को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग देवीधुरा पहुंचे। फल-फूल से बग्वाल खेलने के बावजूद 122 से ज्यादा रणबांकुरे इस युद्ध में घायल भी हुए। ये चारों दल दो समूहों में बंट जाते हैं और इसके बाद युद्ध होता है.पहले इस युद्ध में दोनों ओर से पत्थर फेंके जाते थे। दरअसल पहले मां बाराही को नरबलि दी जाती थी। उसके विकल्प के रूप में चारों कामों ने आपसी सहमति से यह बग्वाल की परंपरा शुरु की थी। इसमें जब किसी इंसान की बलि जितना रक्त निकल जाता था, उसके बाद इस युद्ध को रोक दिया जाता था। बाद में पत्थरों से होने वाले भारी नुक़्सान को देखते हुए पत्थरों की जगह फलों और फूलों से बग्वाल खेली जाने लगी।

परंपरागत रूप से ये खाम हैं- चम्याल खाम, बालिक खाम, लमगडिया खाम और गहरवाल होते हैं। ये चारों दल दो समूहों में बंट जाते हैं और इसके बाद युद्ध होता है। लमगडियों में न होंन ज्वान,

क्वीरा में न होंन बांद,

धुलई में न हूँन धान…!

जब सत की बात आती है तो उत्तराखंड देवभूमि में ऐसे ही कई मुहावरे आपको सुनने को मिल जायेंगे जो अकाट्य सत्य हैं। कुमाउनी में प्रचलित इस कहावत की तह तक पहुँचने के लिए मुझे पूरे दो बर्ष इन्तजार करना पड़ा। लमगड़ियों में न होंन जवांन यानि लमगड़ियों में कोई जवान न हो उसके पीछे की जो कहानी प्रचलित है वह यह है कि इन्हें माँ बाराही (पाषाण देवी) देवीधुरा ने श्राप दिया था जिसके फलस्वरूप आज भी लमगडिया खाम के जिस किसी को भी अपनी ताकत पर अपनी जवानी पर गुरुर होने लगता है वह जीवित नहीं बचता। कहते हैं कि चार खामों में बंटे देवीधुरा के माँ बाराही के भक्त पाषाण युद्ध कर एक मानव बलि के बराबर खूब अर्पित करते हैं। मानव बलि से प्रसन्न होने वाली माँ बाराही बली न ले इसके लिए इसके उपासकों ने नया तरीका इजाद किया और यहाँ देवीधुरा में चार खामों में बंटकर पाषाण युद्ध (पत्थर युद्ध) से इसका निबटारा किया। कहा जाता है कि लमगडिया जाति के लोग ज्यादा बलशाली थे इसलिए इन्होने बिना माँ बाराही की आज्ञा के मेले में कई निर्दोष लोगों को मार दिया या मरवा दिया। ऐसी किंवदंती लगभग सौ साल पूर्व प्रचलित थी। माँ कुपित हुई और भावर में रोजी रोटी की तलाश में गए लगभग 80 लोगों में हैजा उपजाकर उन्हें मार डाला और जो कोई बचा था उसे कहा जा तेरी हर युद्ध में विजयी होकर लौटेगा। लेकिन जो भी तेरा वंशज अपने बल पर अभिमान करेगा उसके लिए मेरा श्राप है कि वह अपनी जवानी नहीं काट पायेगा। आज भी लमगडिया इस बात को मानते हैं।

क्वीरा में न होंन बांद

यानि क्वीरा गॉव में कोई स्त्री खूबसूरत न हो..! यह श्राप वहां की किसी खूबसूरत बेटी ने अपने वंशजों को इसलिए दिया था कि जिससे उसका प्रेम था उसे सबने मिलकर तडपा-तडपाकर मार डाला था ऐसा लोग कहते हैं और इसी कारण उस बेटी ने आत्मदाह करते हुए सारे गॉव को यह श्राप दे डाला।

धुलई में न हूँन धान…

यानि धुलई गॉव में धान न हों के पीछे यह कहा जाता है कि कोई भिक्षुक इस साधन सम्पन्न गॉव में धान या चावल मांगने आया था लेकिन सबने दुत्कार दिया और उसके श्राप से इस गॉव में आजतक धान की फसल नहीं होती।

क्यों जुटता हैं मेला और क्या हैं लोक मान्यताएं। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पौराणिक काल में चार खामों के लोगों द्बारा अपनी आराध्या बाराही देवी को मनाने के लिए नर बलि देने की प्रथा थी। मा बाराही को प्रसन्न करने के लिए चारों खामों के लोगों में से हर साल एक नर बलि दी जाती थी। बताया जाता है कि एक साल चमियाल खाम की एक वृद्धा परिवार की नर बलि की बारी थी। परिवार में वृद्धा और उसका पौत्र ही जीवित थे। माना जाता है कि महिला ने अपने पौत्र की रक्षा के लिए मा बाराही की स्तुति की। मा बाराही ने वृद्धा को दर्शन दिए। कहा जाता है कि देवी ने वृद्धा को मंदिर परिसर में चार खामों के बीच बग्वाल खेलने के निर्देश दिए। तब से बग्वाल की प्रथा शुरू हुई।  

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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