(मनोज इष्टवाल)
ये तो हम सभी जानते हैं कि पिछले कुछ दशकों से भारतीय राजनीति का स्तर बहुत नीचे गिर गया है लेकिन इतना नीचे गिर जाएगा इसकी उम्मीद करनी मुश्किल है, क्योंकि कोरोना महामारी के दौर में राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे का सहयोग कर आम जन को सहयोग करने की जगह उनकी मजबूरी पर जो राजनीति का रंग चढा रही है वह किसी से छुपा नहीं है।
उत्तराखंड की राजनीति में भी कुछ ऐसा ही आजकल देखने को मिल रहा है। एक प्राइवेट पैथोलॉजी लैब में पूर्व पर्यटन मंत्री अमृता रावत को कोविड-19 की जांच होती है। रिपोर्ट की प्रशासन से पुष्टि तक नहीं होती व न ही वह आरोग्य सेतु से जुड़ पाती है, लेकिन फेसबुक व अन्य माध्यमों से न्यूज़ चैनल्स, सोशल साइट व अखबारों की सुर्खियां बन जाती है। आखिर कैसे पूर्व मंत्री श्रीमती अमृता रावत की कोविड-19 रिपोर्ट नाम सहित पत्रकारों तक या अन्य माध्यमों तक पहुंच जाती है व नाम सार्वजनिक हो जाता है।
प्रश्न यह है कि क्या भारत सरकार की गाइडलाइन्स के अनुसार कोविड -19 के संक्रमित मरीज का नाम सार्वजनिक किए जाने का निर्देश है? मेरे हिसाब से बिल्कुल नहीं बल्कि गाइडलाइन्स के मुताबिक किसी भी कोरोना पॉजिटिव का नाम उजागर नहीं किया जा सकता, अगर किया जाता तो अब तक जितने भी कोरोना पॉजिटिव मामले सामने आए हैं उनके नाम सार्वजनिक होते। किसी भी महामारी के दौर में शायद ये आंकड़े सार्वजनिक नहीं होते है।
(कैबिनेट बैठक में सोशल डिस्टेंसिंग)
बात यहीं पर आई गयी हो जाती तो कोई बात नहीं थी। दूसरे दिन दूसरी रिपोर्ट सार्वजनिक होती है व उसमें पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज उनके परिवार व घर के 22 लोगों की पॉजिटिव रिपोर्ट भी सार्वजनिक की जाती है। और तो और सतपाल महाराज के आवास को क्वारनटाइन करने, उनके अन्यत्र आवासीय कार्यालय शिफ्ट करने की बातें भी मीडिया व अन्य माध्यमों से खूब प्रचारित की जाती हैं।
एक छोटी सी चूक कहिये या राजनीतिक कूटनीति के अनुसार किये गए इस कार्य से जहां विपक्ष को खुलकर बोलने का अवसर मिल गया है वहीं मीडिया में खबर उठती है कि पूरा मन्त्रिमण्डल क्वारटाइन होगा व सचिव स्तर के अधिकारी भी। दूसरी ओर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की धर्मपत्नी व पुत्रों के नाम सहित परिवार के 5 सदस्यों के कोरोना पॉजिटिव होने की बात जोर-शोर से उठती है जबकि नियमों के अनुसार ये नाम सार्वजनिक नहीं होने चाहिए थे।
कई मीडिया घराने विपक्षी नेताओं के वर्जन पर पर्यटन मंत्री पर केस दर्ज करने की मांग तो करते हैं लेकिन सरकारी सिस्टम के लूप होल्स पर चर्चा नहीं करते। अर्थात एक तरफा पत्रकारिता करके वह किसका चरण वंदन करते हैं यह तो नहीं मालूम लेकिन ऐसा करके वह न सिर्फ पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज को राजनीतिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि वर्तमान भाजपा सरकार पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हैं।
सरकार की ओर से भाजपा के प्रदेश प्रमुख प्रवक्ता मुन्ना सिंह चौहान को आखिरकार अपने बयान में कांग्रेस के इस अमानवीय व्यवहार को आड़े हाथों लेना पड़ता है , मुन्ना सिंह चौहान कांग्रेस की नीयत पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कहते हैं कि कांग्रेसी विधायकों द्वारा मुख्यमंत्री राहत कोष में इस महामारी के दौर में एक फूटी कौड़ी तक जमा नहीं की।
अब आते हैं सतपाल महाराज के भ्रमण कार्यक्रम पर फैलाया जा रहा भ्रमजाल पर। आपको बता दें कि सतपाल महाराज व श्रीमती अमृता रावत क्षेत्र भ्रमण से 13-14 मई से पूर्व लौट गई थी व उसके बाद पूर्व पर्यटन मंत्री अमृता रावत बाहर गयी थी जहां से लौटने के बाद वह होम क्वारनटाइन हुई हैं। अब यहां पूरा परिवार कहाँ होम क्वारनटाइन हुआ या फिर सतपाल महाराज पर यह प्रश्न लगाए जा रहे हैं कि वे कैबिनट बैठक में क्यों शामिल हुए? इसका जबाब यह है कि उस दौरान सतपाल महाराज क्या क्वारनटाइन थे? यदि नहीं तो फिर यह बबाल क्यों?
यहां यह बात अचंभित करने वाली है कि एक ऐसी प्राइवेट लैब टेस्टिंग करती है जिसके पास पूरे इक्विपमेंट हैं भी या नहीं इसका भी कोई लेखा जोखा नहीं है, फिर भी उसे ही आधार मानकर उनके पूरे परिवार को कोरोना पॉजिटिव घोषित कर दिया जाता है व एम्स में भर्ती होते ही शाम तक जो रिपोर्ट आती है वह नेगेटिव हो जाती है, तो क्या ऐसे में पूर्व की कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट की विश्वशनीयता पर सवाल नहीं उठते। देर शाम एम्स प्रशासन से खबर आती है कि सतपाल महाराज व उनके परिवार की रिपोर्ट नेगेटिव है व सूत्रों के माध्यम से सोशल न्यूज़ पोर्टल उनके एम्स से डिस्चार्ज होकर होम क्वारनटाइन होने की बात करते हैं लेकिन ऐन डिस्चार्ज के वक्त उन्हें रोक दिया जाता है, आखिर क्यों?
पर्यटन, लघु सिंचाई, धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज के सम्पूर्ण स्टाफ जिसमें उनके ओएसडी निजी सचिव इत्यदि शामिल हैं, सबकी रिपोर्ट नेगेटिव आती है तो फिर विभागीय सचिव व मन्त्रिमण्डल को क्वारनटाइन होने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
पहले स्वास्थ्य सचिव का बयान आता है कि कैबिनेट में पूरी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया गया इसलिए मन्त्रिमण्डल या अधिकारियों को क्वारनटाइन होने की आवश्यकता नहीं लेकिन पुनः दूसरा आदेश जारी हो जाता है कि सभी क्वारनटाइन होंगे। आखिर यह सब क्या चल रहा है।
सतपाल महाराज से सरकार भयभीत है या विपक्ष यह तो कहा नहीं जा सकता लेकिन एक बड़ा झोल बीच में सामने जरूर आ रहा है कि क्या सतपाल महाराज के परिवार के नाम सार्वजनिक करने के पीछे कोई राजनीतिक षड्यंत्र काम कर रहा है।


