Thursday, February 26, 2026
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राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कारों में क्यों हुआ उत्तराखंड शर्मिंदा? सूचना के अधिकार से हुआ खुलासा…।

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कारों में क्यों हुआ उत्तराखंड शर्मिंदा?
सूचना के अधिकार से हुआ खुलासा……!
(मनोज इष्टवाल)
1- राज्य स्तरीय मेरिट सूची (13 जिलों के कुल 39 नामित अभ्यर्थियों की सूची) में क्रमशः 18वें, 22वें एवं 30वें नंबर के अभ्यर्थियों को राष्ट्रीय स्तर के लिए किया गया नामित।
2- स्थलीय सत्यापन समितियों एवं जिला स्तरीय चयन समितियों की पूरी तरह से की गई अनदेखी।
3- अपने चहेतों को एडजस्ट करने के लिए प्रधानाचार्य, माध्यमिक शिक्षक एवं बेसिक शिक्षकों की तीन कैटेगरी बनाई गई।
4- केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देशों का किया गया खुला उल्लंघन।
5- राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों बार राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुके एवं विभिन्न राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल कर चुके शिक्षकों की पूरी तरह से अनदेखी।
6- चयन प्रक्रिया में पूरी तरह से मनमानी। सभी मानकों को किया गया दरकिनार।
7- राज्य को राष्ट्रीय आईसीटी पुरस्कारों में भी भुगतना पड़ा खामियाजा और उठानी पड़ी शर्मिंदगी।

अभी हाल ही में एक आरटीआई से यह खुलासा हुआ है कि उत्तराखंड राज्य से राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2017 हेतु अभ्यर्थी चुने जाने की प्रक्रिया में व्यापक स्तर पर नियमों एवं प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई है। जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक बनाई गई चयन समितियों द्वारा केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मानकों की जबरदस्त अनदेखी की गई है। कई जनपदों में अभ्यर्थियों के कार्य का स्थलीय सत्यापन भी नहीं किया गया। सत्यापन के नाम पर महज खानापूर्ति की गई। जिला स्तर पर अपनाई गई चयन प्रक्रिया में राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य करने वाले शिक्षकों एवं राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार प्राप्त कर चुके शिक्षकों को नजरअंदाज कर ऐसे शिक्षकों को प्राथमिकता दी गई जो अधिकारियों की गुड बुक में थे। चयन समितियों के गठन में भी विशेषज्ञों को न रखकर अपनी सुविधानुसार अधिकारियों को नियुक्त किया गया।
मुख्य शिक्षा अधिकारियों की अध्यक्षता में जिला स्तर पर गठित चयन समितियों द्वारा अपने जिले से 3 शिक्षकों का चयन कर उन्हें राज्य स्तर पर नामित किया जाना था। पिथौरागढ़ एवं नैनीताल जिले से 2-2 प्रधानाध्यापकों, उधम सिंह नगर एवं देहरादून जिले से 3-3 माध्यमिक शिक्षकों का तो पौड़ी, हरिद्वार एवं रुद्रप्रयाग जिले से 3-3 प्राथमिक शिक्षकों का चयन किया गया । इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य स्तरीय चयन समिति द्वारा जिला स्तरीय चयन समितियों को इस संबंध में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए थे कि शिक्षकों का अलग-अलग श्रेणियों में चयन किया जाए। ना ही केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा शिक्षकों को अलग-अलग श्रेणियों में नामित करने के कोई निर्देश दिये गये थे। लेकिन जब राज्य स्तर पर चयन की बात आई तो राज्य स्तरीय चयन समिति द्वारा अपने मनचाहे शिक्षकों को एडजस्ट करने के लिए शिक्षकों की तीन अलग-अलग श्रेणियां बना दी गई पहली श्रेणी में बेसिक शिक्षकों को रखा गया दूसरी श्रेणी में माध्यमिक शिक्षकों को तथा तीसरी श्रेणी में प्रधानाध्यापकों को रख कर तीनों श्रेणियों में एक एक शिक्षक को नामित करने का निर्णय लिया गया। अलग-अलग श्रेणियों निर्धारित करने के बावजूद यह आवश्यक था कि प्रत्येक श्रेणी से मेरिट में सर्वोच्च स्थान वाले शिक्षकों का ही चयन राष्ट्रीय स्तर हेतु किया जाय। किंतु राज्य स्तरीय चयन समिति द्वारा जिलों से नामित शिक्षकों की मेरिट सूची को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। तीनों श्रेणियों में 90 अथवा इससे अधिक अंक प्राप्त करने वाले शिक्षकों को छोड़कर क्रमशः प्रधानाचार्य वर्ग मे 70 अंक, माध्यमिक वर्ग में 63 अंक एवं बेसिक वर्ग में 54 अंक लाने वाले अभ्यर्थियों को चयनित कर लिया गया। इस प्रकार अधिकारियों ने अपने पसंदीदा शिक्षकों को जो कि राज्य स्तरीय मेरिट सूची में क्रमशः 18वें, 22वें एवं 30वें स्थान पर मौजूद थे, उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार हेतु नामित कर दिया। सूचना के अधिकार के अंतर्गत जब चयनित शिक्षकों को राज्य चयन समिति द्वारा दिए गये अंकों की प्रश्नवार जानकारी मांगी गई तो उपनिदेशक विद्यालय शिक्षा द्वारा उक्त सूचना को उपलब्ध ही नहीं कराया गया। इससे स्पष्ट है की चयन समिति द्वारा शिक्षकों के चयन में बड़े पैमाने पर धांधली की गई और इसमें भारी भ्रष्टाचार होने की भी संभावना है।
ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि जो अभ्यर्थी मेरिट लिस्ट में बहुत पीछे थे आखिर उनका चयन किस आधार पर किया गया और जो अभ्यर्थी राज्य स्तरीय मेरिट में सर्वोच्च स्थान पर थे उन्हें नजरअंदाज किए जाने के पीछे क्या कारण थे? राज्य स्तरीय चयन समिति में एनसीईआरटी के द्वारा नामित प्रतिनिधि भी मौजूद थे। यह भी जानकारी में आया है कि राज्य स्तरीय चयन समिति की बैठक में राज्य के सचिव विद्यालयी शिक्षा (जो कि चयन समिति के अध्यक्ष भी थे) और निदेशक विद्यालयी शिक्षा ने उपस्थित रहना भी जरूरी नहीं समझा। सभी जिम्मेदार अधिकारियों ने अपने स्थान पर अपने किसी प्रतिनिधि को चयन समिति की बैठक में भेज दिया। दिनांक 31 जुलाई 2018 को सचिव, विद्यालयी शिक्षा उत्तराखंड के कक्ष में आयोजित की गई चयन समिति की बैठक में एनसीईआरटी के प्रतिनिधि की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।
ज्ञातव्य है कि राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कारों के लिए शिक्षकों के चयन की प्रक्रिया में राजनेताओं एवं अधिकारियों की मनमानी को रोकने के लिए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा वर्ष 2017 से राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार चयन की पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन कर पारदर्शी बनाने का प्रयास किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार हेतु अलग से एक पोर्टल बनाया गया है जिस पर शिक्षक राष्ट्रीय पुरस्कार हेतु स्वयं ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें विभाग से अनुमति लेने की भी आवश्यकता नहीं है। पोर्टल पर शिक्षकों के पंजीकरण कराने एवं अपने कार्य का ब्यौरा अपलोड करने के पश्चात जिला एवं राज्य स्तर पर गठित चयन समिति को शिक्षक के द्वारा किए गए कार्यों का स्थलीय सत्यापन करना होता है। इसी के आधार पर उन्हें विभिन्न मानकों पर अंक प्रदान किए जाते हैं । राष्ट्रीय पुरस्कार हेतु सौ अंकों का मानक तय किया गया है। जिन्हें क्रमशः 8 एवं 3 प्रश्नों के दो अलग-अलग खंडों (कुल 11 प्रश्नों) में बांटा गया है तथा प्रत्येक प्रश्न हेतु अंक भी निर्धारित किए गए हैं।
इस प्रकार केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा गठित राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार चयन समिति ऑनलाइन पोर्टल पर प्रत्येक शिक्षक के द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किए गए कार्यों (जिसके साक्ष्य शिक्षक द्वारा अपलोड किए गए हों) एवं उपरोक्त कार्यों हेतु जिला चयन समिति द्वारा उन्हें दिए गए अंको पर सीधी नजर रखती है। इसी आधार पर जिला स्तर से तीन सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले शिक्षकों को राज्य स्तर हेतु नामित किए जाने की व्यवस्था है। राज्य स्तर पर गठित चयन समिति शिक्षक के द्वारा विद्यालय स्तर पर किए गए कार्यों का सीधा निरीक्षण नहीं कर सकती है इसलिए राज्य स्तरीय चयन समिति को जिला स्तर से नामित हुए शिक्षकों में से ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों का चयन कर उन्हें राष्ट्रीय स्तर हेतु नामित करने का प्रावधान किया गया है। लेकिन उत्तराखंड राज्य में गठित राज्य स्तरीय चयन समिति ने जनपदों से नामित हुए शिक्षकों की मेरिट सूची को पूरी तरह दरकिनार कर अपने चहेते शिक्षकों को मनमाने ढंग से राष्ट्रीय स्तर हेतु नामित कर दिया। क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया की राष्ट्र स्तरीय चयन समिति द्वारा ऑनलाइन मॉनिटरिंग की जा रही थी इसीलिए राज्य स्तरीय चयन समिति का यह फर्जीवाड़ा तुरंत राष्ट्रीय चयन समिति के संज्ञान में आ गया। यही कारण है कि राष्ट्रीय चयन समिति द्वारा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कारों के चयन में उत्तराखंड के किसी भी शिक्षक को चयनित नहीं किया गया। इस कारण राष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखंड राज्य को एक बड़ी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। उत्तराखंड देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जो अपने कोटे के एक राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार को प्राप्त नहीं कर सका। अन्यथा देश के सभी छोटे बड़े राज्यों ने अपने-अपने कोटे के पुरस्कार हासिल करने में सफलता पाई है। इससे उत्तराखंड राज्य के अधिकारियों की कार्यशैली पर भी सवालिया निशान लगे हैं। इसी का नतीजा राष्ट्रीय आईसीटी पुरस्कारों के चयन में भी देखने को मिला है। यहां भी उत्तराखंड को अपने कोटे के 2 राष्ट्रीय पुरस्कारों में से एक भी राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल नहीं हो सका। भविष्य में भी उत्तराखंड राज्य में यदि अधिकारियों की कार्यशैली इसी प्रकार बनी रही तो अगले कुछ वर्षों तक इसी प्रकार के नतीजे देखने को मिल सकते हैं जो कि इस राज्य के शिक्षकों और शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ा प्रश्नचिन्ह साबित होगा।

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