Tuesday, March 10, 2026
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पहाड़ों में क्वारनटाइन सेंटरों में ग्राम प्रधानों व क्वारनटाइन लोगों के आगे ये हैं बड़ी समस्याएं!

(मनोज इष्टवाल)

उत्तराखंड के लिए यह महामारी एक हिसाब से सुखद इसलिए है कि इस महामारी के दौर में लगभग ढाई लाख उत्तराखंडी महानगरों से अपने गाँव लौटे हैं, इनमें 60 प्रतिशत वह युआ वर्ग शामिल है जो रोजी रोटी के लिए अभी महानगरों में पैर जमाने की सोच ही रहा था व गाहे-बगाहे अपने बीबी-बच्चों के साथ किराए के मकानों में गुजर बसर कर रहा था! 

(फाइल फोटो- देवभूमि संवाद)

कोरोना काल का दूसरा सबसे अलग व दर्द भरा पक्ष यह है कि अब तक कोरोना से प्रदेश भर में एक हजार से अधिक लोग संक्रमित हुए हैं व आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से अभी तक 7 लोगों की जान भी गयी है! जहाँ एक ओर प्रदेश सरकार व केंद्र सरकार तरह तरह के विज्ञापनों के माध्यम से जन-जागरण का काम कर रही है वहीँ राज्य सरकार क्वारनटाइन किये जा रहे लोगों के लिए प्रति व्यक्ति एक खाद्यान किट जिसमें 5 किलो चावल,3 किलो आटा, 1 किलो तेल, 1 किलो चीनी, 250 ग्राम मसाले व 250 ग्राम चाय दे रही है, जो प्रशंसनीय पहल कही जा सकती हैं!

कोरोना संक्रमण के लिए तैयार क्वारनटाइन सेंटरों के लिए सबसे कमजोर कड़ी में अगर सरकार का कोई काम दिखाई दे रहा है तो वह सुदृढ़ कार्ययोजना की कमी है! प्रदेश के 10 पहाड़ी जनपदों में क्वारनटाइन की व्यवस्था ग्राम प्रधान के जिम्मे सौंपने के अफसरशाही व राज्य सरकार के निर्णय का कमजोर पक्ष यह है कि उन्होंने ग्राम सभाओं के अधीन आने वाले स्कूलों को क्वारनटाइन सेंटरों  के रूप में तब्दील करने का कार्य किया है! यह प्राथमिक व्यवस्था के रूप में तो सही लगता है लेकिन यह व्यवस्था निरंतर जारी रखी जाय तब उसके लिए सरकारी स्तर पर न कोई स्पेशल फंड की व्यवस्था ग्राम प्रधान को दी गयी है और न ही क्वारनटाइन सेंटरों में सरकारी स्तर पर क्वारनटाइन किये गए लोगों की व्यवस्था का ही ध्यान रखा गया है, क्योंकि प्रत्येक स्कूल में शौचालय तो उपलब्ध हो सकते हैं लेकिन स्नानघर नहीं हैं जो बहुत बड़ी समस्या है! प्रदेश के कई स्कूलों के शौचालयों की माली हालत की फोटो आये दिन सोशल साईट पर दिख ही जाती है! कई जग्गाह पानी के नल तो हैं लेकिन उनमें पानी नहीं है! एक ही शौचालय का इस्तेमाल हो रहा है जिसमें अलग अलग महानगरों से आये लोगों को वही इस्तेमाल में लाना होता है, यहाँ लोग आपस में ही एक दूसरे से भयभीत हैं! 

सबसे बड़ी व गौण बात यह है कि छोटे बच्चों के लिए न सरकारी स्तर पर दूध की व्यवस्था है न उनके लिए किसी प्रोपर फीड की! जहाँ तो बाजार नजदीक हैं वहां से जैसे तैसे लोग अपने पैंसे से दूध मंगा भी दे रहे हैं लेकिन जहाँ दूध नहीं मिल पा रहा है वहां बच्चों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है! साथ ही अबोध बच्चा यह तो नहीं जानता कि उसे सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखना है इसलिए उसकी माँ की चौकीदारी बच्चे को ही सम्भालने पर लग जाती है! ग्राम प्रधानों के आपदा फंड में 10 हजार रूपये होते हैं लेकिन किसी भी ग्राम प्रधान को यह जानकारी नहीं होती कि उस फंड का इस्तेमाल कब और कैसे करना है! इन तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए सरकार को चाहिए कि वह इन प्रकरणों पर बिशेष नजर रखे क्योंकि आने वाले समय में चुनाव को प्रभावित यही वोटर्स करेंगे! सरकार व जनता के बीच संवादहीनता न रहे इसका ध्यान रखा जाना भी आवश्यक है! 

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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