Friday, March 20, 2026
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ताल घाटी और सुल्ताना डाकू…!

(हरीश कंडवाल मनखी की कलम से)।

आजादी के लिए लड़ी गयी लड़ाइयों इतिहास के पन्नों में को जब पलटा जाता है तो पिछले कई पन्नों में हमें भारत में अंग्रेजों के चने चबाते हुए कई क्रांतिकारी लोग और उनका संघर्ष सामने आता है, ऐसे क्रांतिकारी जिन्होंने भारत देश को आजाद करने में अपनी अहम भूमिका निभाई लेकिन कुछ ऐसे क्रांतिकारी भी थे जिन्होंने अंग्रेजों से सीधी लड़ाई नहीं लड़ी बल्कि उनसे अप्रत्यक्ष रुप में लड़ाई लड़ी।

जिन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खजाने को लूटा उन्हें डाकू घोषित कर दिया गया ऐसे एक डाकू जिसे सुल्ताना डाकू के नाम से जाता है।

सुल्ताना डाकू नजीबाबाद का रहने वाला था उसने तीन सौ लोगों का गिरोह बना रखा था वहां उन लोगो के साथ मिलकर अमीरों के घर में जाकर और खासकर अंग्रेजों का खजाने को लूटता था।। सुल्ताना डाकू के बारे में कहा जाता है किसने कभी भी किसी गरीब आदमी को नहीं लूटा बल्कि अंग्रेजों के खजाने यह बड़े अमीर घर जिन्होंने गरीबों की संपत्ति लूट कर कब्जा कर ली थी उस संपत्ति को सुल्ताना डाकू लूटता था और गरीबों में बांट देता था। सुल्ताना डाकू के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह अमीर आदमी को यहां पर भी किसी को लूटना होता था वहां पर वहां नोटिस चस्पा देता था तारीख को मैं तुम्हारा धन लूट लूंगा।

नजीबाबाद से नैनीताल हल्द्वानी जाते हैं रास्ते में घर को जंगल में जब अंग्रेजों का काफिला गुजरता था तो वहां अपने गिरोह के साथ अंग्रेजों के खजाने को लूट लेता था। कई बार के डकैतों के कारण सुल्ताना डाकू सुल्ताना डाकू अंग्रेजों के लिए बड़ा मुसीबत बन चुका था ।
उसके बाद टिहरी के राजा ने टी सुल्ताना डाकू को पकड़ने के लिए एक अंग्रेज को बुलाया गया। उसके बाद सुल्ताना डाकू अपने 10 -12 साथियो के साथ गिरप्तार कर लिया गया और आगरा के जेल में डाल दिया गया। वंहा उसने जेलरों और कैदियो के साथ अच्छा व्यवहार कर सबका दिल जीत लिया। उसके बाद उसे फाँसी की सजा को तब्दील कर ताउम्र कैद की सजा सुना दी, और अंडमान निकोबार भेजकर काला पानी भेज दिया गया।।

सुल्ताना डाकू का सम्बंध जिला पौड़ी के यमकेश्वर विधान सभा क्षेत्र तालघाटी से भी रहा है। तालघाटी में सुल्ताना डाकू ने बार डकैती डाली, और अंग्रेजों का खजाना लूटकर ले गया।

तालघाटी क्षेत्र ताल बांदनी जाने के रास्ते मे आज भी आम का बगीचा मौजूद है, उस जगह पर बन्नू कलाल नाम का व्यक्ति अंग्रेजो के लिये कच्ची शराब बनाता था उसकी शराब की भट्टी थी, साथ ही वँहा पर अंग्रेजो का गुप्त खजाना भी था। सुल्ताना डाकू अपने गिरोह के साथ लगभग 19वी शताब्दी में तालघाटी के उक्त शराब की भट्टी में आया और वँहा से धन लूटकर ले गया। उक्त जगह पर यह भट्टी आजादी के कुछ वर्षों तक उस स्थान पर रही जिसे डांडामण्डल क्षेत्र के आजादी के क्रान्तिकारीयो ने तोड़ दी। जानकारी मुताबिक 1942 की भारत छोड़ो आन्दोलन कि चिंगारी का असर तालघाटी में भी पड़ा, डांडामण्डल क्षेत्र के कुशाल मणी कंडवाल, बेंगरा रामजीवाला के श्री माधो सिंह रावत, श्री नारायण भट्ट किमसार के ही कुशाल सिंह बिष्ट आदि ने रात में जाकर उक्त भट्टी को तहस नहस कर दिया और वँहा शराब बनाने वाले बर्तन भडू को उठाकर ले आये, उसके बाद इन लोगो को ब्रिटिश गढ़वाल के कमिश्नर ने बागी घोषित कर इन्हें पकड़ने का हुकुम दे दिया गया। कहा जाता है कि ये लोग किमसार औऱ रामजीवाला के मध्य थूपुलडंग में बनी गुफा में छूपकर निवास करते और वंही बैठकर योजना बनाते थे। आज भी स्व0 माधो सिंह रावत के पुस्तैनी घर मे शराब बनाने वाले लूटे गए भडू उपलब्ध है।

यानी कि तालघाटी और डांडामण्डल क्षेत्र का योगदान भी आजादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रहा, साथ ही सुल्ताना डाकू के दो बार डकैती के कारण भी यह स्थल ऐतिहासिक रहा।

वर्तमान में उक्त बगीचे में केवल आम के पेड़ उपलब्ध है, वँहा सिर्फ अब झाड़ी नजर आती है, ऐसे ऐतिहासिक स्थल क्षेत्रीय जनमानस कि उपेक्षापूर्ण रैवये से उपेक्षित हो गए हैं, जिस कारण वर्तमान पीढ़ी को अपने क्षेत्र का इतिहास मालूम नही है, और अपने क्षेत्र के प्रति हीन भावना से ग्रसित हो जाता है।

 

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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