Tuesday, March 10, 2026
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केदारनाथ मामले में धर्मस्व व पर्यटन मंत्री पर किसके इशारे पर हो रही है राजनीति।

(मनोज इष्टवाल)

हमें नहीं लगता कि हम पत्रकारिता के साकारात्मक पक्ष को लगभग भूल चुके हैं। क्या मैं क्या अन्य पत्रकार…! सभी टीआरपी की दौड़ के बीच ये भूल रहे हैं कि किन सामाजिक मुद्दों व धर्म सम्बन्धी विभिन्न पचड़ों का बिना अध्ययन किये उस पर लिख देना या टिप्पणी कर देना आम सी बात हो गयी है।

यहां भी केदारनाथ कपाट खुलने के सम्बंध में कुछ ऐसे ही निशाने पर प्रदेश के धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज को कुछ पत्रकारों ने निशाने पर लेकर मामले को गरमाने का प्रयास करते हुए लिखा है कि सतपाल महाराज कौन होते हैं केदारनाथ मंदिर पर दिशा निर्देश देने वाले?

माना यह बात मंदिर समिति या पंडा समाज व रावल बैठकर तय करते रहे हैं और उन्हें इसका पूर्ण अधिकार भी है लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या हमने सरकार द्वारा हाल ही में गठित देवस्थानम बोर्ड के बनाये जाने या शीघ्र गठित होने की प्रक्रिया का भी अध्ययन किया है?

रही महाराज के बयान को प्राथमिकता से उठाने की बात तो यह तब यकीनन बड़ी खबर बनती थी जब उनके पहले बयान के बाद शीघ्र ही संशोधित बयान नहीं जारी होता। सतपाल महाराज द्वारा टिहरी नरेश व रावल से बातचीत का ब्यौरा वीडियो के माध्यम से उनके ओएसडी अभिषेक शर्मा द्वारा दोपहर 1 बजकर 21 मिनट पर भेजा गया। तदोपरांत 2:38 मिनट पर संशोधन हेतु उनका सन्देश मिलता है व 3:56 पर संशोधित बयान जारी हो जाता है जिसमें सतपाल महाराज स्पष्ट करते हैं कि केदारनाथ मसले पर केदारनाथ के रावल व पंडा समाज आपस में बैठकर कल (आज) सुबह 11 बजे कपाट खुलने का समय तय करेंगे।

यह पहला मौका नहीं है जब किसी मंत्री मुख्यमंत्री का बयान मीडिया को रिवाइज करके न मिला हो। फिर भी इस पर धर्म के नाम पर व केदारनाथ के नाम पर राजनीतिपूर्ण सुर्खियों के साथ जानबूझकर धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री को टारगेट करना किसी स्वच्छ पत्रकारिता का प्रतीक तो क़तई नहीं दिखता।

ये है धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज का कल का संशोधित बयान:-

ज्ञात हो कि अब जब केदारनाथ मंदिर के रावल व पंडा समाज ने बैठकर केदारनाथ मंदिर के कपाट को 29 अप्रैल की निर्धारित तिथि पर ही खोलने का ऐलान किया है तब बद्रीनाथ धाम के श्रीबद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत ने भी इस बात का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया है कि नारद पुराण के अध्याय २/६७/३९ में वर्णित श्लोक के अनुसार “वैशाखे मासे वै देवा: गच्छन्ति निज मन्दिरम्! कार्तिके तू समागत्य पुनर्रचाचरन्ति च!! ततोs वैशाखेमारमानव: हिम-संक्षायात! अत:षणमास दैवते पूजा षणमासं मानवैस्तथा!!” ( मास में देवता अपने निजी मंदिरों में चले जाते हैं! और कार्तिक मॉस में पुनः आकर अर्चना करते हैं! इस प्रकार वैशाख मास से मानवों द्वारा पूजा प्रारम्भ होती है! ) के अनुसार वैशाख मास में ही कपाट खोलने का विधान है, और इसी का संदर्भ लेते हुए श्रीबद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत के प्रवक्ता एवं अध्यक्ष विधि समिति पंकज डिमरी ने महाराज टिहरी को पत्र लिखा है कि:-

श्रीबद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत के प्रवक्ता पंकज डिमरी।

जय बदरीविशाल
आदरणीय महाराज जी
पाय लागू

महामहिम बोलांदा बदरीनाथ जी
यदि बाबा केदारनाथ के कपाट पूर्व तय कार्यक्रम के अनुसार ही खुलते हैं तो भगवान बदरीनाथ के कपाट भी पूर्व तय समय ही खुलना उचित रहेगा ।
भगवान बदरीनाथ जी की शीत काल में पूजा देवताओं द्वारा की जाती है ।जिनके पुजारी नारद जी हैं ।नारद पुराण के अध्याय २/६७/३७ में श्लोक बदरीनाथ जी की पूजा के संदर्भ में श्लोक है कि ..

वैशाखे मासे वै देवाः गच्छन्ति निज मंदिरम् ।
कार्तिके तु समागत्य पुनरर्चा चरन्ति च ।।
ततो वैसाखेमारम्य मानवः हिम-संक्षयात् ।
अतः षण्मास दैवतैः पूजा षण्मासं मानवैस्तथा ।।

अर्थात बैसाख मास में देवता अपने निजी मंदिरों में चले जाते हैं ।और कार्तिक मास मे पुनः आ कर अर्चना करते है । इस प्रकार वैसाख मास से मानवों द्वारा पूजा प्रारम्भ होती है ।यही शास्त्रीय विधान है ।तिथि परिवर्तन से कपाट जेठ मास में कृष्ण पक्ष में जा रहे हैं जिस कारण इस शास्त्र सम्मत मान्यता का उल्लंघन हो रहा है जो अनुचित है ।यह सही है कि परम्परा के अनुसार आपका स्थान सर्वोपरि है किन्तु आपके श्रेष्ठता भी तभी तक जनमान्य होगी जब आपका निर्णय शास्त्र अनुकूल हो ।

करोना महामारी और लॉकडाउन के बाद भी बाबा केदारनाथ ,गंगोत्री और यमनोत्री जी के कपाट पूर्व कार्यक्रम के अनुसार ही खुल रहे ह़ैं । तो ऐसे में बदरीनाथ जी की पूजा व्यवस्था से सम्बद्ध समाज और भक्तों का यह सवाल जायज है कि बदरीनाथ जी के कपाट तय समय पर क्यों नहीं खुल सकते ।
राज्य सरकार ने महाराजा टिहरी को कैबनट बैठक कर दो विकल्प दिये थे कि वे या तो तिथि परिवर्तन करें. या मुख्य पुजारी / रावल के स्थान पर वैकल्पिक व्यवस्था हेतु परम्परा और पूर्व नजीर के अनुरूप उच्च ब्राह्मण को नामित करें ।
महोदय बदरीनाथ की पूजा इतिहास में ऐसे कई उवसर आये हैं जब स्थानीय ब्राह्मणों ने मुख्य पुजारी के दायित्व का निर्वहन किया है । रावल परम्परा से पूर्व जब दण्डी स्वामी धाम की पूजा अर्चना करते थे तब भी चार अवसर ऐसे आये हैं जब भोग बनाने वाले डिमरी ब्राह्मण में धाम में मुख्य पुजारी के रूप में कार्य किया है ।संवत्सर 1611 अर्थात ई सन 1554 मे दण्डी स्वामी ब्रहमानन्द जी के देहवसान पर पं० मनोरथ डिमरी ने मुख्य पुजारी के रूप में बदरीनाथ जी की दैनिक पूजा सम्पन्न करी ।संवत 1715 याने ई० सन् 2668 में दण्डी स्वामी बालकृष्ण जी की आकस्मिक निधन पल भी पं० सकला डिमरी जी ने भगवान का लम्बे समय तक नित्य पूजन कर्म सम्पन्न किया ।
संवत 1833 में दण्डी स्वामी रामकृष्ण जी के निधन के बाद महाराजा प्रदीप शाह जी के निर्देश पर ब्रहम्चारी रावल / पुजारी की परम्परा शुरू हुई ।जिसमें पहले रावल पं० गोपाल डिमरी बने जिन्होंने नौ वर्ष तक यह दायित्व निभाया ।इसके बाद से केरल से ब्रहम्चारी नम्बूदरी पुजारी को रावल चुनने की प्रथा अस्तित्व में आयी ।
रावल व्यवस्था के दौरान ई० सन् 1817 में चौथे रावल सीताराम जी के निधन के बाद भी डिमरी ब्राह्मण ने नये रावल के आने तक मुख्य पुजारी के रूप में भगवान बदरीनाथ जी की पूजन परम्परा को अखण्ड रखा है।

यदि केदारनाथ के कपाट तय समय पर ही खुलते हैं तो श्री बदरीनाथ के कपाट भी पूर्व कार्यक्रम के अनुसार खोले जाने पर पुनर्विचार करते हुए बदरीनाथ जी पूजा की वैकल्पिक व्यवस्था हेतु डिमरी धार्मिक केन्द्रीय पंचायत की संस्तुति फर ब्रहम्चारी डिमरी ब्राह्मण को रावल जी के स्वास्थ्य हो जाने तक उनके स्थान पर पूजा हेतु नामित करने का कष्ट करेंगे । ताकि बदरीनाथ जी की हजारों साल पुरानी परम्परा खण्डित न हो ।
पंकज डिमरी
(प्रवक्ता एवं अध्यक्ष विधि समिति)
श्री बद्रीनाथ डिमरी केंद्रीय पंचायत

बहरहाल केदारनाथ धाम पर जिस धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के पूर्व बयान को संज्ञान में लेकर कुछ मीडिया घरानों द्वारा खबरें बनाई गई हैं वह समझ से परे हैं क्योंकि ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जब किसी भी राजनैतिक व्यक्ति का बयान संशोधित होकर दुबारा मीडिया के पास आता है। ऐसे में कहीं न कहीं ऐसे मामले पत्रकारिता पर प्रश्नचिह्न लगाते जरूर नजर आते हैं।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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