Sunday, March 22, 2026
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उत्थान के बाद वीरान हो गयी तालघाटी, कभी गुलजार होती थी कण्डरह ताल मण्डी।

(हरीश कंडवाल मनिखि की कलम से)

समय चक्र क्या होता है, और बदलाव किस तरह से आते हैं, किसी भी जगह का उत्थान और उसका वीरान होने की एक लम्बी प्रक्रिया है तालघाटी का इतिहास। एक जमाना था जब कभी पूरी घाटी गुलजार ही नहीं बल्कि आधी यमकेश्वर क्षेत्र की सांस नली थी यह तालघाटी, लेकिन आखिर के बीस सालों ने इस तालघाटी को वीरान कर दिया। हालांकि तालघाटी की पतन की कहानी उस दिन लिख ली गयी थी जब बड़काटळ, उमरथाम, भोगपुर हाथीथाम से भूमि बदलाव होकर गंगाभोगपुर यानि कौडिया आ गये। आज हमारे तालघाटी के गाॅव और उनके इतिहास के साथ ही कण्डरह ताल और कुशाशील मंडी के उत्थान और पतन की इबारत लिखी जायेगी।

तालघाटी के प्रमुख गाॅवः बड़काटळ, भोगपुर, उमरथाम, हाथीथाम, भण्डारीखाल, कण्डरह, साईकिलवाड़ी ग्वाल्डा, कडाईखाल, ताल बहेड़ी, सहजादा, ख्वाड़ागदन, खैराणा, तालघेरू, तल्ला कोटा, मल्ला कोटा, खैराणा, भौरजगाॅव, कुण्ड, ताल बाॅदणी, घोरगड्डी यह प्रमुख गाॅव या तोक हैं। जिनमें से बड़काटळ, भोगपुर, हाथीथाम, भण्डारीखाल, का भूमिबदलाव किया गया और इन्हें गंगाभोगपुर तल्ला और मल्ला में विस्थापित कर दिया गया। वर्तमान में कुण्ड और भौरजगाॅव ताल बहेडी,पलयान, से मानवविहीन हो गये हैं, जबकि ग्वालडा गाॅव निवासी गंगाभोगपुर में प्रवास कर गये हैं, लेकिन एक दो परिवार कुछ समय के लिए ग्वालडा आते जाते रहते हैं।

तालघाटी का इतिहासः

तालघाटी का मानवीय इतिहास बहुत पुराना नहीं है, यहाॅ लोगों ने 18वीं सदी के अंत में यहाॅ निवास करना शुरू किया, इसका प्रमाण यह है कि साईकिलवाड़ी में कण्डवाल जाति की वर्तमान 6वीं पीढी चल रही है, जिसकी पूरी वंशावली मेरे पास उपलब्ध हैं। बडकाटल हाथथाम और उमरथाम गाॅव पूर्व के बसे हुए थे। दिवोगी (कण्डरह, साईकिलवाड़ी डांडी, डंडी, सिमारीधाार, तालबहेड़ी) ग्वाल्डा, भौरजगाॅव, खोड़ागदन, कोटा कुण्ड, ताल बाॅदणी और घोरगड्डी यहाॅ सब खैकर व्यवस्था के तहत बसे हैं। कण्डरह और साईकिलवाड़ी में क्वीराला और डांडी में बिष्ट जाति के लोग रामजीवाला से ग्वाल्डा और भौरजगाॅव के कण्डवाल भी रामजीवाला से आये है। जबकि साईकिलवाड़ी में किमसार से आने वाले धरणीदत्त कण्डवाल और उनकी पत्नी मैणा देवी लगभग 1890 के करीब साईकिलवाड़ी में आये, उनकी वर्तमान में 06वीं पीढी है। कण्डवाल जाति के लोगों का गोत्र भारद्वाज है। इसी तरह सिमारीधार और महथा नेगी किमसार के मूल निवासी हैं, और महर नेगी जो दिवोगी के डंडी में आकर बसे। इसी तहर बहेड़ी के भी कण्डवाल किमसार मूल के हैं। खोड़ा गदन के कपोला बिष्ट भी किमसार के मूल निवासी हैं।

इसी तरह से कोटा मल्ला और कुण्ड गाॅव में जामल गाॅव के चौहान जिनकी जमीन यहाॅ थी वह यहाॅ अपनी सुविधानुसार बसने आ गये। कोटा तल्ला में जोशी जाति के लोग उड्डा से आये हुए है। इसी तरह तालघेरू में भट्ट जाति के लोग जुलेड़ी से यहाॅ आये हैं। ताल बाॅदनी में कैन्तुरा जाति के लोग मूल रूप से टिहरी और बाद में बस्टोला और फिर चमकोटखाल में भी कुछ पीढी रहने के बाद यह लोग सिलसारी तोक के ताल बाॅदनी में निवास करने लगे। इसी तरह घोरगड्डी गाॅव के रावत जाति के लोग मूल रूप से सिलसारी गाॅव के निवासी हैं, जिनकी यहाॅ जमीन थी। इस तरह से घाटी में यह लोग सुख सुविधाओं के कारण यहाॅ बसने के लिए आये हैं।

साईकिलवाड़ी का इतिहासः

साईकिलवाड़ी गाॅव में सर्वप्रथम 1890 के करीब किमसार गाॅव के मूल निवासी श्री धरणीदत्त कण्डवाल और उनकी पत्नी मैणा देवी जिनका मायका उड्डा में जोशी परिवार में था। इसी तरह से रावत जाति के लोग जो रामजीवाला से कण्डरह और कण्डरह से साईकिलवाड़ी आये उनकी यहाॅ 5वीं पीढी चल रही है, जबकि डांडी मंें कपोला बिष्ट, जो रामजीवाला से आये थे उनकी भी पाॅचवी और किमसार से महर नेगी कि भी चैथी पीढी डंडी में आयी थी।

सुल्ताना डाकू बनाम तालघाटी :

सुल्ताना डाकू का सम्बंध जिला पौड़ी के यमकेश्वर विधान सभा क्षेत्र तालघाटी से भी रहा है। तालघाटी में सुल्ताना डाकू ने बार डकैती डाली, और अंग्रेजों का खजाना लूटकर ले गया।
तालघाटी क्षेत्र ताल बांदनी जाने के रास्ते मे आज भी आम का बगीचा मौजूद है, उस जगह पर बन्नू कलाल नाम का व्यक्ति अंग्रेजो के लिये कच्ची शराब बनाता था उसकी शराब की भट्टी थी, साथ ही वँहा पर अंग्रेजो का गुप्त खजाना भी था। सुल्ताना डाकू अपने गिरोह के साथ लगभग 19वी शताब्दी में तालघाटी के उक्त शराब की भट्टी में आया और वँहा से धन लूटकर ले गया।

तालघाटी और भारत छोड़ो आंदोलन: जानकारी मुताबिक 1942 की भारत छोड़ो आन्दोलन कि चिंगारी का असर तालघाटी में भी पड़ा, डांडामण्डल क्षेत्र के कुशाल मणी कंडवाल, बेंगरा रामजीवाला के श्री माधो सिंह रावत, श्री नारायण भट्ट किमसार के ही कुशाल सिंह बिष्ट आदि क्रांतिकारी लोगो ने अंग्रेजो की शराब की भट्टी को योजना के तहत और विरोध करने की दृष्टि से रात में जाकर उक्त शराब की भट्टी को तहस नहस कर दिया और वँहा शराब बनाने वाले बर्तन भडू को उठाकर ले आये, उसके बाद इन लोगो को ब्रिटिश गढ़वाल के कमिश्नर ने बागी घोषित कर इन्हें पकड़ने का हुकुम दे दिया गया। कहा जाता है कि ये लोग किमसार औऱ रामजीवाला के मध्य थूपुलडंग में बनी गुफा में छूपकर निवास करते और वंही बैठकर योजना बनाते थे। आज भी स्व0 माधो सिंह रावत के पुस्तैनी घर मे शराब बनाने वाले लूटे गए भडू उपलब्ध है।
यानी कि तालघाटी और डांडामण्डल क्षेत्र का योगदान भी आजादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रहा, साथ ही सुल्ताना डाकू के दो बार डकैती के कारण भी यह स्थल ऐतिहासिक रहा।

वर्तमान में उक्त बगीचे में केवल आम के पेड़ उपलब्ध है, वँहा सिर्फ अब झाड़ी नजर आती है, ऐसे ऐतिहासिक स्थल क्षेत्रीय जनमानस कि उपेक्षापूर्ण रैवये से उपेक्षित हो गए हैं, जिस कारण वर्तमान पीढ़ी को अपने क्षेत्र का इतिहास मालूम नही है, और अपने क्षेत्र के प्रति हीन भावना से ग्रसित हो जाता है।

डांडामण्डल के निवासी कुछ गड़ाकोट और मैदान से होते हुए लालढांग सामान लेने जाते थे जिन्हें ढाकर कहा जाता था, इसी प्रकार तालघाटी के लोग ताल नदी से होते हुए कनखल सामान लेने जाते थे, उस समय का हरिद्वार का कनखल ही एक मात्र बाजार था। तालघाटी और आस पास के लोगों का विघ्यंवासनी या विदासनी में ढाकर वाले विश्राम करते थे, जिस कारण इस जगह को क्षेत्रीय भाषा में विश्राम करने की जगह के कारण इसे विदसणी भी कहते हैं। गोहरी में गंगा नदी पार करने के लिए नाव लगती थी। लालढांग से आते जाते ढाकरियों की परेशानी को समझते हुए लालढांग के पर्वतीय व्यक्ति जो उस जमाने में रसूखदारो व्यक्तियों में गिने जाते थे उनकी अपनी एक फर्म थी उन्होेेने क्षेत्रीय निवासियों की पीड़ा को समझते हुए इसके निदान करने के प्रयास करना शुरू किया। वह व्यक्ति थे श्री उदय सिंह तड़ियाल जिनकी अपनी बेटी के नाम से गंगा बस सर्विस करके फर्म खोली हुई थी। 1951 में उन्होने अपने निजी प्रयासों से हरिद्वार ते ताल कण्डरह तक नदी के किनारे किनारे कच्चा मार्ग बनाया।

मार्च 1951 में ताल कण्डरह तक अपनी बस लेकर आये, उस जमने में तालघाटी ही नहीं बल्कि पूरे यमकेश्वर क्षेत्र में यह एक ऐतिहासिक क्षण था, और उस जमाने में यह चर्चा का विषय बना था। तालघाटी में गंगा बस सर्विस शुरू होने के बाद पूरा डांडामण्डल क्षेत्र, काण्डी कस्याली, सतेड़ी घाटी, रणचूला थोकदारी में आने वाले गाॅव ईधर यमकेश्वर, दमराड़ा, बडोली यहाॅ तक कि त्याडौं घाटी से लेकर दिउली के आस पास के गाॅव के लोग इस सड़क पर पूरी तरह निर्भर हो चुके थे। उस समय पूरे क्षेत्र के लोग बस देखने के लिए कण्डरह मण्डी में विशेष तौर पर आते थे और उस समय महिलाओं ने उदय सिंह तड़ियाल के ऊपर लोक गीतों की तक रचना की।

कण्डरह एवं ताल मण्डीः

कण्डरह तक सड़क पहॅुचने के बाद तालघाटी उस समय बहुत प्रसि़द्धि प्राप्त कर चुकी थी, सड़क आने से कनखल की लघु मण्डी कण्डरह मंें स्थापित हो गयी थी। स्थानीय लोग और हमारे बुजुर्गो ने बताया कि यहाॅ पर सबसे पहले काण्डी के नेगी जाति के लोगो ने झोपड़ी बनाकर दुकान खोली थी। उस समय यहाॅ पर बदरीदत्त रणाकोटी, उमरथाम निवासी ने सस्ते सरकारी गल्ले की दुकान खोली थी। 1960 के दशक में श्री जगमोहन सिंह नेगी उत्तर प्रदेश सरकार में खाद्य पूर्ति राज्य मंत्री थे उनके विशेष प्रयासों से यहाॅ सस्ते गल्ले की दुकान खुलवायी गयी। 1962 चैथे आम चुनाव में वह पुनः कैबिनेट मंत्री बने और उन्हें पूर्व का विभाग खाद्य पूर्ति विभाग दिया गया। उसी समय 1962 में जब पूरे क्षेत्र में अकाल पड़ा तो श्री जगमोहन सिंह नेगी के विशेष प्रयासों से उस समय इस क्षेत्र में विशेष राशन वितरित की गयी। ज्वार और बाजरा उस समय लोगों को वितरित किया गया था। श्री जगमेाहन सिंह नेगी कैबिनेट मंत्री चाहते थे कि पूरी तालघाटी का भूमि बदलाव किया जाय, और इन्हें अन्यत्र बसाया जाय।

कण्डरह मंडी में लगभग 25 से 30 दुकानें उस समय थी, रात रूकने के लिए विश्राम स्थल बनाये हुए थे, दूर दराज क्षेत्र के लोग जब देर सांय को पहुॅचते तो रात को इन्ही विश्राम स्थलों में ठहरते और अगली सुबह अपने गंतव्य के लिए प्रस्थान करते। 1960 के दशक में जगमोहन सिंह नेगी के विशेष प्रयासों से लक्ष्मणझूला से काण्डी की सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो गयी। लक्ष्मणझूला कांडी सड़क के बन जाने से उधर के निवासियों के लिए सुविधा हो गयी। बड़काटळ, हाथथाम, उमरथाम, भोगपुर और भण्डारीखाल के निवासियों का गंगा भोगपुर विस्थापित होने के बाद से ही तालघाटी के वीरान होने की नींव पड़ गयी । कण्डरह तालघाटी में 1995 तक खूब रौनक रहती थी, लेकिन जब डांडामण्डल क्षेत्र में सड़क आयी उसी दिन से तालघाटी की विरानी का दीमक लग गया। और 2000 से 2020 तक की अवधि में तालघाटी पूरी तरह से एक बेवा की तरह लूटी सी हो गयी है।

इसी तहर ताल और कुशासील मण्डी भी एक जमाने में गुलजार रहती थी। उस समय यह मण्डी लोगों की रोजगार की द्वार खोली हुई थी, क्षेत्र की अर्थव्यवस्था या कहें की उत्तराखण्ड की पहाड़ी मनीआर्डर व्यवस्था की खपत इन्ही मण्डियों मे पूरी जाती थी। जब से लोगों ने रोजगार की तलाश में शहरों की ओर उन्मुख हुए तब उन्होेने पलटकर नहीं देखा, और पलायन ने रौद्र रूप धारण कर लिया इस तरह से पूरी ताल और कण्डरह मंडी आज केवल कागजों में इतिहास लिखने कि स्थिति में हो गयी है।

तालघाटी में तालेश्वर महादेव वैसे पौराणिक स्थलों में से एक है, लेकिन मंदिर की स्थापना 1989 में की गई, पुनः 2002- 03 में इसका जीर्णोद्धार किया गया। 2017- 18 ,में तालेश्वर महादेव ट्रस्ट से जुड़े क्षेत्रीय लोगो ने इसे भव्य मंदिर का स्वरूप दिया। आने वाले समय मे यह मंदिर प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसीत हो सकता है।

वर्तमान की बात की जाय तो पूरी तालघाटी में एक मात्र जूनियर हाईस्कूल तालबाॅदणी है, और गंगाभोगपुर और दिवोगी प्राथमिक विद्यालय छात्र संख्या शून्ह होने के कारण बंद हो चुके हैं, इसी तरह स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाय तो पूरे क्षेत्र के लिए ताल में एक एएनएम और एक फार्मासिस्ट की नियुक्ति की गयी लेकिन उनके बैठने के लिए एक एनएनम सेण्टर तक उपलब्ध नहीं है। सड़क की बात की जाय तो तालघाटी में 8 माह तक ही कच्ची सड़क से आना जाना होता है, और बरसात के चार माह में पूरी तालघाटी का सम्पर्क अन्य क्षेत्रों से टूट जाता है। धारकोट जुलेड़ी मोटर मार्ग और कांडाखाल खैराणा मोटर मार्ग बने भी लेकिन वह अधूरे निर्मित होने के कारण त्रिशंकु की स्थिति में लटके हुए है। जिस जगह कण्डरह और ताल मंण्डी गुलजार होती थी आज वहाॅ कोई दुकान नहीं होने से स्थानीय लोगों को पैदल 7 किलोमीटर चढाई चढने के बाद कांडाखाल जाना पड़ता है।

इस तरह से तालघाटी 1951 से 1995 तक अपने स्वर्णीम काल में थी लेकिन स्थानीय जागरूकता के अभाव और पलायन के दीमक ने पिछले 25 सालों में इस क्षेत्र को वीरान बना दिया है, यदि इस क्षेत्र का विकास नहीं होता है तो आगे आने वाले 15-20 सालों में तालघाटी इतिहास के पन्नों में सिमट कर ना रह जाय।

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