Sunday, July 21, 2024
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मैं बारात से एक रोटी जेब में रख कर घर ले आया।

(जगमोहन रौतेला की कलम से)

कल रात एक शादी में गया था । खाना खाने के बाद एक रोटी प्लेट में बच गई । वैसे मैं घर हो , चाहे बाहर इस बात का विशेष ध्यान रखता हूँ कि थाली में खाना बिल्कुल भी न बचे । भले ही थोड़ा कम खा लो , पर खाने का एक कौर भी बर्बाद न हो । उस बची हुई रोटी को जैसे – तैसे खा लेने के बारे में भी सोचा । पर खाने की हिम्मत नहीं हुई ।

खुद पर बहुत गुस्सा भी आया कि एक रोटी ज्यादा प्लेट में कैसे रख ली ? कुछ देर तक प्लेट को हाथ में पकड़े यूँ ही खड़ा रहा । एक बार को सोचा कि सभी तो खाना बर्बाद कर ही रहे हैं , आज एक रोटी मेरी ओर से भी कूड़ेदान में चली जाय तो क्या फर्क पड़ता है ? पर मन था कि मान ही नहीं रहा था । मन के किसी एक कोने से यह आवाज भी आ रही थी कि तुम ऐसा कैसे कर सकते हो ? दूसरों के बहाने से आज एक रोटी बर्बाद की , कल फिर ऐसा ही हो गया तो फिर रोटी , चावल , सब्जी सब कुछ बर्बाद करोगे । यह सिलसिला ही चल पड़ा तो ?

मन के अन्दर की इस आवाज के साथ ही वैसे भी रोटी की प्लेट को कूड़ेदान में रख देने की हिम्मत नहीं हो रही थी । मन में इसको लेकर अपराधबोध अलग से था । इस अपराधबोध के बीच मन ने कहा कि इस रोटी को बर्बाद होने से बचाने का एक ही तरीका है कि इसे जेब के हवाले करो और घर ले जाओ । इस सोच के साथ ही यह भी ख्याल आया कि लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे ? कोई कुछ कहेगा नहीं , यह तो मुझे मालूम था । जेब में रखकर रोटी घर ले जाऊँ कि नहीं ? इसको लेकर भी मन में कुछ मिनट तक उधेड़बुन चलती रही । इस दौरान बुलबुल की ईजा ने भी मुझे रोटी की प्लेट को हाथ में थामे देख लिया था और पूछा था कि आज रोटी कैसे बच गई ? मैंने कहा कि बच गई बस अब क्या करूँ ? उसने बिल्कुल सामान्य ढंग से कहा कि नैपकिन में लपेटो और जेब में रख लो और क्या करोगे ? बर्बाद कर नहीं सकते तो और क्या उपाय है ?

बुलबुल की ईजा के यह कहने के बाद अन्त में मन के अपराधबोध की विजय हुई और मैंने बुलबुल की ईजा से नैपकिन लाने को कहा । नैपकिन हाथ में आते ही मैंने भी रोटी उसमें लपेटी और जेब के हवाले कर दी । आज सुबह नाश्ते में जब वह रोटी मेरे पेट में गई तब मन को शान्ति हुई और मैं रोटी की बर्बादी के अपराध बोध से मुक्त हुआ । शादी – ब्याह में बहुत बढ़िया कपड़े पहने हुए , हमेशा समाज में अच्छी – अच्छी बातें करने वालों और बहुत ज्यादा पढ़े – लिखो को जब अन्न की बर्बादी करते हुए देखता हूँ तो मन में बहुत पीड़ा होती है । मेरा अनुमान है कि एक बारात में कम से कम 50 लोगों के एक समय के भोजन की बर्बादी तो होती ही होती है । बारात के मेहमानों के हिसाब से अन्न की बर्बादी का यह ऑकड़ा बढ़ ही जाता है , कम नहीं होता।

खाना स्वाद में ठीक न लगने पर फैंकने से अच्छा है कि आप वही भोजन अपनी प्लेट में लें , जो आप नियमित तौर पर खाते हैं । पहली बार में थोड़ा सा ही लें , ताकि बेस्वाद लगने पर फैंकने की नौबत न आए । अच्छा लगने पर फिर से ले लेने का विकल्प तो आपके पास हमेशा मौजूद है । केवल लोगों की भीड़ देखकर एक बार में ही प्लेट में हर तरह के व्यंजनों का ढेर न लगा लें । इससे भी खाने का स्वाद बिगड़ जाता है और एक भरी हुई प्लेट फिर चुपके से कूड़ेदान के हवाले हो जाती है । मैंने देखा है कि बहुत लोग घर में भी खाना बर्बाद करते हैं । होटल और रेस्टोरेंट में भी खाना बर्बाद करना बहुत सारे लोगों का स्टेटस सिम्बल है । गॉव में बर्बाद खाना पालतू मवेशियों के काम आ तो जाता है , पर उससे खाना बर्बाद करने की एक बुरी आदत पड़ जाती है । जो हमेशा साथ रहती है । शहरों में विवाह , रेस्टोरेंट व घर में बर्बाद होने वाला खाना कूड़ेदान के हवाले ही होता है।

अक्सर कूड़ेदान में फफूँद लगी रोटी , आटा , चावल , दाल दिखाई दे जाता है । बर्बाद किया हुआ भोजन सैकड़ों , हजारों भूखे पेट सोने वालों का पेट भर सकता है ।
जिसका पेट भरा होता है , उसे भूख के कारण ऐंठती अतड़ियों व उससे होवे वाले दर्द का अहसास तक नहीं होता । व्रत व उपवास के नाम पर नहीं , कभी एक दिन यूँ ही भूखा रहकर देखिए । अन्न की कीमत पता चल जाएगी । तो ध्यान रखें कि अन्न की बर्बादी का अपराध न करें । न घर में , न किसी समारोह में , न होटल में और न किसी ढाबे – रेस्टोरेंट में । किसी सरकारी आयोजन में भी अन्न की बर्बादी हो रही हो तो सामुहिक तौर पर उसके खिलाफ भी आवाज बुलन्द करें । ध्यान रखें कि भूखमरी के मामले में भारत पाकिस्तान व बांग्लादेश से आगे निकल गया है ।

आप पैसे से अन्न तो खरीद सकते हैं , पर उस पैसे से अन्न पैदा नहीं कर सकते हैं । सब्जियों और अन्न ( गेहूँ , चावल ) को तैयार होने में एक महीने से लेकर छह महीने तक लगते हैं । आप चाहे लाखों , करोड़ों रुपया खर्च कर दें , पर एक मिनट , एक घंटे और एक दिन में भी मात्र 100 ग्राम अन्न तक उन रुपयों से पैदा नहीं कर सकते । वह पैदा होगा से एक महीने से लेकर छह महीने बाद ही । और हम हैं कि अपने स्वाद के लिए उसे बर्बाद करने में एक मिनट भी नहीं लगाते हैं । अगर हम अन्न बर्बाद करते हैं तो फिर हमारी सारी योग्यताएँ किसी काम की नहीं हैं , वह कूड़ेदान की तरह ही है ।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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