Thursday, February 29, 2024
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बड़कोट डायरी..भाग – 2! पौराणिक मंदिरों से जुड़ी है बड़कोट की सभ्यता।

(विजयपाल सिंह रावत)

यमुना नदी घाटी में हिमालय के अंतिम छोर पर बसा यह शहर कभी धन धान्य से संपन्न गांव था। जिसके लहलहाते धान के खेतों के बीच इकलौता खूबसूरत पौराणिक शिव मंदिर था। जो आज चारों तरफ से मानव बस्ती से घिर कर शहर के बीचो-बीच आ गया है। जब शहर में पेयजल की कोई सरकारी योजना नहीं थी तब इसी शिव मंदिर के प्रांगण में बने कुऐं से पेयजल की आपूर्ति की जाती थी। जो लंबे समय तक यथावत जारी रही। जो अब नवनिर्माण से लुप्तप्राय हो चुका है।

पुराने बाजार में शिवमंदिर से थोड़ा ऊपर बड़कोट की अधिष्ठात्री मां भगवती का पुराना मंदिर है। आज भी यहां पारंपरिक विधि विधान से इस शक्ति पीठ की नियमित पूजा अर्चना होती है। इसी के ठीक बगल में स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर इन दोनों मंदिरों की भांति पौराणिक महत्व का धार्मिक स्थल हैं। यमुनोत्री धाम के तीर्थ यात्रियों के लिए ये मंदिर प्राचीन काल से निशुल्क रात्रि विश्राम के मुख्य पड़ाव थे। इन मंदिरों का निर्माण पौराणिक काष्ठ कला की अदभुत कारीगरी से किया गया था। जो अब लगभग जीर्ण-शीर्ण हालत में नव निर्माण से परिवर्तित हो चुके हैं। जितने ये मंदिर पुराने हैं लगभग उतनी ही पुरानी बड़कोट गांव की सभ्यता है। शहर के बीचो-बीच मौजूद नत्थू मौहाला इसी शिवालय के उपासक नाथ संप्रदाय के लोगों की बस्ती थी।

बड़कोट को कुंड नगरी भी कहा जाता था। बड़कोट गांव में गढ़ के पास एक पौराणिक विशालकाय जल कुंड है। जो अब लगभग सूख चुका है। मान्यता है की इस जल कुंड का निर्माण राजा सहस्रबाहु ने कराया था। सूखा पड़ने पर इस जल कुंड में सामूहिक पूजा अर्चना से इस क्षेत्र में वर्षा होती थी। इस कुंड को दुर्घटना और कूड़ा करकट से बचाने के लिए एहतियातन लोहे की जालीयों से ढ़का गया है। इस कुंड को नगरपालिका ने बहुत पहले ही एक खूबसूरत पार्क का स्वरूप दे दिया था। लेकिन फिर भी बड़कोट में आने वाले अधिकांश पर्यटकों को शायद इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसे छोटे बड़े 365 जल कुंडों के होने का जिक्र बड़कोट के पौराणिक इतिहास में है। जो अधिकांशतः भूमि के गर्भ में लुप्तप्राय हैं। ऐसा ही एक छोटा से जल कुंड राजकीय इंटर कालेज बड़कोट में भी मौजूद है, जो लगभग सूख चुका है कभी यह कुंड भी जल आपूर्ति का प्रमुख स्रोत था। ऐसे ही दो कुंड तकरीबन 15 वर्ष पूर्व डोभाल आरामशीन में खुदायी के दौरान निकले। यह आरा मशीन सबसे पहले बड़कोट गांव के राणा लोगों की थी जो बाद में खरसाली के पंडित उनियालों ने खरीदी बाद में रमेश अग्रवाल लाला को बेची गयी और फिर उनसे डोभाल जी ने खरीदी।

आज शिक्षा की मजबूत बुनियादी सुविधाओं का यह शहर कभी पूरी रंवाई की भांति सिर्फ राजगढ़ी पर निर्भर था। जहां टिहरी रियासत द्वारा पूरी रंवाई घाटी का एक मात्र प्राथमिक स्कूल था। जिसकी पांचवी कक्षा की परीक्षा के लिए पुरानी टिहरी जाना पड़ता था। बड़कोट गांव के ग्रामीणों ने जागरूक हो कर शिक्षा और अस्पताल तथा राजकीय कार्यालयों के लिए खुले दिल से जमीनें दान दी। कंसेरू के स्वतंत्रता सेनानी परिवार के जोत सिंह रंवाल्टा जी ने 80 के दशक में उत्तर प्रदेश के बड़े औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानो में शुमार एक केंद्र बड़कोट में खुलवाया था। डायट, कन्या इंटर कालेज, डिग्री कालेज, पोलीटेक्नीक संस्थान और अनेकों प्राईवेट स्कूलों ने इस क्षेत्र से शिक्षा के पलायन को बड़े स्तर पर रोक रखा है। आज रंवाई का जनमानस यहाँ मेडिकल कॉलेज, इंजीनियर काॅलेज और विश्वविद्यालय कैंपस स्थापित करने की तरफ तेजी से अग्रसर है।

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