Monday, June 24, 2024
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प्रीतम-पुरोहित की जुगलबंदी लूट ले गयी ढोल सागर का पूरा मजा!

(मनोज इष्टवाल)

जो दो फनकार एक विधा के मर्मज्ञ ज्ञाता हों और उनके मध्य जुगलबंदी शुरू हो जाय तो वह सचमुच अद्भुत होती है! आज क्षणिक ही सही लेकिन प्रीतम-पुरोहित की इस जुगलबंदी ने 12 जून 1999 पौड़ी प्रेक्षागृह में गढ़कला सांस्कृतिक संस्थान द्वारा आयोजित लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी व जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा की उस जुगलबंदी की याद दिला दी जिसने गढ़वाल-कुमाऊं को करीब लाने के लिए एक सेतु का काम किया!

तब मैं गढ़कला सांस्कृतिक संस्थान का सह सांस्कृतिक सचिव कुछ काल के लिए बना था इसलिए मुझे आज भी गिर्दा का वह अंदाजे बयाँ याद है जब उन्होंने हिमालय से अपनी कविता शुरू की व उसकी रौ में सबको आत्ममुग्ध कर दिया! उनकी कविता “म्यार हिमाला” व लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी का गीत “भोळ जब फिर रात खुलली, धरती म नई पौध जमली! मित नि रौलू म्यारा भुलों तुम दगड़ी यु गीत राला” ने सम्पूर्ण प्रेक्षागृह तालियों से गुंजायमान रखा! तब मैं लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी जी की माँ जी को बेहद गौर से देख रहा था उनके चेहरे पर तैरते भावों को नापने की कोशिश कर रहा था लेकिन माँ भला कितना सब्र करती! आंसू न भी पलकों तक आयें हों लेकिन जो दिल की हूक थी वह बेटे के शब्दों की बयानगी का आभास करने कराने को काफी था!

आज वही कुछ इत्तेफाकन तब हुआ जब संस्कृति विभाग उत्तराखंड सरकार द्वारा आयोजित “साहित्य सम्मेलन” के दूसरे चरण में “ढोल ढोली और ढोल सागर” बिषय पर अपना उद्बोधन समाप्त कर वापस लौट रहे जागर सम्राट पद्मश्री प्रीतम भरतवाण अचानक ढोल सागर पर बर्षों से काम कर रहे मंचासीन डॉ. डी.आर. पुरोहित से बोले- सर, आप प्रश्न कीजिये ! एक छोटी सी जुगलबंदी सही! बस फिर क्या था आवजी गुनिजन व ब्रह्म में संवाद शुरू हो गया! पार्वती उवाच की भूमिका निभाते हुए डॉ. पुरोहित ने दांये कान पर हाथ रखा व बोले पड़े- अरे आवजी, प्र्थमें अंगुली कौन शब्द बाजंती? द्वितीये अंगुली कौन शब्द बाजनती, तृतीये अंगुली कौन शब्द बाजंती, चतुर्थे अंगुली कौन शब्द बाजंती! बोली जा आवजी पंचमें अंगूली कौन शब्द बाजंती!

बस फिर क्या था पद्मश्री प्रीतम भरतवाण ने अपना बाँयां हाथ कान पर रखा और बोले- हे आवजी, प्रथम अंगुलीन टंक टंकार बजण बैठी गये, दूसरी अंगुली कृत धुनी बजण बैठी ग्ये, तीसरी अंगुली पंचार बजण बैठी ग्ये, चौथी अंगुलीन देवसार बजण बैठी ग्ये और पांचवी अंगुली म त्रिलोक थमण बैठीग्ये! हे ब्रह्मा प्रणाम करदो! (अरे आवजी प्रथमे अंगुली ब्रण बाजंती, दूसरी अंगुली मूल बाजंती, तृतीय अंगुली अबदी बाजंती, चौथी अंगुली ठन-ठन करती! झपटी-झपटी बाजंती अन्गुष्ठिका! )

डॉ. पुरोहित (इश्अवरोवाच) अरे आवजी -कहो , ढोल ढोली का मूल कहाँ! ढोली ढोल को कौन शाखा! कहाँ ढोली ढोल का पेट! कहाँ ढोली ढोल का आँखा! प्रीतम भरतवाण- (श्री पार्वत्युवाच)- अरे ब्रह्म, ढोली ढोल का मूल पश्चिम, ढोली ढोल की शाखा दक्षिण, ढोली ढोल का पेट पूरव! ढोली ढोल का आँखा!!

यह सम्मोहन अभी शुरू ही हुआ था कि जुगलबंदी की यह शानदार कला जागर सम्राट प्रीतम सिंह द्वारा रोकनी पड़ी क्योंकि समय पहले ही बहुत अधिक हो गया था! अहा….काश यह ललक फिर कभी पूरी हो पाती जब ये दोनों ज्ञाता ऐसी ही जुगलबंदी पर साथ खड़े दिखाई देते!

मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मैंने भारत, भगनौळ, पंडवाणी, गाथा इत्यादि बचपन में अपने पिता से व अब पूरे उत्तराखंड के कई गुनिजनों के मुंह से सुनी हैं तब यह आभास नहीं था कि यह सब ढोल सागर के ही समाहित अंश हैं और जब ये शुरू होते हैं तो समाप्त होने का नाम नहीं लेते! इसीलिए ढोल सागर के ज्ञाता को अभी भी अधूरा ही कहा जाता है! बस कशिश यह रही कि दमौ सागर पर कोई चर्चा नहीं हुई क्योंकि बिना दमाऊ के आप न कांसा बजा सकते न जंक और न वेद कुरपाण या फिर छागळ! दमाऊ सागर पर सिर्फ एक भी व्यक्ति द्वारा आज तक काम हुआ है जिनका नाम प्रेम लाल भट्ट है!

उम्मीद की जा सकती है कि संस्कृति विभाग आगामी समय में ऐसा ही सम्मेलन पुन: आयोजित करेगा ताकि ऐसे अप्रितम लोक की जानकारी हमें प्रीतम-पुरोहित जैसे ज्ञान पुंजों से मिलता रहे! यह सचमुच अद्भुत था!

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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