Wednesday, June 19, 2024
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देवजानी….जहाँ दानवीर कर्ण से मायाबी शक्तियों में हारे महासू! आज भी लगता है जीवाणु में गेंद का मेला!

(मनोज इष्टवाल ट्रेवलाग 17 जून 2019)

सचमुच तमसा, टोंस अथवा कर्मनाशा घाटी का बावर व रवाई पर्वत क्षेत्र जहाँ विभिन्न आलौकिक वादियों, घाटियों, बुग्यालों, पर्वत श्रृंखलाओं व नदियों, प्रकृति व जलवायु के लिए पूरे प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश व विदेश में भी प्रसिद्ध है वहीँ यहाँ का समाज अलग-अलग देवी देवताओं का अनुशरणकर्ता भी है! इस घाटी में चार महासू, उनकी माँ देवलाडी का प्रभुत्व जहाँ मोरी क्षेत्र के केदारगंगा से लेकर मीनस, कोटि-इच्छाडी होता हुआ तमसा नदी के कालसी नामक स्थान पर यमुना मिलन तक व कालसी से लेकर कट्टापत्थर, नैनबाग़, डामटा, लाखामंडल क्षेत्र से कटता हुआ सारे जौनसार बावर क्षेत्र में है वहीँ केदार गंगा पार मोरी से लेकर देवजानी, केदारकांठा कोटि –देवरा तक पूरा साम्राज्य दानवीर कर्ण, रुपिन-सुपिन संगम पर स्थित नैटवाड़ क्षेत्र में फोखु देवता व उससे आगे हिमाचल आराकोट क्षेत्र व सम्पूर्ण रुपिन सुपिन घाटी व पर्वत क्षेत्र में समोसू, सोमेश्वर, समसू या फिर कालान्तर में द्रयोधन नाम से प्रसिद्ध देवता व अन्य वीरों का क्षेत्र माना जाता रहा है!

देवजानी…यानि देवता ही जाने? या फिर देवताओं का निवास स्थल! इसकी गहराई में जाने के लिए हिमालयन दिग्दर्शन टीम व पलायन एक चिंतन के संयोजक ठाकुर रतन सिंह असवाल, देहरादून डिस्कवर के सम्पादक दिनेश कंडवाल के साथ मिलकर जब इस तथ्य को उजागर करने की मैंने कोशिश की तब कहानी का नया ही रूप सामने आया! जहाँ लोक मान्यताओं के आधार पर कहा जाता है कि पहले हनोल क्षेत्र बिष्णु भगवान् का था जिसे महासू देवता ने रेत को सोने में तब्दील कर यह क्षेत्र बिष्णु से मायाबी तरीके से छीन लिया अब वैसी ही कहानी देवजानी की भी सामने आई जब पता चलता है कि दानवीर कर्ण ने यहाँ वही महासू का परपंच रच महासू से यह क्षेत्र जीत लिया था!

रात्री बिश्राम को देवजानी गाँव के परसुराम सिंह पंवार के आवास में आतिथ्य ग्रहण कर रही हमारी टीम अभी भोजन से निबटी ही थी कि उन्हीं के दामाद अनिल पंवार जोकि इस क्षेत्र के समाजसेवी भी कहे जाते हैं व उनका गाँव यहाँ से लगभग तीन किमी. दूरी पर स्थित (खेडमी गाँव) है ने इस सम्बन्ध में अपनी जानकारी के आधार पर जो बताया वह अद्भुत अनुभव जैसा था! अनिल पंवार बताते हैं कि उन्होंने जो जागरों व अपने पुरानों से कफुआ गायन में कर्ण महाराज के देवजानी आने का वर्णन सुना उसके आधार पर यह ज्ञात होता है कि यहाँ के लोग महासू महाराज के बाजगी के कोपभाजन के शिकार थे व कई विपत्तियाँ झेल रहे थे! महासू के बाजगी दयाल के कारण जब यहाँ की एक महिला बहुत ज्यादा परेशान रही तब उसने गाँव की ही सुरोड़ा नामक व्यक्ति को अपनी दास्ताँ सुनाई!  ऐसे में देवजानी सुरोडा ने देवरा जाकर कर्ण महाराज के दरवार में अपनी अर्ज दाखिल की! वे रात भर कंडाली (यानि बिच्छु घास) व काँटों के बिस्तर में कर्ण महाराज के द्वार के बाहर लेटे रहे आखिर कर्ण महाराज ने फ़रियाद सुनी और उन्होंने उन्हें आश्वस्त किया कि वे जल्दी ही देवजानी आयेंगे!

उस काल में इस गाँव का नाम देवजानी था भी कि नहीं यह कहना सम्भव नहीं है लेकिन ग्रामीण इसका नाम औरा गाँव के नाम से पुकारते हैं! गाँव लौटकर जब उसने अपने गाँव के ग्रामीणों को यह सब बताया और उन्होंने पूछा कि कर्ण महाराज कब यहाँ आयेंगे तब उनके मुंह से एक ही शब्द फूटा – देवजाने? कहते हैं तभी से इस गाँव का नाम देवजानी पड़ गया है! वहीँ कर्ण महाराज अपने रथ पर सवार देवरा से गडूगाड़ यानि केदारगंगा के रास्ते आने की जगह सीधे केदारकांठा पहुंचे, वहां से होते हुए वे जब औरणी थाच आये तो वहां घास काट रही महिलायें नाचने लगी! और तो और घर, आँगन, मकान व गाय-बच्छियां सब नाचने लगी! गाँव वालों को औराणी थाच से कर्ण महाराज के वीर खंडासुर ने आवाज लगाईं कि मैं पहुँच गया हूँ अब तुम्हे चिंता करने की जरूरत नहीं है! ग्रामीण ख़ुशी से झूम उठे व जिसके पास चांदी का जो जेवर था उसे पिघलाकर उन्होंने कर्ण महाराज की धौंस (ढोल/डमरू/हुडका/डौंर) बनाई! जिसे उनके स्वागत में बजाया गया!

धौंस की आवाज सुनकर महासू देवता की तंद्रा टूटी और उनके गण औरा(देवजानी) आ पहुंचे! कर्ण महाराज ने उनके माध्यम से महासू को सन्देश भिजवाया कि अब यह क्षेत्र मेरा हुआ इसलिए अपने गणों को यहाँ उत्पात मचाने भेजने की कोशिश नहीं करना! महासू को कर्ण की यह चुनौती नागवार गुजरी और वह खरसाड़ी नामक स्थान पर पहुंचकर कर्ण को ललकार लगाते हैं कि मुझे तेरी चुनौती मंजूर है लेकिन युद्ध की जगह सोना तोलकर यह क्षेत्र ले ले! दोनों पक्षों में आपसी मंजूरी हुई और एक नियत दिन तय हुआ कि मकरसंक्राति के दिन यह प्रस्तिस्पर्दा रखी जायेगी!

इधर कर्ण जानते थे कि महासू कि महासू मायाबी शक्तियों का ज्ञाता है अत; ऐसे में उन्होंने सूर्यदेव अर्चना की! सूर्यदेव प्रकट हुए और उन्होंने कहा तुम रेत उड़ाना मैं उसमें इतना ओज डाल दूंगा कि वह सोना लगे व जब महासू सोना तोले तो मैं उसमें इतनी नमी भर दूंगा कि वह पीतल हो जाय! दानवीर कर्ण ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे सांद्रा के पास तमसा नदी के रिंगदा पानी (घूमते पानी) के ढोल से रेता निकाल लायें! प्रस्तिस्पर्दा शुरू हुई और महासू ने अपने अकूत स्वर्ण भण्डार को लाकर समुख रख दिया जबकि उसके समुख कर्ण ने रेत का पहाड़ खड़ा कर दिया! जांचने वाले देव गणों ने पाया कि महासू ने स्वर्ण की जगह पीतल रखा है जबकि कर्ण का रेत उन्हें शुद्ध सोना दिखा! इस तरह महासू को अपनी पराजय स्वीकार करनी पड़ी व यह सम्पूर्ण घाटी कर्ण महाराज की हुई तब से इसका नाम देवजानी हुआ! और तभी से यहाँ के ग्रामीण यहाँ हर बर्ष गेंद मेला आयोजित करते हैं! जिसमें खेड़मी की पंवार जाति जिसे सांठी खूंद (कौरवी खूंद) कहा जाता है यहाँ यह गीत गाते हुए आते हैं:-

भुमलो नाची औरा सिंग्तूर भुमलो नाची-2

कोद पाचियो कोदारी, सेरी गोद पाची-2

मन लग तेरो सुतुन्यीया पार, मन लगले-2!!

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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