Thursday, February 29, 2024
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थौडे-मडे के नाम से भी प्रसिद्ध है जौनसार-बावर का पांडवकालीन लाखामंडल ….! थौडे – मडे यानि मृत्यु के बाद पुनर्जीवन का एक बेहद कटु सत्य !

(मनोज इष्टवाल)

ढ़ोल सागर की गहराइयों में उतरना हर किसी के वश की बात नही क्योंकि उसकी हर थाप पर जीवन मृत्यु के बोल संरक्षित हैं ! ढोल से निकलने वाले बोलों में पृथ्वी जल थल नव मंडल तारामंडल पातळ लोक सभी की समस्त गतिविधियों के स्रोत छिपे हैं! आपरुपी ढोल को साक्षात शिब माना गया है!

ढोल की गद्द लगी पूड़ा में जहाँ शिब समाये हैं वहीँ बिना गद्द की पूड़ा में माँ पार्वती समाई बतायी गयी हैं! इसी लिए ढोली जब भी अंगुली से ढोल की पूड़ा में घुर्र देता है तो वह गजबल पूडा यानी राळ (गद्द) चढ़ी पूड़ा होती है और उसकी घुर्र के सुर्र से ॐ शब्द की बारम्बार आवृत्ति होती है! हम तब सोचते हैं क्या ढोल वादक है गजबल (लाकुंड) के साथ घुर्र देने में भी महारथी लेकिन यह बहुत कम जानते हैं कि यह प्रयोग ढोल में शिब के आभास करवाने के लिए प्रयुक्त पल होता है!

ढोल की विभिन्न विधा पर जब बात चली तब गढ़ बैराट अखबार के सम्पादक भारत सिंह चौहान, समाज सेवी दर्शन डोभाल व एक अन्य मित्र इसी पर चर्चा कर रहे थे कि ढोल में कितना दम है और किस तरह ढोल के बोल सुनाकर मृत व्यक्ति को पुन: कुछ पल के लिए तोड़े-मोड़े में जीवित किया जाता है! थौडे-मडे शब्द जौनसार बावर के लोगों के लिए एक अच्छा शब्द प्रयोग नहीं समझा जाता है लोग इस शब्द को गाली के रूप में भी प्रयोग में लाते रहे हैं!

इस क्षेत्र पर शोध करते समय मुझे इस शब्द की बृहदता का आभास हुआ, मैं लाखामंडल के उस स्थान पर भी गया जिस स्थान को बिशेषत: थौडे-मडे जिन्होंने स्थानीय भाषा में धोडे-मोड़े उच्चारित किया जाता है! यह वह स्थान है जहाँ मुर्दे को लाकर रख दिया जाता था और इन्तजार किया जाता था कि कोई ऐसा निकट सम्बन्धी तो नहीं रह गया जिसे मृत्यु से पूर्व वह व्यक्ति देख न पाया हो व उसे देखने की उस मुर्दे की लालसा हो ? अगर ऐसा होता था तब उस व्यक्ति को तोड़े मोड़े में मुर्दे के समीप लाकर खड़ा किया जाता था और धूमसू वाद ध्वनि जिसे ये लोक कलाकार बजा रहे हैं कि ही एक अनोखी वाद शैली में एकहरा ढोल बजाया जाता था जिसकी एकहरी तान व गमक होती थी! इकहरे ढोल का मतलब एक ढोल से नहीं बल्कि एकहरी ताल से मतलब है जो मृत आत्मा में पुन: प्राण फूंक डालते हैं! ऐसा हाल ही के कुछ बर्ष पूर्व तक इस क्षेत्र के बाजगियों में प्रचलन था और वे कुछ पल के लिए मृत व्यक्ति के प्राणों में जान फूंक लेते थे! व्यक्ति कुछ पल के लिए जीवित होकर उन लोगों को देख लेता था जो उसके प्रिय हों और प्रिय लोग भी उस व्यक्ति की मुख जातरा कर लेते थे! ऐसे में मृत व्यक्ति के मन की लालसा भी समाप्त हो जाती थी व उसकी आत्मा प्रेत बनकर भी नहीं भटकती थी!

दुर्भाग्य से वर्तमान में बाजगियों की इस बिसात को बचाने में ये लोग कामयाब नहीं हो पाए क्योंकि आर्थिक पक्ष कमजोर होने के कारण बाजगियों (ढोल वादकों) की नई पीढ़ी ने ढोल सागर की लय ताल याद रखने की जगह ध्याड़ी मजदूरी कर जीवन यापन करना उचित समझा ताकि उनके बच्चे मुख्य धारा से जुड़ सके! आज जब समाज में चेतना आई व हम जैसे अनगिनत लोग ढोली के ढोल सागर को जानने समझने निकलते हैं तब बहुत देर हो चुकी है ! अब न वो ढोली ही दीखते हैं न लिपिवध ढोल सागर ही.! भले ही आज ऐसे ढोली की कीमत बेशकीमती हो लेकिन पारंगतता के वे हाथ कहाँ से लायें जिनके गजबल की चोट से पृथ्वी गुंजायमान होती थी जिनके मुख से फूटने वाले बोलों से यमराज का आसन डोलने लगता था! आज यह सब तो नहीं रहा लेकिन थौडे-मडे यानि लाखामंडल इतिहास के रूप में हमारे समुख ज्यों का त्यों खड़ा है! बस आश्वयकता है तो एक वृहद् शोध की जो आज भी इस अनूठी परम्परा को जीवित करने वाले औजी, बाजगी, ढाकी समाज के उन कलावन्तों को ढूंढ सके जिन्हें हम हेय दृष्टि से देखते रहे और वे हमारी ज्यादतियों की वजह से इस पृथ्वी की संरचना के शब्दों वाले ढोल की लय, ताल, छन्द व जागरों से आये दिन दूर होते चले गए और मैदानों में जाकर उनके वंशज अपनी दिनचर्या के लिए हर मशक्कत करते रहे ताकि उनकी आस-औलाद भी आने वाले समय में समाज की मुख्य धारा में शिक्षित समाज के नाम से जानी जा सके!

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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