Tuesday, March 5, 2024
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गेंद मेला…! जहां बकरे की होती थी जूतों से पीटकर विदाई। ब्रिटिश काल में सात खून थे माफ।

(मनोज इष्टवाल)

इसे राजपूताना जोश कहें या राजस्थान के उदयपुर अजमेर से औरंगजेब के काल में गढ़वाल बसे उन राजस्थानी ठाकुरों की विरासत जो अपनी लोकसंस्कृति लेकर आज भी उसे संजोए हुए है। या फिर रग्बी खेलने वाले जॉर्जिया, वेल्स, मेडागास्कर, न्यूज़ीलैण्ड से यहां के लोगों को जोड़ दिया जाय! क्योंकि वो भी ठेठ गिन्दी के मेले की जैसी ही गेंद से लगभग वैसे ही छीना झपटी करते हैं जैसे यमकेश्वर व दुगड्डा विकास खण्ड के विभिन्न स्थलों पर जुटने वाले गिन्दी के मेलों में दो धड़े।

विदेश में इस टीम के सदस्यों की संख्या होती है लेकिन यहां कोई संख्या नहीं होती। ब्रिटिश काल में थल नदी का गेंद का मेला सबसे बड़ा माना जाता था जहां उस दौर में गेंद झपटने व अपने पास रखने के चक्कर में कई बार वह व्यक्ति इतने लोगों के नीचे दब जाता था कि उसकी मौत तक हो जाती थी। वर्तमान में भले ही इसका स्वरूप बदला हो लेकिन अब इस मेले में कई दफा ऐसा देखने को या सुनने को भी मिलता है कि कई तो मेले के बहाने अपनी खुंदक मिटा लेते हैं।

उत्तराखण्ड के  पौड़ी गढ़वाल के यमकेश्वर व दुगड्डा व द्वारीखाल ब्लाक के कुछ स्थानों में मकरसंक्रांति को यह  अनोखा खेल खेला जाता है जिसे स्थानीय भाषा में गिन्दी मेला और हिंदी में गेंद का मेला कहा जाता है। यह एक सामूहिक शक्ति परीक्षण का मेला है जिसमें पूर्व में दो धड़े बनते थे जिसमें एक तरफ अविवाहित युवा तथा दूसरी ओर विवाहित पुरुष होते थे। अब भी कहीं कहीं इसका प्रारूप यही ही। इस  मेले की खासियत यह है कि इसमें न तो खिलाडियों की संख्या ही नियत होती है न इसमें कोई विशेष नियम होते हैं।

दो दल बना लिए जाते हैं जो चमड़े से मढ़ी एक गेंद को छीन कर कर दूसरे की सीमा से अपनी सीमा में ले जाएगा वही विजेता कहलायेगा।  यह सब कहने सुनने में जितना आसान लगता है  उतना नही है  क्योंकि दूसरे दल के खिलाड़ी आपको आसानी से गेंद नहीं ले जाने देंगे! बस इस बस इस गुत्थमगुत्था में गेंद वाला नीचे गिर जाता है जिसे गेन्द का पड़ना कहते है। गेन्द वाले से गेंद छीनने के प्रयास में उसके ऊपर न जाने कितने लोग चढ़ जाती हैं कुछ तो इसी बेहोश तक हो जाते हैं। बेहोशों को उठाकर बाहर ले जाया जाता है लेकिन वह फिर होश में आने के बाद बिना बताए फिर गेंद अपने पाले तक ले जाने के लिए तैयार होकर एक तरह के शक्ति प्रदर्शन के इस खेल में शामिल हो जाता है।

पूर्व में इस खेल को खिलवाने के लिए कोई रेफरी नहीं होता था क्योंकि यह हठ, अहम व आन बान शान से जुड़ा खेल माना जाता था लेकिन अब इसके कुछ नियमों में तब्दीली कर एक आध रेफरी की नियुक्ति भी कर दी जाती है ताकि यहां लोग आपसी बैमनस्य में एक दूसरे को हानि न पहुंचा सकें।
इस खेल में सबसे ज्यादा रोचक पहलू पर बात करते हुए ताल घाटी क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश कंडवाल बताते हैं कि इस बार के मेला आयोजन में उन्होंने इस बात का विरोध दर्ज किया है कि इसमें बकरे वाली पुरानी परंपरा को हटाकर विजेता टीम को उपहार स्वरूप कोई ट्रॉफी दी जानी चाहिए जैसे की अन्य जगह होने लगा है। 

आपको जानकार हैरानी होगी कि लोक संस्कृति व लोकसमाज से जुड़े छोटी विलायत क्षेत्र जोकि ताल-किमसार से दुगड्डा तक फैला है में गिन्दी मेले में जो टीम विजयी प्राप्त करती है उसे बदले में हारने वाली टीम को बकरा देना होता है। वह बकरा तो देते नहीं लेकिन उसकी कुगत करके।

शायद इस क्षेत्र के भी बहुत कम युवा यह जानते होंगे कि जो बकरा हारने वाली टीम जीतने वाली टीम को देती है वह बकरे को जूते, चप्पल मार-मारकर देते हैं। यह क्यों होता है या क्यों होता था यह जानना बाकी हैं क्योंकि यह परंपरा कई स्थानों पर बर्षों पूर्व हट गई है लेकिन अभी भी कई जगह जारी है।
ताजे चमड़े की बनाई जाने वाली इस अंडाकार गेंद को छीनने के लिए दोनों ही धड़े कई घण्टों तक मशक्कत करते है। इस प्रकार शक्तिपरीक्षण का यह अनोखा खेल 3 से 4 घन्टे तक चलने के पश्चात समाप्त हो जाता है।

कहा जाता है कि सर्व प्रथम इस खेल का प्रचलन विकासखण्ड यमकेश्वर, द्वारीखाल व दुगड्डा  की सीमा थलनदी नामक स्थान पर हुआ,  जहाँ मुगलकाल में राजस्थान के उदयपुर अजमेर से लोग आकर बसे है इसलिए यहाँ की पट्टियों(राजस्व क्षेत्र )के नाम भी उदेपुर वल्ला,उदेपुर मल्ला,उदेपुर तल्ला एवम उदेपुर पल्ला (यमकेश्वर ब्लाक) व अजमीर पट्टिया(दुगड्डा ब्लाक)हैं | थलनदी में यह खेल आज भी इन्हीं लोगो के बीच खेला जाता है। यमकेश्वर में यह किमसार, यमकेश्वर, त्योडों,ताल व कुनाव (सभी डाडा मंडल क्षेत्र) नामक स्थान पर खेला जाता है तथा द्वारीखाल में यह डाडामंडी व कटघर में खेला जाता है। 

कटघर में यह उदेपुर व ढांगू के लोगों  के बीच खेला जाता है। दुगड्डा में यह डाडा मंडी तथा  मवाकोट व किशनपुर  (कोटद्वार-बावर क्षेत्र ) में खेला जाता है! सिर्फ यहीं नहीं बल्कि इसे कल्जीखाल विकासखंड के बिलखेत से लगे क्षेत्र के माँ भुवनेश्वरी मन्दिर में भी प्रचलन में लाया गया है जबकि विकास खण्ड पौड़ी के परसुंडाखाल में भी यह इसी दिन लगता है। लेकिन यहां गेंद खेलने का प्रचलन शायद समाप्त हो गया है। 

ब्रिटिश काल में थल नदी में पट्टी उदेपुर / उदयपुर (तल्ला, मल्ला, वल्ला,पल्ला) यमकेश्वर विकास खंड व अजमीर पट्टी विकासखण्ड दुग्गड्डा के बीच खेला जाता था जो आज भी खेला जाता है व इसमें हजारों की संख्या में लोग जुटते हैं। 
दिनेश कंडवाल बताते हैं कि सिर्फ यही थलनदी का एक ऐसा मेला था जिसमें अंग्रेजों ने खेल के दौरान सात खून माफ किये थे व इस मेले को अंग्रेज बड़ी संख्या में देखने भी पहुंचते थे। दोनों ही धड़े महीनों से इस जुगत में लगे रहते थे कि कौन यौद्धा या पहलवान तरह का पुरुष वह अपनी टीम में शामिल करें को उनकी नाक ऊंची कर सके।

बहरहाल थलनदी डाडा मंडी में जुटने वाला यह ऐतिहासिक मेला वर्तमान की चकाचौंध चढ़ने लगा है व इनके अस्तित्व को खतरा बना हुआ है लेकिन काण्डी-कच्याली में यह मेला ठीक ठाक स्वरूप लेने लगा है वहीं ऋषिकेश से लगे क्षेत्र किमसार, ताल इत्यादि के लोग इस बर्ष भी इसे पूरे जोश-खरोस के साथ मनाने जा रहे हैं।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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