Saturday, July 13, 2024
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करवा चौथ पहाड़ चढ़ा! संकट में है संकट चौथ..!

(मनोज इष्टवाल)

फाइल फोटो सोशल साईट से अपडेट (महज एक ब्यंग्य)!

यह आश्चर्यजनक है क्योंकि पूरे प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र के जनमानस की मातृशक्ति आज (करवा चौथ) झुंडों में रंग-बिरंगे परिधानों में कीर्तन-भजन कर पूरे श्रृंगार के साथ करवा चौथ का व्रत मनाती हुई सोशल साईट पर अपडेट दिखी! यह यकीनन विस्मित करने वाली बात है क्योंकि अगर इन माँ बहनों को यह पूछा जाय कि करवा क्या है तो शायद ही इनमें से करवा चौथ के बारे में कोई कुछ बता पाए! जिस तरह वे करवा चौथ मनाती हुई दिखाई दे रही थी ऐसा प्रतीत हो रहा था कि आज करवा नहीं बल्कि संकट चौथ है जो पहाड़ी अंचलों में कभी बेहद धूम धाम के साथ मनाया जाता था व ग्रामीण महिलायें पुरुष सज-धज कर अपने निकटव्रती बाजारों में संकट चौथ का व्रत घूमने जाया करते थे! बेलपत्री के पत्ते चुनकर लाना व दिन भर व्रत रखना! मन बहलाने के लिए सामूहिक कीर्तन भजन कर निर्जला रहना यह संकट चौथ में अक्सर हुआ करता था! अब संकट चौथ कब आयेगा या कब आता है शायद ही किसी प्रवासी उत्तराखंड की पहाड़ी मूल की माँ बहन को याद हो! हां…करवा पर जो साज श्रृंगार की प्रस्तिस्पर्दा दिखाई दी उसने इतना तो बता दिया कि हम पूर्व से ज्यादा मालदार व वैभवशाली हो गए हैं लेकिन यह नहीं बताया कि करवा गुजरात, पंजाब और हरियाणा से उत्तर प्रदेश होता हुआ सीधे पहाड़ चढ़ गया जबकि पहाड़ का संकट चौथ हासिये पर आकर संकट में पड़ गया है!

देवभूमि के पर्व-धर्म और त्यौहारों की एक अनूठी छटा होती है! इसमें दिखावा कहीं दूर-दूर तक नहीं झलकता! महिलायें व्रत रखती हैं तो खेतों का काम हो या फिर घर का कार्य सभी ख़ुशी ख़ुशी निबटाती आई हैं! यहाँ के व्रत पूजन में ऐसा दिखावा दिखने को कभी नहीं मिला कि पडोसी ने 20 हजार की साडी या फिर तीन तोले की नथ पहनी है तो मैं भी इस से आगे बढूँ! क्योंकि हमारे उत्तराखंडी त्यौहार कभी आर्थिकी पर बोझ साबित नहीं हुए और न ही ऐसा कभी सुनने में आया कि पत्नियों की पूजा पद्वति के लिए समसामयिक हजारों रुपये का खर्च वहन करने से पारिवारिक आर्थिक संतुलन बिगड़ा हो!

कहते हैं हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती और यहाँ भी वही सब है. क्योंकि पहाड़ी समाज के ये लोक पर्व धार्मिक अनुष्ठानों को कभी आर्थिकी का बोझ देकर नहीं जाते अपितु निर्मल मन से बहुत शालीनता के साथ बिना प्रदर्शन के वह सब कर जाते हैं जो पारिवारिक शुकून और व्यक्तिगत मानसिक शान्ति के साथ रिधि-सिद्धि दे जाते हैं! संकट चौथ में मुख्यतः बिघ्न हरण गणपति की पूजा होती है लेकिन अर्घ चंद्रमा को अर्पित किया जाता है! यह बहुत कम लोग जानते हैं कि चन्द्रमा शीतलता का प्रतीक है और माँयें अपने बच्चों के लिए जहाँ चन्द्रमा से शीतल गुणों की मांग करती हैं, वहीँ रिधि-सिद्धि के दाता गणेश जी से पारिवारिक सुख शान्ति और सम्पत्ति की कामना करती हैं!

संकट चौथ को महिलायें यथा संभव श्रृंगार कर जहाँ अपने सुहाग की दीर्घायु व यशोबृद्धि के लिए भी मंगलकामनाएं करती हैं! गजाननं भूत गणादि सेवितं,कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्॥ माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकट चौथ का व्रत किया जाता है। इस दिन संकट हरण गणपति का पूजन होता है। इस दिन विद्या, बुद्धि, वारिधि गणेश तथा चंद्रमा की पूजा की जाती है। भालचंद्र गणेश की पूजा संकट चौथ को की जाती है। प्रात:काल नित्य क्रम से निवृत होकर षोड्शोपचार विधि से गणेश जी की पूजा की जाती है। यह व्रत स्त्रियां अपने संतान की दीर्घायु और सफलता के लिये करती है। इस व्रत के प्रभाव से संतान को रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है तथा उनके जीवन में आने वाली सभी विघ्न –बाधायें गणेश जी दूर कर देते हैं। इस दिन स्त्रियां पूरे दिन निर्जला व्रत रखती है और शाम को गणेश पूजन तथा चंद्रमा को अर्घ्य देने पश्चात् ही जल ग्रहण करती है।

संकट चौथ के दिन भर निर्जला व्रत के पश्चात सूर्यास्त के बाद स्नान कर के स्वच्छ वस्त्र पहन लें। अब विधिपूर्वक( अपने घरेलु परम्परा के अनुसार ) गणेश जी का पूजन करें । एक कलश में जल भर कर रखें । धूप-दीप अर्पित करें । नैवेद्य के रूप में तिल तथा गुड़ के बने हुए लड्डु, ईख, गंजी(शकरकंद), अमरूद, गुड़ तथा घी, बेल पत्री आदि अर्पित करें। पहाड़ों में बिशेषत: तिल व गुड के लड्डू बनाकर चन्द्रमा को अर्घ चढाने के बाद प्रसाद के रूप में वितरित किये जाते हैं वहीँ इसके वृहद् स्वरुप को अगर लेकर चलें तो इसकी पूजा विधि में यह नैवेद्य रात्रि भर बांस के बने हुए डलिया(टोकरी) से ढ़ंककर यथावत् रख दिया जाता है। पुत्रवती स्त्रियां पुत्र की सुख समृद्धि के लिये व्रत रखती है। इस ढ़ंके हुए नैवेद्य को पुत्र ही खोलता है तथा भाई बंधुओं में बांटता है। ऐसी मान्यता है कि इससे भाई-बंधुओं में आपसी प्रेम-भावना की वृद्धि होती है। अलग-अलग राज्यों मे अलग-अलग प्रकार के तिल और गुड़ के लड्डु बनाये जाते हैं। तिल के लड्डु बनाने हेतु तिल को भूनकर, गुड़ की चाशनी में मिलाया जाता है, फिर तिलकूट का पहाड़ बनाया जाता है! कहीं-कहीं पर तिलकूट का बकरा भी बनाते हैं। तत्पश्चात् गणेश पूजा करके तिलकूट के बकरे की गर्दन घर का कोई बच्चा काट देता है। अक्सर इसकी पूजा पहाड़ी समाज के लोग चंद्रमा आने के बाद आँगन में ओखली को पूजकर भी करते हैं जिसका सीधा सा मतलब यह हुआ करता था कि अन्न-धन से हम परिपूर्ण रहें!

उम्मीद की जा सकती है कि पहाड़ से मोह भंग हुई मातृशक्ति जहाँ भी प्रवासी के रूप में रह रही हैं वह करवा चौथ की भांति अपने इस गौरव शाली व्रत को उतनी ही प्राथमिकता के साथ मनाएंगे जितनी करवा चौथ या हरितालिका तीज को मनाती आई हैं! यह त्यौहार यकीनन सुख समृद्ध दाता है और गजानन अपना आशीर्वाद बनाए रखते हैं! पहाड़ों में संकट चौथ को संकट चौदस भी कहा जाता है और इस दिन व्रत को सिर्फ महिलाओं तक सीमित न रखते हुए मेले के रूप में मनाया जाता है! कई पहाड़ी थातों के ऊँचें स्थानों में इस दिन मेले भी जुटा करते थे! शिवालयों की घंटियां टनटनाया करती हैं कोई बेलपत्री से शिव की पूजा के बाद जहाँ अपने सुहाग की कुशल क्षेम की कामना करता है वहीँ गणपति के लिए पूरे दिन व्रत रखता है!

करवा चौथ के दिन महिलायें जहाँ एक जगह इकठ्ठा होकर करवे की व्रत कथा सुनती हैं या सुनाती है वहीँ ग्रामीण आँचल की महिलायें इस दिन या तो व्रत घूमने जाया करती हैं या फिर शिब पार्वती व गणेश के भजन गाकर हर्षोल्लास मनाती हैं! नहा धोकर यथावत श्रृंगार करने के बाद यह जरुरी नहीं होता कि पति सामने ही खड़ा हो, अगर पति सामने खड़ा नहीं है तब घर के बड़ों का आशीर्वाद लेकर ये अपना निर्जला व्रत तोडती है व प्रसाद वितरित करती हैं! आधुनिकता के दौड़ में पिछड़ते अपने त्यौहारों को भी मान सम्मान उसी तरह मिले जिस तरह हम बाहरी वस्तुओं को दैनिक जीवन में आदर के साथ अपनाते हैं तो यह कटु सत्य है कि रोग व्याधि से आप पीड़ित नहीं रहेंगे वरना रोग व्याधि कब आकर आपको जकड़ लेते हैं इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता!

कैसे करें व्रत:-

अक्सर इस पर्व को माँ बहनें निर्जला रखकर ही करती हैं! इसलिए पंडित जी से पूछ लें कि क्या निर्जला में जल की बूंदे मुंह में टपकाई जा सकती हैं यानी गंगा जल की बूंदे! माँ बहने इस दिन गुड चोलाई के लड्डू, तिल गुड के तिलड्डू बनाती हैं! दूध फूल की पूजा चन्द्रमा को दी जाती है! गाँवों में इसे सब अपने उर्ख्याला (ओखली) के पास करते हैं! यह शायद ग्रामीण परिवेश में पहला इत्तेफाक होगा जब चाँद को दूध दिखाया जाता है वरना माँ बहनें गौ दूहने के बाद हमेशा चन्द्रमा से दूध को छुपाकर लाती हैं! सारे दिन गणेश पार्वती शिब की पूजा चलती है कीर्तन भजन होते हैं ! जहाँ यह परम्परा नहीं है वे माँ बहने शिब कथा सुनती हैं या फिर शिब स्त्रोत पढ़ती हैं! चाँद निकलती ही कांसे की थाली में पानी डालकर वे माँ बहनें व्रत तोडती हैं जिनके पति पुत्र भाई उस दिन घर पर न हों ! जबकि जिनके पति घर पर हों तो पति करवा चौथ के में चन्द्रमा को अर्घ चढाने के बाद पत्नी को पति लड्डू व पानी पिलाकर उसका व्रत तोड़ता है! यह सारा उपक्रम घर के अंदर नहीं बल्कि घर के आँगन में बनी ओखली के पास किया जाता है! कतिपय महिलायें ओखली को से दुग्ध जलकर भरकर उसमें चाँद देखती हैं! इसमें ओखली पूजा का महात्म्य भी है ! कहते हैं माँ बहनें ओखली से अनुरोध करती हैं कि तू हमें इतना अन्न देना जिससे हम हर रोज नित तेरा उपयोग कर अपना भरण पोषण कर सकें व तेरे कूटे अन्न से मेरा परिवार निरोग रहे वहीँ माँ बहनें शिब व चन्द्र से प्रार्थना करती हैं कि मेरे पति/पुत्र/भाई निरोग रहें उनका हर कष्ट हरना उन्हें दीर्घायु देना व निरोग काया के साथ अपना सा ओज देना जिसकी शीत दमक से मेरा घर परिवार ओजायमान रहे! चन्द्र को दुग्ध जल चढाते हुए आप यह मन्त्र बोल सकते हैं:-

क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिगोत्रसमुद् भव ।
गृहाणाध्र्यं शशांकेदं रोहिण्य सहितो मम ।।

व्रत विधि बेहद सरल है ! उम्मीद है आगामी व्रत के लिए प्रवासी उत्तराखंडी माँ-बहनें ही नहीं बल्कि पुरुष समाज भी तत्परता दिखाएगा व कोशिश करेगा कि इसके पुनर्जीवन के लिए वह करवा कौथ जैसा उपहार अपनी अपनी अर्धांगनियों को देगा! बेटे माँ को उपहार दें व भाई बहनों को !

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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